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*”काल के उस पार!..”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

((( “आज मेरी माँ की बरसी है…
उनकी पावन स्मृति को शत-शत नमन। 🙏

आज का दिन मेरे लिए केवल एक तारीख नहीं,
बल्कि भावनाओं, यादों और अनकहे प्रेम का सागर है।
मेरी माँ स्वर्गीय श्रीमती सुमित्रा देवी,
मेरे पिता स्वर्गीय श्री सत्यनारायण जी,
और उनके दो सबसे प्रिय पुत्र —
मेरे बड़े भैया श्री अनिरुद्ध और श्री सुनील —
इन चारों को मैंने अपनी एक काल्पनिक कथा के पात्रों के रूप में सहेज लिया है,
ताकि समय उन्हें मुझसे कभी छीन न सके।

माँ…
आज भी जब जीवन थकाता है,
तो आपकी वही बात कानों में गूँजती है —
“बेटा, बस खुश रहो…”

धन्यवाद माँ — जीवन, संस्कार और प्रेम देने के लिए।
आप मेरी हर साँस, हर प्रार्थना और हर कहानी में जीवित हैं।
आज, कल और हमेशा… 💐)))

*“काल के उस पार!..”*

*“देवप्रस्थम्”* – धरती का स्वर्ग
सात नदियों के संगम पर बसा देवप्रस्थम् केवल एक नगर नहीं था —
वह एक जीवित चेतना था।
उत्तर से उतरती श्वेत-नदी,
दक्षिण से आती तपो-सरिता,
पूर्व से बहती जीवन-धरा,
पश्चिम से गूँजती वेद-वाहिनी —
और इनके मध्य दो और अलौकिक नदियाँ,
जिन्हें लोग केवल आस्था से जानते थे।

इन सात धाराओं के आलिंगन में बैठा देवप्रस्थम्,
जिसके प्रासाद सोने से नहीं,
त्याग और तप से बने थे।

यहाँ अश्वमेध यज्ञ होते थे,
राजसूय सम्पन्न होते थे,
और देवताओं के लिए अधिष्ठान सदा तैयार रहता था।

सबसे मध्य में स्थित था नगर का रहस्य —
देव–स्तंभ।

कहते हैं, उसे वही राजा स्पर्श कर सकता था
जिसके भीतर एक भी मिथ्या श्वास न हो।

‘देवप्रस्थम्’ का अधिपति था
चक्रवर्ती सम्राट देवकेतु।

चालीस वर्ष की आयु,
पर आँखों में अनंत युगों की गंभीरता।

वह युद्ध में वज्र था,
न्याय में अग्नि,
और प्रजा के लिए पिता।

पर उसकी आत्मा में एक प्रश्न सदा जलता रहता था—
“मैं कौन हूँ —
केवल इस जन्म का राजा
या किसी और काल का अपूरा स्मृति–विरेही?

वह रात्रि असामान्य थी।..

आकाश असामान्य रूप से स्थिर था।
चंद्रमा बिना चलने के चमक रहा था।
नदियाँ बिना लहर के बह रही थीं।

राजा देवकेतु अकेले चित्रशाला में पहुँचे।

हजारों चित्र थे वहाँ —
राजवंश, युद्ध, यज्ञ, देवी–देवता…

और तभी…

उनकी दृष्टि एक चित्र पर ठहर गई।

एक स्त्री।

चेहरा ऐसा कि मानो समय ने साँस रोक रखी हो।
नेत्र — जिनमें विरह भी था
और प्रत्याशा भी।

राजा के हाथ काँप उठे।

“यह… यह कौन है?”
हृदय के भीतर कुछ टूटा।

चित्र के नीचे लिखा था—

*“देवसुंदरी”*

राजा पीछे हट गए।
सीने में तीव्र वेदना उठी।

“यह नाम…
मुझे यह नाम क्यों रुला रहा है?”

उसी रात राजा ने स्वप्न देखा।

धूल–धूसरित रणभूमि।
अस्त्रों की टंकार।
रक्त में लथपथ एक युवा योद्धा।

उसके पास एक स्त्री रो रही थी—

*“अनिरुद्ध…
मुझे छोड़कर मत जाओ…”*

राजा नींद से चौंक गए।

“अनिरुद्ध?”
“मैं यह नाम क्यों जानता हूँ?”

