*“हैप्पी वैलेंटाइन डे”*
*(वैलेंटाइन डे की रात का एक रहस्य)*
“उत्तराखंड की शांत वादियों में बसा नैनीताल उस शाम कुछ अलग ही दिखाई दे रहा था।
झील की सतह पर चाँद की परछाई किसी अधूरे वचन-सी थरथरा रही थी। देवदार की खुशबू हवा में तैर रही थी और सर्द रात अपने भीतर कोई अनजाना रहस्य समेटे बैठी थी।
शहर के पुराने हिस्से में, झील से थोड़ी ऊँचाई पर स्थित एक विशाल पुश्तैनी बंगला था—राठौड़ों का घर। वहीं लौटे थे डॉ. अभिनव राठौड़।
दिल्ली विश्वविद्यालय के साहित्य विभाग के युवा प्रोफेसर, तेजस्वी बुद्धि और आदर्शवादी सोच के लिए जाने जाते थे। पर पिछले एक वर्ष ने उन्हें भीतर से बदल दिया था। गंभीर बीमारी, महीनों का अस्पताल, सफेद दीवारें, सन्नाटा, और मौत का साया—इन सबने उन्हें जीवन की नश्वरता का अहसास करा दिया था।
जब वे अस्पताल से बाहर आए, तो उनका दर्शन बदल चुका था।
“जीवन क्षणभंगुर है,” वे अक्सर कहते,
“तो क्यों न उसे बिना किसी बंधन के जिया जाए? नैतिकता, समाज, परंपरा—ये सब मनुष्य की बनाई दीवारें हैं।”
उनकी पत्नी नैना, जो हर कठिन समय में उनके साथ खड़ी रहीं, अब उन्हें पहचान नहीं पा रही थीं।
पहले अभिनव नियमों के पक्के, सिद्धांतों के उपासक थे। अब वे हर बंधन को चुनौती देने लगे थे।
नैनीताल में बसने के बाद अभिनव ने अपने भीतर एक नया व्यक्तित्व गढ़ लिया। वे पहाड़ों की पगडंडियों पर घंटों अकेले घूमते, झील के किनारे बैठकर अजनबियों से दार्शनिक बहस करते।
नैना कई बार उनके पास बैठकर पूछती—
“क्या तुम खुश हो?”
अभिनव मुस्कुरा देते—
“मैं अब स्वतंत्र हूँ।”
पर उस स्वतंत्रता की कीमत नैना चुका रही थीं। उनके बीच की दूरी हर दिन बढ़ती जा रही थी।
इसी दौरान अभिनव का परिचय स्थानीय कला-संस्था में काम करने वाली युवती रागिनी से हुआ।
रागिनी आधुनिक, निर्भीक और समाज की परंपराओं को चुनौती देने वाली युवती थी।
वह अभिनव के नए विचारों से प्रभावित हुई।
“आप सही कहते हैं,” वह कहती,
“नैतिकता एक सामाजिक भ्रम है।”
दोनों की मुलाकातें बढ़ीं। नैना ने सब देखा, पर कुछ कहा नहीं। उन्हें लगा यह एक अस्थायी आकर्षण है।
वैलेंटाइन डे की घोषणा
14 फरवरी का दिन।
नैनीताल क्लब में भव्य वैलेंटाइन डे समारोह रखा गया।
पूरा शहर गुलाबी रोशनी और लाल गुलाबों से सजा था।
अभिनव ने उस सुबह अचानक कहा—
“आज रात हम अपनी सच्चाई सबके सामने रखेंगे।”
नैना का दिल धड़क उठा।
“कौन-सी सच्चाई?”
अभिनव ने उत्तर नहीं दिया।
रागिनी ने शाम को एक लाल साड़ी पहनी और मुस्कुराते हुए क्लब पहुँची।
क्लब में संगीत, हँसी और प्रेम के गीत गूँज रहे थे।
लोग जोड़ों में नाच रहे थे।
पर राठौड़ों की मेज पर एक अदृश्य तनाव पसरा हुआ था।
रहस्य की शुरुआत
रात के बारह बजे।
झील के ऊपर आतिशबाज़ी शुरू हुई।
“Happy Valentine’s Day!”
भीड़ ने एक स्वर में कहा।
उसी क्षण बिजली चली गई।
अंधेरा।
सन्नाटा।
और फिर—एक चीख।
जब रोशनी लौटी, रागिनी फर्श पर गिरी हुई थी।
उसके हाथ में एक लाल गुलाब था।
पास ही एक छोटा-सा नोट पड़ा था—
“अधर्म का दर्पण हमेशा सत्य दिखाता है।”
नैना के हाथ काँप गए।
अभिनव के चेहरे पर भय और हैरानी दोनों थे।
जाँच की परतें
डॉक्टर ने बताया—
रागिनी के जूस में हल्का-सा जहर मिलाया गया था। मात्रा इतनी थी कि जान नहीं जा सकती, पर चेतावनी स्पष्ट थी।
पुलिस आई।
सबकी नजरें नैना पर गईं।
नैना ने शांत स्वर में कहा—
“मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो बस अपने पति को खोते हुए देख रही थी।”
तभी पुलिस को अभिनव की डायरी मिली। उसमें लिखा था—
“जब मनुष्य अपने नैतिक बंधनों को तोड़ता है, तो वह खुद का सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।”
क्या यह आत्मस्वीकार था?
या अपराधबोध?
रात गहराने लगी।
भीड़ छँट गई।
नैना और अभिनव अकेले थे।
“तुमने सोचा था, नैतिकता को त्यागकर तुम स्वतंत्र हो जाओगे,” नैना बोलीं,
“पर असली कैद तुम्हारे भीतर है।”
अभिनव की आँखों में आँसू आ गए।
“हाँ… यह मेरा प्रयोग था।”
नैना स्तब्ध रह गईं।
“मैं देखना चाहता था कि जब मैं अपने संबंध की घोषणा करूँगा, तो समाज और मेरा मन कैसे प्रतिक्रिया देगा। जूस में जहर मैंने मिलवाया था। जानलेवा नहीं… बस एक झटका देने के लिए।”
“तुमने प्रेम को प्रयोग बना दिया,” नैना की आवाज काँप गई।
उसी समय रागिनी होश में आई।
उसने अभिनव को देखकर कहा—
“आपने मुझे अपने दर्शन का पात्र बनाया, इंसान नहीं समझा।”
उसकी आँखों में निराशा थी।
अगली सुबह।
झील पर धूप खिली थी।
अभिनव ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया—
जहर मिलाने और मानसिक प्रताड़ना के आरोप में।
नैना झील किनारे खड़ी थीं।
उनके मन में केवल एक विचार था—
“प्रेम में नैतिकता का त्याग नहीं, बल्कि आत्मसंयम ही सच्ची स्वतंत्रता है।”
झील की लहरें शांत थीं, पर उस रात की गूँज अब भी हवा में तैर रही थी।
क्लब के बाहर लगे बैनर पर लिखा था—
“Happy Valentine’s Day”
पर उस रात प्रेम ने नहीं,
सत्य ने विजय पाई थी।
अधर्म का दर्पण टूट चुका था।
और उसमें जो चेहरा दिखाई दिया—
वह सबसे अधिक भयावह था—
अभिनव का अपना।”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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*#युवा*










