*“आत्महत्या से आत्मबोध तक !..”*
*(दरभंगा, बिहार की पृष्ठभूमि पर एक आत्मकथात्मक कथा)*
मैं, अभिनव झा, दरभंगा के बेला मोहल्ले में अपने मामा के पुराने मकान में रहता हूँ। कुछ वर्ष पहले हमारे घर के ऊपरी हिस्से में एक मध्यवयस्क व्यक्ति किराए पर रहने आए थे—डॉ. मनोहर लाल त्रिपाठी।
वे संस्कृत और दर्शन के विद्वान थे, कभी ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में अध्यापन करते थे। शांत, गंभीर, और कुछ रहस्यमय।
एक दिन अचानक उन्होंने कमरा खाली कर दिया। जाते-जाते उन्होंने मुझे एक मोटी डायरी थमाई और कहा—
“यदि कभी तुम्हें लगे कि संसार समझदारों से अधिक पागलों का है, तब इसे पढ़ना… और यदि उचित लगे तो प्रकाशित कर देना।”
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“डॉ. मनोहर लाल त्रिपाठी के अभिलेख (केवल उन्मादियों के लिए)”
मैंने उसे पढ़ा… और यह कथा उसी पांडुलिपि का संपादित रूप है।
मैं, डॉ. मनोहर लाल त्रिपाठी, उम्र पैंतालीस वर्ष।
दरभंगा की गलियों में भटकता एक ऐसा व्यक्ति, जिसे लगता है कि वह इस सामान्य संसार के लिए बना ही नहीं।
लहेरियासराय की चाय की दुकानें, दरभंगा टावर का शोर, राजनीतिक बहसें, छोटे-छोटे स्वार्थों में उलझे लोग—सब मुझे एक अजीब-सी थकान देते थे।
मैं अक्सर सोचता था—
मेरे भीतर दो व्यक्ति रहते हैं।
एक—जो वेदांत पढ़ता है, जो कमला नदी के किनारे बैठकर आत्मा और ब्रह्म की चर्चा करता है, जो शुद्ध, शांत और आध्यात्मिक है।
दूसरा—जो भीतर से जंगली है, क्रोध से भरा, अकेला, समाज से कटता हुआ, जैसे किसी सूखे मैदान का भेड़िया।
मैं स्वयं को “मैदान का भेड़िया” कहता था।
सभ्यता के बीच छिपा हुआ, पर भीतर से असभ्य और विद्रोही।
एक शाम मैं राज किला के पास टहल रहा था। अचानक मेरी दृष्टि एक दुबले-पतले व्यक्ति पर पड़ी, जो एक पोस्टर लिए घूम रहा था। उस पर लिखा था—
“रहस्यमयी रंगमंच—आत्मा का दर्पण। केवल योग्य जनों के लिए।”
मैंने जिज्ञासा से पूछा—
“यह क्या है?”
उसने मेरी आँखों में झाँकते हुए एक छोटी-सी पुस्तिका मुझे थमा दी।
शीर्षक था—
“मैदान के भेड़िये पर एक विवेचना”
घर लौटकर जब मैंने उसे पढ़ा, तो मेरा हृदय काँप उठा।
उसमें लिखा था—
“मनोहर लाल त्रिपाठी, तुम स्वयं को दो स्वभावों में बाँटते हो—एक उच्च और एक निम्न। परंतु तुम यह नहीं समझते कि मनुष्य केवल दो नहीं, असंख्य रूपों का समूह है।”
पुस्तिका ने मुझे “आत्महंता” कहा—
ऐसे लोग, जो भीतर-ही-भीतर जानते हैं कि एक दिन वे अपना जीवन समाप्त कर देंगे।
मैंने कई बार आत्महत्या के बारे में सोचा था।
मेरे कमरे की अलमारी में नींद की गोलियाँ रखी थीं।
पर उसी पुस्तिका में लिखा था—
“तुम्हारे भीतर अमर बनने की क्षमता है। यदि तुम स्वयं को पहचान सको।”
कुछ दिन बाद, एक अंतिम संस्कार में—कमला नदी के घाट पर—मैं फिर उसी व्यक्ति से मिला।
मैंने पूछा—
“यह रहस्यमयी रंगमंच कहाँ है?”
वह मुस्कुराया—
“सबके लिए नहीं।”
मैंने आग्रह किया।
वह बोला—
“आज रात स्टेशन रोड के पास एक नृत्यशाला में जाइए। शायद वहीं उत्तर मिले।”
मैं निराश हो गया।
नृत्यशाला?
मैं, एक दर्शन का विद्वान, वहाँ जाऊँ?