हवा में किसी ने उत्तर दिया—

“क्योंकि तुम वही हो,
जो काल ने छीन लिया था
और नियति ने लौटा दिया है।”

देवप्रस्थम् की नदियाँ उलटी बहने लगीं।
प्रासाद धुंधले पड़ने लगे।

और राजा देवकेतु
धीरे–धीरे
राजकुमार अनिरुद्धकाल में बदलने लगे।

*हज़ारों वर्ष पहले…*

एक और राज्य था।
और उसका राजा था
महाराज दीप्तसेन।

उनका पुत्र था —
राजकुमार अनिरुद्धकाल।

युवावस्था में भी
उसके भीतर अनजाने विरह का निवास था।

उसका मित्र था — सुनील।

एक सन्ध्या सुनील बोला—

“राजकुमार,
चलिए उस आश्रम चलते हैं
जहाँ सुमित्रा तप कर रही हैं।”

वन गहन था।
हवा में धूप और ध्यान की सुगंध थी।
सुमित्रा काष्ठासन पर बैठी थीं।

उन्होंने आँखें खोलीं और कहा—

*“तुम समय से पहले आ गए हो, राजकुमार।”*

अनिरुद्ध चौंके—
“आप मेरा भविष्य जानती हैं?”

सुमित्रा का स्वर गूढ़ था—
“न भविष्य…
मैं तुम्हारा पिछला जन्म देख रही हूँ।”

सुमित्रा बोली—

“स्वरकेतु राज्य में
एक कन्या है — देवसुंदरी।
वह केवल राजकुमारी नहीं,
वह किसी अधूरे प्रेम का पुनर्जन्म है।”

अनिरुद्ध के भीतर कुछ काँप उठा।
सुनील ने धीरे से कहा—

“लगता है, यही वह नाम है
जो तुम्हारी आत्मा को पुकार रहा है।”

उस रात अनिरुद्ध ने चंद्रमा से कहा—

“यदि वह कहीं है,
तो मेरा हृदय वहाँ पहले से पहुँच चुका है।”
चंद्रमा मौन रहा।
पर काल मुस्करा उठा।

स्वरकेतु राज्य पर्वतों और नदियों के मध्य बसा था।
जहाँ हवा भी राग में बहती थी,
और पत्तियाँ भी ताल पर गिरती थीं।

चारों ओर सुगंधित पुष्प,
स्फटिक-से चमकते जलाशय,
और मध्य में राजप्रासाद —
श्वेत प्रस्तरों से निर्मित,
मानो चंद्रमा भूमि पर उतर आया हो।

यहीं जन्मी थी — राजकुमारी देवसुंदरी।

राजा स्वरकेतु की इकलौती संतान,
किन्तु केवल राजकुल की नहीं —
पूरे राज्य की आत्मा।

उसकी आँखों में करुणा थी,
और स्वर में तप।

प्रजा कहती थी —
“यह कन्या जन्म से पहले भी
कहीं रो चुकी है।”

पूर्णिमा की एक रात्रि,
देवसुंदरी छत पर अकेली बैठी थी।
चंद्रमा को निहारते हुए
उसने स्वयं से कहा—

“क्यों मेरी आत्मा
बिना कारण काँप उठती है?
क्यों मुझे लगता है
जैसे कोई मुझे
बहुत दूर से पुकार रहा हो?”

उसकी सखी बोली—

“तुम राजकुमारी हो,
स्वप्न देखना तुम्हारा अधिकार है।”

देवसुंदरी ने धीरे कहा—

“नहीं सखी…
यह स्वप्न नहीं,
यह स्मृति है…
जिसकी मुझे स्वयं पहचान नहीं।”

उसी काल में
राजकुमार अनिरुद्धकाल
अपने मित्र सुनील के साथ
स्वरकेतु आया।

राजा स्वरकेतु ने उनका स्वागत किया।
राजसभा सजी।
वाद्य बजे।

पर अनिरुद्ध की दृष्टि
उत्सव में नहीं,
किसी अदृश्य बंधन में उलझी हुई थी।

और तभी—

देवसुंदरी ने सभा में प्रवेश किया।

उस क्षण
सभी ध्वनियाँ ठहर गईं।

अनिरुद्ध की आँखें फैल गईं।

हृदय से एक आवाज़ उठी—

“यही है…
यही वह आत्मा है
जिसे मैं युगों से खोज रहा था।”

देवसुंदरी ने जैसे ही उसकी ओर देखा,
उसके मुख से अनायास निकल पड़ा—

“अनिरुद्ध…”

वह स्वयं चौंक गई।
“मैं तुम्हारा नाम कैसे जानती हूँ?”
उसने मन में पूछा।

उत्सव के बाद
दोनों राजोद्यान में पहुँचे।

वातावरण मौन था,
पर आत्माएँ बोल रही थीं।

अनिरुद्ध ने कहा—

“राजकुमारी,
मैंने तुम्हें आज पहली बार देखा है…
फिर भी ऐसा क्यों लगता है
जैसे मैं तुम्हें खोकर
दुबारा पा गया हूँ?”

