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*“हरप्रीत: एक सच्चा प्रेम”* *”वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ?* *दम ले ले घड़ी भर, ये छैयाँ पाएगा कहाँ!”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“हरप्रीत: एक सच्चा प्रेम”*

*“वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ?*
*दम ले ले घड़ी भर, ये छैयाँ पाएगा कहाँ!”*

“पंजाब के औद्योगिक नगर लुधियाना के बाहरी इलाके में, सतलुज नदी के पास एक पुराना गुरुद्वारा था। उसी गुरुद्वारे में सेवा करता था हरप्रीत, सत्य और इंसानियत में विश्वास रखने वाला एक संवेदनशील युवक। वह भाई करतार सिंह का शिष्य था, जो बाहर से बड़े धर्मात्मा और अनुशासनप्रिय दिखते थे, पर समाज की रूढ़ियों से गहराई से बंधे हुए थे।

लुधियाना की उसी बस्ती में एक मेहनती धोबी मंगल सिंह अपनी पत्नी और छोटी बहन नीरजा के साथ रहता था। नीरजा रोज़ गुरुद्वारे के आंगन में झाड़ू लगाती, लंगर की सफ़ाई करती और चुपचाप अपना काम निपटाकर लौट जाती। उसकी आँखों में एक अजीब-सी उदासी और आत्मसम्मान की चमक थी।
हरप्रीत जब गुरुद्वारे में सेवा करता, तो उसकी नज़र अक्सर नीरजा पर ठहर जाती। दोनों के बीच बिना शब्दों के एक रिश्ता पनपने लगा—सेवा, सम्मान और करुणा का रिश्ता, जो धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया। यह प्रेम न किसी घोषणा का मोहताज था, न किसी वादे का।

लेकिन उस इलाके का सबसे प्रभावशाली आदमी था सरदार बलविंदर सिंह, एक बड़ा ज़मींदार और मिल-मालिक। बाहर से वह धर्म, दान और परंपरा की बातें करता, पर भीतर से अहंकार और क्रूरता से भरा हुआ था। उसका खास आदमी जस्सा उसके हर ग़लत काम को अंजाम देता था। बलविंदर की बुरी नज़र भी नीरजा पर थी। जब नीरजा ने उसके इशारों और प्रस्तावों को ठुकरा दिया, तो उसके भीतर का ज़हर बाहर आ गया।

एक रात नीरजा का अपहरण कर लिया गया। बलविंदर की पत्नी हरजीत कौर, जो भीतर से एक संवेदनशील और साहसी स्त्री थी, को जब यह सच पता चला, तो उसका मन विद्रोह कर उठा। उसने नीरजा को चुपचाप छुड़ाया और उसे भागने में मदद की। पर ज़मींदार के गुंडों ने रास्ते में नीरजा को पकड़ लिया और बेरहमी से पीटा।

अगले दिन बलविंदर ने चाल चली। उसने भाई करतार सिंह को समझाया कि हरप्रीत ने “मर्यादा” तोड़ी है—एक नीची जाति की लड़की से संबंध रखकर। गुरुद्वारे की प्रतिष्ठा के नाम पर हरप्रीत को दंड और प्रायश्चित का आदेश दिया गया। हरप्रीत ने बिना विरोध सब स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह गुरुद्वारे और अपने गुरु का अपमान नहीं चाहता था।

लेकिन जब उसने नीरजा को लहूलुहान, टूटी हुई, पर फिर भी जीवित आत्मसम्मान के साथ खड़ा देखा—तो उसके भीतर कुछ टूट गया। उसे समझ आ गया कि जिन लोगों को वह पवित्र मानता रहा, वे सबसे बड़े पाखंडी हैं; और जिसे समाज “नीच” कहता है, वही सबसे ज़्यादा इंसान है।

उस रात हरप्रीत ने गुरुद्वारा छोड़ दिया। न कोई विदाई, न कोई शिकायत। उसके साथ मंगल सिंह, उसकी पत्नी मनप्रीत और नीरजा भी थे। वे लुधियाना को छोड़कर अनजान रास्तों पर निकल पड़े।