पुराना मित्र और सामाजिक दूरी
लौटते समय मेरी मुलाकात मेरे पुराने सहपाठी, प्रोफेसर अच्युतानंद मिश्र से हुई। हम कभी पूर्वी दर्शन, बौद्ध ग्रंथ और उपनिषदों पर घंटों चर्चा करते थे।
उसने मुझे घर बुला लिया।
अब उसका घर राष्ट्रवादी नारों और राजनीतिक पोस्टरों से सजा था। उसने मेरे एक लेख की आलोचना की—
“तुम्हारे विचार राष्ट्र-विरोधी प्रतीत होते हैं।”
मैंने उसकी पत्नी द्वारा बनाई गई रवींद्रनाथ टैगोर की एक पेंटिंग की आलोचना कर दी—
“यह अत्यधिक भावुक है, टैगोर की गहराई इसमें नहीं है।”
घर का वातावरण ठंडा पड़ गया।
मैं समझ गया—
मैं इस समाज के लिए सदा एक अजनबी रहूँगा।
रात, नृत्य और नंदिता
उस रात मैं घर नहीं लौटना चाहता था।
कमरे में मेरा इंतज़ार कर रही थीं—नींद की गोलियाँ।
मैं स्टेशन रोड की उसी नृत्यशाला में जा पहुँचा।
संगीत, रोशनी, हँसी—सब कुछ मेरे लिए अपरिचित।
वहीं मेरी मुलाकात हुई—नंदिता से।
उसकी आँखों में आत्मविश्वास था।
उसने मुझे देखा और कहा—
“आप बहुत थके हुए लगते हैं… जीवन से।”
मैं चौंका।
हम देर तक बातें करते रहे।
वह कभी मेरी आत्म-दया पर हँसती, कभी गंभीरता से सुनती।
उसने कहा—
“आप खुद को बहुत विशिष्ट समझते हैं, पर असल में आप डरते हैं—जीने से।”
उस रात उसने मुझे दूसरा दिन देखने का कारण दे दिया।
नया जीवन
अगले कुछ सप्ताहों में नंदिता ने मुझे बदला।
उसने मुझे नृत्य सिखाया।
दरभंगा के कैफे दिखाए।
हल्के नशे का अनुभव कराया।
उसने मेरा परिचय मधुरिमा से कराया—एक स्वतंत्र स्वभाव की युवती, जिसने मुझे प्रेम और देह की सहजता समझाई।
नंदिता ने कहा—
“भोग भी जीवन है, मनोहर। केवल तपस्या ही सत्य नहीं।”
मैं भीतर से टूट रहा था, पर बदल भी रहा था।
रहस्यमयी संगीतकार – राघवेश
एक रात नंदिता मुझे एक सैक्सोफोन वादक से मिलाने ले गई—राघवेश।
वह हँसमुख था, हल्का-फुल्का, पर उसकी आँखों में एक अजीब गहराई थी।
एक भव्य मुखौटा-नृत्य समारोह के बाद उसने कहा—
“अब समय है… असली रंगमंच का।”
हम एक पुरानी हवेली में पहुँचे—दरभंगा राज परिसर के पास।
अंदर एक लंबा, घोड़े की नाल जैसा गलियारा था।
एक ओर विशाल दर्पण।
दूसरी ओर कई दरवाज़े।
प्रत्येक दरवाज़े पर लिखा था—
“तुम्हारा बचपन”
“तुम्हारा क्रोध”
“तुम्हारी वासना”
“तुम्हारी आध्यात्मिकता”
“तुम्हारी मृत्यु”
मैं एक-एक कर उन दरवाज़ों में प्रवेश करता गया।
मैंने अपने बचपन की मासूमियत देखी।
अपने पिता से विद्रोह।
अपनी वासनाएँ।
अपना सन्यास।
और अंत में—अपनी आत्महत्या।
हत्या या आत्म-प्रक्षेपण
अचानक दृश्य बदला।
नंदिता राघवेश के पास लेटी थी।
मेरे भीतर ईर्ष्या और क्रोध जगा।
मैंने चाकू उठाया… और नंदिता के सीने में घोंप दिया।
राघवेश उठा। उसने नंदिता के शरीर को कालीन से ढक दिया।
फिर बाहर चला गया।
कुछ देर बाद वह लौटा—
पर अब वह शास्त्रीय संगीतकार के वेश में था, जैसे कोई महान कलाकार।
वह बोला—
“तुमने नंदिता को नहीं मारा, मनोहर।
तुमने अपनी आत्मघाती इच्छा को बाहर फेंका है।”
मैंने समझा—
नंदिता मेरी जीवन-इच्छा थी।
मैंने उसे इसलिए मारा क्योंकि मैं जीने से डरता था।
राघवेश मुस्कुराया।
नंदिता का शरीर शतरंज की गोटी में बदल गया।
उसने उसे उठाकर अपनी जेब में रख लिया।
दृश्य विलीन हो गया।
बोध
मैं हवेली के बाहर था।
सुबह हो चुकी थी।
दरभंगा की सड़कों पर हल्की धूप उतर रही थी।
मुझे पहली बार लगा—
मैं न केवल साधु हूँ,
न केवल भेड़िया।
मैं असंख्य रूपों का संगम हूँ।
जीवन पूर्ण है—
भोग और त्याग, प्रेम और घृणा, पाप और पुण्य—सब एक ही वृत्त के हिस्से हैं।
मैंने आत्महत्या का विचार त्याग दिया।
कुछ महीनों बाद डॉ. मनोहर लाल त्रिपाठी दरभंगा छोड़कर चले गए।
कहते हैं, वे हिमालय की ओर गए।
पर उनकी डायरी मेरे पास है।
जब-जब मुझे लगता है कि मैं इस समाज में अजनबी हूँ,
मैं “डॉ. मनोहर लाल त्रिपाठी के अभिलेख” खोल लेता हूँ।
और मुझे याद आता है—
हम सबके भीतर एक भेड़िया है,
और एक ऋषि भी।
प्रश्न यह नहीं कि कौन सही है।
प्रश्न यह है—
क्या हम दोनों को स्वीकार कर सकते हैं?
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