देवसुंदरी की आँखों में आँसू भर आए—

“और मुझे ऐसा लग रहा है
जैसे मैं तुम्हें फिर से पहचान रही हूँ,
किसी जीवन के अवशेष की तरह…”

दोनों मौन हो गए।
आकाश पर तारे काँप उठे।

उसी रात
आश्रम में सुमित्रा का ध्यान टूटा।

उन्होंने आँखें खोलते हुए कहा—

“काल ने प्रेम की बुनियाद रख दी है…
अब वेदना भी जन्म लेगी।”

सुनील वहीं बैठा था।

वह बोला—

“माता, क्या यह प्रेम पूर्ण होगा?”

सुमित्रा का स्वर गूढ़ हुआ—

“प्रेम कभी अधूरा नहीं होता,
केवल शरीर अधूरे रह जाते हैं।”

कुछ दिनों बाद
एक ब्राह्मण युवक
आश्रम में आया।

नाम था — सत्यनारायण।

वह वेद-पाठक,
पर आँखों में संसार का प्रश्न।

सुमित्रा ने पूछा—

“तुम यहाँ क्यों आए हो, ब्राह्मण?”

सत्यनारायण बोला—
“मोक्ष की खोज में…”
सुमित्रा मुस्कराईं—

“मोक्ष बाहर नहीं,
किसी दूसरे हृदय के भीतर पाया जाता है।”

दोनों एक-दूसरे को
निहारते रह गए।

इन दोनों प्रेम-कथाओं का
विकास शांत था,
पर गहरा।

अनिरुद्ध और देवसुंदरी
संध्याएँ साथ देखने लगे।

कम बोलते,
अधिक अनुभव करते।

एक दिन देवसुंदरी बोली—

“क्या तुम मुझसे वचन दे सकते हो
कि चाहे कुछ भी हो,
मुझे फिर ढूँढ लोगे?”

अनिरुद्ध ने गंभीर स्वर में कहा—

“यदि मृत्यु भी आ जाए,
तो भी मेरी आत्मा
तुम्हारी आत्मा का पता
नहीं भटकेगी।”

देवसुंदरी ने उसका हाथ थाम लिया।

उसी रात
आकाश में लहू-सा चंद्र उगा।
नगर के ज्योतिषियों ने कहा—
“यह युद्ध का संकेत है।”

राजा दीप्तसेन ने
रण की तैयारियाँ शुरू कर दीं।
सुनील ने चिंतित होकर कहा—

“मित्र, युद्ध तुम्हें पुकार रहा है…”

अनिरुद्ध ने शांत उत्तर दिया—

“और प्रेम मुझे बाँधे हुए है…
दोनों के बीच मेरा जीवन
फँस गया है।”

युद्ध से एक रात्रि पूर्व
अनिरुद्ध और देवसुंदरी
नदी-तट पर मिले।

देवसुंदरी रोते हुए बोली—

“यदि तुम लौटे नहीं
तो मैं भी इस जीवन से लौट जाऊँगी।”

अनिरुद्ध ने उसकी आँखों से आँसू पोंछते हुए कहा—

“यदि मैं लौट न पाया,
तो समझना —
मैं जन्म लेने गया हूँ।”
देवसुंदरी काँप गई।

उधर सुमित्रा के आश्रम में
सत्यनारायण ने कहा—

“मैं यज्ञ भूमि जा रहा हूँ…
वहाँ मुझे बुलाया गया है।”

सुमित्रा बोली—
“तुम लौटोगे?”

