अगम बहै दरियाव आज का गोदान है
आसनसोल में ‘भारतीय किसान की त्रासदी’ पर सार्थक परिचर्चा आयोजित
अगम बहै दरियाव प्रेमचंद का गोदान
आसनसोल, 3 मई। आसनसोल डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी में ‘सहयोग’ के तत्वाधान में “भारतीय किसान की त्रासदी एवं ‘अगम बहै दरियाव’” विषय पर एक विशिष्ट परिचर्चा का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों को अंग वस्त्र और पुष्प गुच्छ प्रदान कर किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ‘अगम बहै दरियाव’ के लेखक ख्यातिप्राप्त कथाकार शिवमूर्ति उपस्थित रहे, जिनकी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।
बर्नपुर की उभरती साहित्यकार नीतू निशां ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि प्रतिष्ठित कथाकार शिवमूर्ति जी की कृति “अगम बहे दरियाव” भारतीय ग्रामीण जीवन, विशेषकर किसान की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
सहयोग संस्था के सचिव दिनेश कुमार ने कहा कि नब्बे के दशक से शुरू हुई सहयोग की साहित्यिक यात्रा अनवरत जारी है, जिसमें आज का कार्यक्रम एक मील का पत्थर है।
आरती कुमारी ने शिवमूर्ति का संक्षिप्त जीवन परिचय प्रस्तुत किया और डॉ. रीता जयसवाल ने ‘अगम बहै दरियाव’ से एक महत्वपूर्ण अंश का पाठ किया।
सृजन सरोकार के सहायक संपादक और युवा आलोचक अवनीश यादव ने कहा यह दौर कृतघ्नता का दौर है। उपन्यास के आरंभिक दो पृष्ठों में उपन्यास लेखन एवं प्रकाशन में सहायक लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई है।
शांति निकेतन विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. श्रुति कुमुद ने कहा यह उपन्यास क्लासिक है। इसमें इतनी कहानियाँ हैं कि हर कहानी पर घंटों बात हो सकती है और हर कहानी महत्वपूर्ण है। शिवमूर्ति के उपन्यासों में लोक है, लोक संघर्ष है जो इतिहास की पुस्तकों में देखने को नहीं मिलेगा। जो बाजार की पुस्तकों में देखने को नहीं मिलता।
राहुल सिंह ने कहा कि इस उपन्यास में कुछ ऐसे गुण है जो इसे क्लासिक की श्रेणी में स्थापित कर सकते हैं।शिवमूर्ति ने दलितों, वंचितों के प्रश्नों को उपन्यास में उठाया है। समाज में जिसके साथ न्याय नहीं होता साहित्य उसके साथ न्याय करने का काम करती है। उपन्यास को समझने के लिए आलोचनात्मक भाषा की जरूरत नहीं है।यह उपन्यास आज के भारत का प्रतिनिधित्व करता है।
निशांत ने कहा अगम बहै दरियाव प्रेमचंद का गोदान है। सौ वर्षों के बाद हिंदी साहित्य के इतिहास में इसके महत्व को पहचाना जाएगा।
डॉ. चंदन पाण्डे ने ‘अगम बहै दरियाव’ में अभिव्यक्त प्रेम और उसकी जटिलताओं पर अपनी बातें रखी।
काज़ी नज़रूल विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा प्रसाद ने समकालीन परिप्रेक्ष्य में किसान की समस्याओं तथा उनके सांस्कृतिक और आर्थिक पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।
बी. बी. कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. के. के. श्रीवास्तव तथा रामजी सिंह यादव ने भी अपने वक्तव्यों में भारतीय किसान की स्थिति, संघर्ष और साहित्य में उसकी अभिव्यक्ति पर गंभीर विचार व्यक्त किए।
अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार शिवकुमार यादव ने ‘अगम बहै दरियाव’ के माध्यम से किसान जीवन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति को आलोचकों द्वारा डिकोड करने की असफलताओं की तरफ ध्यान दिलाया और भविष्य में इस पर कार्य करने का आश्वासन दिया।
कार्यक्रम का संचालन युवा अध्येता बजरंगबली कहार ने कुशलतापूर्वक किया एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ जयराम पासवान ने किया।
कार्यक्रम में रामकिशोर पंडित, प्रदीप कुमार साह, कथाकार सृंजय,कवि संजय राय, मनोज यादव,गौतम लामा,ललिता महतो, विशिष्ट अतिथि मनोहरभाई पटेल,नवीन चंद्र सिंह,दिनेश गुप्ता गर्ग,अवधेश कुमार अवधेश,विद्योत्मा झा,भगवंत शर्मा,संजय भालोटिया और काफी मात्रा में छात्रों,शोधार्थियों की गरिमामय उपस्थिति रही।








