Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email

*2 घंटे में ऋषिकेश से कर्णप्रयाग का योग*

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email
ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

“इस परियोजना के तहत टीबीएम तकनीक का पहली बार पहाड़ी इलाकों में इस्तेमाल हुआ है। 9.11 मीटर व्यास वाली सिंगल-शील्ड रॉक टीबीएम ने जिस गति और सटीकता का प्रदर्शन किया, वह भारत के निर्माण क्षेत्र में एक नई मिसाल है।” – श्री अश्विनी वैष्णव, रेल मंत्री

योगनगरी ऋषिकेश से तपोनगरी कर्णप्रयाग का सफर अब दो घंटे में ही पूरा होने वाला है। भारतीय रेल ने देवभूमि में ‘शिव’ और ‘शक्ति’ के वरदान से देश की सबसे लंबी रेलवे सुरंग के निर्माण में सफल ब्रेक थ्रू हासिल कर लिया है। 125 किमी से अधिक लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, तीर्थ स्थलों और आध्यात्मिक महत्व को नए सिरे से परिभाषित करने वाली है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शन को हर साल लाखों श्रद्धालु यात्रा पर निकलते हैं। मगर भौगोलिक संरचना और सीमित कनेक्टिविटी ने हमेशा से यात्रियों और स्थानीय निवासियों के लिए चुनौतियां पेश की हैं। इन चुनौतियों को दूर करने और उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों को रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए भारतीय रेल ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना शुरू की। इस परियोजना के पूरा होने से करोड़ों श्रद्धालुओं के चारधाम यात्रा की मन्नत पूरी होने वाली है।

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना हिमालय के दुर्गम और भौगोलिक तौर पर संवेदनशील क्षेत्र (सिस्मिक जोन IV) में बन रही है। इस रेल लाइन में देश की सबसे लंबी रेलवे सुरंग 14.577 किमी (47825 फीट) शामिल है, जो देवप्रयाग और जनासू के बीच बन रही है। 16 अप्रैल, 2025 को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 14.58 किमी लंबी सुरंग T-8 के ब्रेकथ्रू का उद्घाटन किया, जो देश की सबसे लंबी रेलवे सुरंग है। इसके अलावा 38 नियोजित सुरंग ब्रेकथ्रू में से 28 पूरे हो चुके हैं। परियोजना के पहले चरण को 2026 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य है, और 2027 के मध्य तक यह पूरी तरह से चालू हो सकती है।

इस परियोजना में आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जैसे कि टनल बोरिंग मशीन (TBM) जिसने सुरंग निर्माण में अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की है। अगस्त 2024 में टनल बोरिंग मशीन ‘शिव’ और ‘शक्ति’ ने एक महीने में 1080.11 रनिंग मीटर सुरंग खोदकर नया रिकॉर्ड बनाया। इस परियोजना में रेल ब्रिज नंबर 8 इंजीनियरिंग का एक और चमत्कार है।

योग से तप की कनेक्टिविटी

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना 125.2 किमी लंबी ब्रॉड गेज रेल लाइन है, जो योग नगरी ऋषिकेश को कर्णप्रयाग से जोड़ेगी। यह परियोजना भारतीय रेल की चारधाम रेल परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के चार पवित्र तीर्थ स्थलों को रेल नेटवर्क से जोड़ना है। इस रेल लाइन की कुल लागत लगभग 16 हजार करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। परियोजना की सबसे खास बात यह है कि इसका 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से गुजरेगा, जिसमें 17 मुख्य सुरंगें और 12 एस्केप टनल शामिल हैं। इसकी कुल लंबाई 213 किलोमीटर है, जिसमें 193 किलोमीटर का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।

जुड़ेंगे ये 5 जिले

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक सड़क मार्ग से 6-7 घंटे लगते हैं जो मौसम और भूस्खलन के कारण और बढ़ सकता है। चारधाम रेल परियोजना के तहत बन रही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन इस दूरी को तकरीबन दो घंटे में पूरा करेगी। इससे तीर्थयात्रियों, पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए यात्रा तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक हो जाएगी। उत्तराखंड में भारी बारिश, बर्फबारी और भूस्खलन के कारण सड़क मार्ग अक्सर अवरुद्ध हो जाते हैं। मानसून और सर्दियों के मौसम में यह अक्सर होता है। इस परियोजना का 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों के माध्यम से गुजरता है, जो इसे मौसम की मार से मुक्त रखेगा और निर्बाध कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगा, जिससे तीर्थयात्री और पर्यटक साल भर चारधाम की यात्रा कर सकेंगे। यह परियोजना उत्तराखंड के पांच प्रमुख जिलों—देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली—को रेल नेटवर्क से जोड़ेगी। योग नगरी ऋषिकेश, मुनि की रेती, देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर और कर्णप्रयाग जैसे शहर और कस्बे रेल मार्ग से जुड़ जाएंगे। इससे सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों के लोग स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और बाजारों तक आसानी से पहुंच सकेंगे। चारधाम रेल परियोजना का मुख्य उद्देश्य यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को रेल नेटवर्क से जोड़ना है।

आर्थिक और सामाजिक लाभ

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देने वाली है। चारधाम यात्रा के अलावा, उत्तराखंड के अन्य पर्यटन स्थल जैसे ऋषिकेश, हरिद्वार और औली तक पहुंचना आसान हो जाएगा। इससे स्थानीय व्यापार, होटल उद्योग और परिवहन सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा और उत्तराखंड के सुदूर इलाकों में नए व्यापार केंद्रों के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा। देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और गौचर जैसे शहरों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।