सत्यनारायण ने मुस्कराकर कहा—

“यदि लौटना मेरे कर्म में होगा,
तो अवश्य…”

सुमित्रा की आँखों से
पहली बार अश्रु बहे।

प्रभात हुआ।
शंखनाद गूँजा।

अनिरुद्ध काल के सबसे भयंकर
रण में उतरा।

अस्त्रों की टंकार,
घोड़ों की हिनहिनाहट,
और रक्त से भीगा धरणी।

सुनील पास ही युद्ध कर रहा था।

एक बाण आया —
सीधा अनिरुद्ध के वक्ष में।

वह गिर पड़ा।
धरती काँप उठी।

धरती पर लेटा अनिरुद्ध
आँखें बंद करते हुए
बुदबुदाया—

“देवसुंदरी…
मैं जा रहा हूँ,
पर तुम्हें ढूँढा जाएगा…”

उसका श्वास रुक गया।

आकाश में
बिजली चमकी।

नियति ने मुस्करा कर कहा—

“एक प्रेम समाप्त नहीं हुआ,
वह अब रूप बदल रहा है।”

जब शव स्वरकेतु पहुँचा,
देवसुंदरी चीख पड़ी।

वह चिता के पास बैठकर बोली—

“जिसे मैंने जीवन बनाया,
उसने मुझे मृत्यु थमा दी।”

वह कई दिनों तक
बोल न सकी,
हँस न सकी,
जी न सकी।

उधर यज्ञ भूमि पर
सत्यनारायण को
विषैले सर्प ने डँस लिया।

अंतिम श्वास में उसने कहा—

“सुमित्रा…
यदि आत्मा लौटती है,
तो मैं फिर तुम्हारे पास लौटूँगा…”

उसका प्राण निकल गया।

देवताओं की सभा में
ब्रह्म स्वर गूँजा—

“ये प्रेम मृत्यु से परे हैं।
इन्हें दोबारा जन्म का अवसर दिया जाए।”

काल ने सिर झुका दिया।
मृत्यु ने मार्ग खोल दिया।

देवसुंदरी ने चिता के सामने प्रण लिया—

“यदि मेरा प्रेम सत्य है,
तो अगला जन्म
मुझे उसी तक ले जाए।”

उसकी आँखों में
भय नहीं,
केवल विश्वास था।

नदियाँ उलटी बहने लगीं।
पवन दिशा बदलने लगी।

चार आत्माएँ
काल की शिला पर चढ़कर
पुनर्जन्म के पथ पर चलीं—

• अनिरुद्ध
• देवसुंदरी
• सुमित्रा
• सत्यनारायण

और समय वापस
देवप्रस्थम् की ओर झुकने लगा…

राजा देवकेतु
नींद में छटपटा रहे थे।

उनके मुख से निकला—

“देवसुंदरी…”

समय बह चुका था।
युग बदल चुका था।
राजवंश बदल गए थे।

पर प्रेम नहीं बदला था।

देवप्रस्थम् एक समृद्ध नगरी थी —
ऊँचे किले, चौड़े मार्ग,
और मध्य में भव्य राजमहल।

इसी महल में जन्म हुआ
राजा देवकेतु का।

बालक जन्म से ही
अन्य बच्चों से भिन्न था।

वह रात में अकसर
नींद में बुदबुदाता—

“देवसुंदरी…
तुम लौट आओ…”

राजमाता चौंक जातीं।

“यह नाम हमारे वंश में नहीं है…
तो इसे कैसे ज्ञात है?”

देवकेतु मात्र पाँच वर्ष का था
जब उसने पहली बार युद्ध का स्वप्न देखा।

वह काँपता हुआ जागा।
उसके वस्त्र पसीने से भीग चुके थे।

“माँ… मैंने युद्ध देखा…
बहुत रक्त…
और मैं गिर गया…”

राजमाता ने उसे सीने से लगा लिया,
पर उन्हें ज्ञात था—

“यह केवल स्वप्न नहीं…
यह स्मृति है।”

दूर, दक्षिण दिशा में
एक छोटा सा राज्य था — सुदर्शनगढ़।

वहाँ एक कन्या जन्मी —
नाम रखा गया सौम्या।

पर यह नाम मात्र था।

क्योंकि उसके नेत्रों में
एक अनकही पीड़ा रहती थी।

वह चंद्रमा को देखकर
अक्सर रो पड़ती।

माँ पूछती—

“बेटी, दर्द कहाँ है?”