समय अपनी गति से बहता रहा, जैसे सतलुज का पानी—कभी शांत, कभी उफनता हुआ, पर निरंतर आगे बढ़ता हुआ। हरप्रीत, नीरजा, मंगल सिंह और उसकी पत्नी मनप्रीत ने जिस छोटी-सी बस्ती में आश्रम की नींव रखी थी, वह धीरे-धीरे एक ठिकाना बन गई—उन लोगों के लिए, जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया था। वहाँ कोई नाम नहीं पूछा जाता था, कोई जाति नहीं जानी जाती थी, कोई अतीत नहीं कुरेदा जाता था। बस इतना देखा जाता था कि सामने खड़ा इंसान भूखा है या नहीं, टूटा हुआ है या नहीं, और उसे सहारे की ज़रूरत है या नहीं।
हरप्रीत अब गुरु नहीं कहलाता था, न सेवक। लोग उसे बस “हरप्रीत” कहते थे—एक ऐसा आदमी, जो चुपचाप दूसरों के घाव धो देता था। वह सुबह सबसे पहले उठता, लंगर की आग जलाता, खेतों में काम करता, बीमारों के लिए जड़ी-बूटियाँ पीसता और रात को सबसे अंत में सोता। उसके चेहरे पर स्थायी गंभीरता थी, पर आँखों में करुणा की लौ कभी बुझी नहीं।
नीरजा अब झाड़ू लगाने वाली लड़की नहीं रही थी। उसके हाथों में अब बच्चों की किताबें थीं, बीमार औरतों के माथे पर रखने के लिए ठंडे पानी की पट्टियाँ थीं, और टूटे दिलों के लिए शब्दों की मरहम थी। पर उसके शरीर और मन पर पड़े घाव कभी पूरी तरह नहीं मिटे। कुछ रातें ऐसी होतीं, जब वह नींद में चौंककर उठ जाती, और हरप्रीत बिना एक शब्द बोले, बस पास बैठकर उसके काँपते हाथों को थाम लेता।
उनके बीच प्रेम था—गहरा, निःस्वार्थ, मौन।
पर वह प्रेम उत्सव नहीं था, वह तपस्या था।
मंगल सिंह और उसकी पत्नी मनप्रीत ने आश्रम की रीढ़ की तरह काम किया। वे जानते थे कि दुनिया की सबसे बड़ी सेवा भाषणों से नहीं, रोज़मर्रा की मेहनत से होती है। धीरे-धीरे आश्रम के चारों ओर झोपड़ियाँ बनने लगीं। एक नई बस्ती जन्म ले रही थी—बिना डर, बिना ऊँच-नीच के।

उधर लुधियाना में सरदार बलविंदर सिंह का साम्राज्य भी अडिग नहीं रहा। समय ने उससे भी हिसाब माँगा। मिलों में मज़दूरों का विद्रोह हुआ, ज़मीनों पर मुकदमे चले, और एक दिन उसका सबसे भरोसेमंद आदमी जस्सा ही सबूत लेकर अदालत पहुँच गया। हरजीत कौर ने भी पहली बार खुलकर सच का साथ दिया। बलविंदर सिंह समाज में जीवित था, पर भीतर से टूट चुका था—अपमान, भय और अकेलेपन से।

एक दिन, वर्षों बाद, आश्रम में एक बूढ़ा आदमी आया। वह लाठी के सहारे चल रहा था, आँखों में पश्चाताप और थकान थी। हरप्रीत ने उसे पहचान लिया—भाई करतार सिंह।
वह देर तक चुपचाप बैठा रहा। फिर बोला,

“मैं गुरु था, पर अंधा था। मैंने मर्यादा बचाने के नाम पर इंसानियत खो दी। क्या तुम मुझे माफ़ कर सकोगे?”
हरप्रीत ने सिर झुका लिया।
“माफी कोई देता नहीं, भाई साहब। माफी तो तब मिलती है, जब इंसान खुद बदल जाता है।”