सौम्या कहती—

“माँ, मुझे नहीं पता…
पर कुछ बहुत अपना
मुझसे बहुत दूर है…”

देवप्रस्थम् के मंदिर में
एक प्राचीन देव-स्तंभ था।

कहा जाता था—

“यह स्तंभ केवल
उन्हीं आत्माओं के सामने
प्रकाशमान होता है
जिनका पूर्व जन्म
अधूरा रहा हो।”

एक दिन बालक देवकेतु
मंदिर गया।

जैसे ही वह स्तंभ के निकट पहुँचा —
स्तंभ में हल्का प्रकाश कंपन करने लगा।

ऋषि चौंक गए।

“यही है वह आत्मा…”

वर्ष बीतते गए।
देवकेतु अब युवा हो चुका था।

बलिष्ठ शरीर,
तेज नेत्र,
पर हृदय में
एक अनजान रिक्तता।

सब कहते—

“राजा बनने को तैयार है।”

पर वह स्वयं से पूछता—

“मैं किसका राजा हूँ,
जब मेरा हृदय ही खाली है?”

उधर सौम्या
वीणा में निपुण हो चुकी थी।

जब वह राग छेड़ती,
तो श्रोता अनायास रो पड़ते।

एक वृद्ध ऋषि ने कहा—

“इस कन्या के स्वर
इस जन्म के नहीं हैं…
यह पिछली शताब्दियों का
विरह गाती है।”

देवकेतु
एक राजकीय यात्रा पर निकला।

मार्ग में एक नदी आई।

जैसे ही उसने नदी को देखा —
उसका शरीर काँप उठा।

उसे एक दृश्य दिखा—

• वही नदी
• वही चंद्रमा
• वही विदा की रात्रि

उसके मुख से निकला—

“यही वह स्थान है
जहाँ मैंने किसी को अंतिम बार देखा था…”

सैनिक चकित रह गए।

उसी रात सौम्या ने भी
स्वप्न देखा—

एक योद्धा
रक्त से लथपथ
उसकी ओर हाथ बढ़ा रहा है।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं।

“मैं लौट गया हूँ…”

सौम्या नींद में चिल्ला उठी—

“मत जाओ…
इस बार मत जाओ…”

देवकेतु की यात्रा
सुदर्शनगढ़ पहुँची।

राजा ने स्वागत किया।

उत्सव सजा।
संगीत आरंभ हुआ।

और वीणा पर
सौम्या का राग गूँजा।

देवकेतु जैसे मूर्ति हो गया।

उसकी दृष्टि मंच पर स्थिर हो गई।

उसके भीतर से आवाज़ आई—

“यही है…
यही वह आत्मा है…”

संगीत समाप्त हुआ।

सौम्या ने ऊपर देखा।

उनकी दृष्टियाँ टकराईं।

क्षण भर के लिए
समय रुक गया।

साँसें ठिठक गईं।

सभा समाप्त हुई।

पर दोनों
एक दूसरे को भूल नहीं सके।

देवकेतु ने स्वयं से पूछा—

“मैं इस कन्या को
जन्मों से जानता हूँ…
पर कैसे?”

सौम्या ने चंद्रमा से पूछा—

“क्या वही है
जिसे मैं हर जन्म ढूँढती हूँ?”

अगले दिन
दैवयोग से
दोनों राजउद्यान में आमने-सामने आ गए।

देवकेतु ने काँपते स्वर में कहा—

“मैं तुम्हें पहले भी जानता हूँ…”

सौम्या की आँखें भर आईं—

“और मैं तुम्हें खो चुकी हूँ…”

दोनों स्तब्ध रह गए।
देवकेतु ने धीरे से कहा—

“मैं देवकेतु हूँ।”

सौम्या का स्वर टूट गया—

“और मैं…
देवसुंदरी थी…”

उस क्षण
दोनों की स्मृतियों का
बंध टूट गया।

पिछले जन्म के दृश्य
बिजली की तरह
दोनों के भीतर दौड़ गए।

देवकेतु ने देखा—

• युद्ध
• बाण
• गिरना
• अंतिम शब्द

सौम्या ने देखा—

• चिता
• अग्नि
• प्रण
• पुनर्जन्म की पुकार

दोनों रो पड़े।

देवकेतु ने कहा—

“मैं लौट आया…
तुम्हारे वचन के अनुसार…”

सौम्या ने उसका हाथ थाम लिया—

“और मैंने प्रतीक्षा नहीं छोड़ी…”

उसी समय
देवप्रस्थम् के आश्रम में
एक साधिका प्रकट हुई —
नाम सुमेधा।

और राजकीय आचार्य बने —
नारायण आचार्य।

दोनों की दृष्टि पहली बार मिली —
और दोनों मौन हो गए।

नारायण बोले—

“हम फिर मिल गए हैं,
बिना मरे…”