नीरजा ने आगे बढ़कर बूढ़े के लिए पानी रखा। उसकी आँखों में न क्रोध था, न घृणा—बस एक थकी हुई शांति थी।
उस दिन भाई करतार सिंह वहीं रुक गए। उन्होंने पहली बार लंगर में बिना किसी विशेष आसन के पंगत में बैठकर खाना खाया। शायद वही उनका प्रायश्चित था।

साल बीतते गए। आश्रम अब एक विद्यालय, एक औषधालय और एक सामुदायिक खेत बन चुका था। दूर-दूर से लोग आते—कुछ मदद लेने, कुछ मदद देने। हरप्रीत और नीरजा के नाम कहीं लिखे नहीं गए, पर उनके काम हर दिल में दर्ज हो गए।
नीरजा का स्वास्थ्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। पुराने ज़ख्म, अधूरी नींद और भीतर दबी पीड़ा ने अपना असर दिखाया। एक शाम वह सतलुज के किनारे बैठी थी। सूरज ढल रहा था, आसमान में लालिमा फैल रही थी। हरप्रीत उसके पास आकर बैठ गया।
नीरजा बोली,
“क्या तुम्हें कभी अफ़सोस हुआ, हरप्रीत? अगर हम अलग राह चुनते, तो शायद… ज़्यादा खुश होते?”
हरप्रीत ने नदी की ओर देखते हुए कहा,
“खुशी अगर सिर्फ़ अपने लिए होती, तो शायद हाँ। पर जो शांति हमें यहाँ मिली, वह किसी और राह पर नहीं मिलती।”
नीरजा मुस्कराई।
“तो फिर ठीक है। सच्चा प्रेम शायद यही है—जहाँ दो लोग एक-दूसरे को पाने के बजाय, एक-दूसरे के साथ दुनिया को थोड़ा बेहतर बना दें।”

कुछ महीनों बाद, एक शांत सुबह नीरजा ने अंतिम साँस ली। कोई शोर नहीं, कोई विलाप नहीं। बस सतलुज की हवा चली, जैसे किसी ने दीपक बुझा दिया हो। हरप्रीत देर तक उसके पास बैठा रहा। उसकी आँखों से आँसू नहीं बहे—शायद वे आँसू वर्षों पहले बह चुके थे।

“बीत गए दिन, प्यार के पलछिन
सपना बनी ये रातें, भूल गए वो
तू भी भुला दे, प्यार की वो मुलाकातें
प्यार की वो मुलाकातें, सब दूर अँधेरा
सब दूर अँधेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ!..”

नीरजा के जाने के बाद हरप्रीत बदला नहीं, टूटा नहीं। वह और अधिक शांत हो गया, और अधिक करुणामय। उसने नीरजा के नाम पर एक विद्यालय खोला—“नीरजा आशा केंद्र”—जहाँ लड़कियों को पढ़ाया जाता, उन्हें आत्मसम्मान सिखाया जाता।

जब हरप्रीत भी वर्षों बाद इस दुनिया से विदा हुआ, तो उसके पास कोई निजी संपत्ति नहीं थी। पर उसकी विरासत हर चेहरे पर थी, जो मुस्कुराना सीख चुका था; हर हाथ में थी, जो डर के बिना आगे बढ़ रहा था।

*“कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है पानी*
पानी पे लिखी लिखाई, है सबकी देखी
है सबकी जानी, हाथ किसी के ना आनी
हाथ किसी के ना आनी, कुछ तेरा ना मेरा
*कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ””*

लोग आज भी उस बस्ती को याद करते हैं। कोई उसे आश्रम कहता है, कोई गाँव, कोई विचार।
पर जो समझते हैं, वे कहते हैं—
सच्चा प्रेम वह नहीं, जो दो दिलों को बाँध दे।
सच्चा प्रेम वह है, जो समाज की जंजीरों को तोड़ दे।

हरप्रीत और नीरजा का प्रेम
कहानी नहीं रहा—
वह एक रास्ता बन गया।
प्रेरणादायक।
अर्थपूर्ण।
और अमर।

✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
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#युवा