सुमेधा की आँखों से आँसू बहने लगे।

देवप्रस्थम् का आकाश उस दिन असामान्य रूप से गंभीर था।
मंदिरों की घंटियाँ स्वयं बज उठी थीं।
ऋषियों ने कहा—

“काल अपने निर्णय के निकट है…”

उसी दिन सौम्या के लिए
पश्चिमी राज्य नृप वीरकेतु से
विवाह प्रस्ताव आया।

राजसभा में घोषणा हुई—

“यह राजनीति का नहीं,
पृथ्वी के संतुलन का प्रश्न है।”

देवकेतु मौन रह गया।

उसका हृदय चीख रहा था,
पर राजा का स्वर दबा हुआ था।

रात्रि।
देव-स्तंभ के सामने
देवकेतु नतमस्तक था।

“यदि मैं राजा न होता,
तो क्या मेरा प्रेम अपराध न होता?”

देव-स्तंभ से प्रथम बार
एक स्वर निकला—

“जब धर्म और प्रेम टकराते हैं,
तब वही चुनो
जो आत्मा को मुक्त करे।”

देवकेतु काँप उठा।

उधर सौम्या ने
विवाह-प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

उसने अपने पिता से कहा—

“पिताश्री,
यह देह आपका दान है,
पर यह आत्मा किसी और की अमानत है…
मैं इसे फिर खो नहीं सकती।”

सारा राज्य स्तब्ध था।

राजनीतिक दबाव बढ़ता गया।

देवकेतु और सौम्या
एक बार फिर
अलग कर दिए गए।

सौम्या को राज्य से निष्कासित कर
ऋषिकानन भेज दिया गया।

देवकेतु पुनः
अपनी पिछली मृत्यु को
जी उठा।

उसने चिल्लाकर कहा—

“इस बार मैं प्रेम को
बलि नहीं चढ़ाऊँगा!”

वीरकेतु ने देवप्रस्थम् पर
आक्रमण कर दिया।

युद्ध छिड़ गया।

रक्त, ध्वज, शंख और
धूल से आकाश भर गया।

देवकेतु
रणभूमि में उतरा।

उसे वह क्षण याद आ गया
जब अनिरुद्धकाल
इसी प्रकार गिरे थे।

ऋषिकानन में
सौम्या ने अग्नि प्रज्वलित की।

“यदि यह प्रेम सत्य है,
तो इसे फिर मरने मत देना,
हे नियति!”

उसका शरीर
दीप्ति से आलोकित हो उठा।

देवताओं ने कहा—

“पुनर्जन्म का चक्र
आज टूट सकता है…”

रणभूमि में
वीरकेतु का अंतिम बाण
देवकेतु की ओर बढ़ा।

उस क्षण
देवकेतु के कानों में
पिछले जन्म की वही आवाज़ गूँजी—

“इस बार मत जाना…”

देवकेतु ने बाण रोका,
पर देवकेतु के बाण से वीरकेतु का सीना भेद गया।

धरती थर्रा उठी।

वीरकेतु गिर पड़ा।

उसी क्षण
ऋषिकानन से
प्रकाश की एक रेखा निकली।

सौम्या की आत्मा की आवाज़ पे
रणभूमि में पहुँची।
सौम्या ने देवकेतु को देखा,
युद्ध विजय के बाद, रणभूमि में लेटा हुआ है

उसने देवकेतु का सिर
अपनी गोद में रखा।

देवकेतु की आँख खुली।

दोनों मुस्कराए।

देवकेतु ने कहा—

“इस बार…
मुझे मौत से डर नहीं था…”
अब तुम मेरे हो..

सौम्या बोली—

“क्योंकि इस बार
हम साथ जीवन जी रहे हैं…”

दोनों की अनोखी प्यार की दुनिया में खो गए..
“काल के उस पार,” सच्चे प्यार की जीत हुई

आकाश से
ऋषियों की वाणी आई—

“प्रेम ने आज
कर्म के बंधन को तोड़ा,
काल को पराजित किया…”

देव-स्तंभ
स्वयं विलीन हो गया।

पुनर्जन्म का चक्र
समाप्त हुआ।

उधर आश्रम में
सुमेधा और नारायण
ध्यान में लीन थे।

दोनों की आँखों से
एक साथ आँसू गिरे।

नारायण बोले—

“अब उन्हें
फिर लौटना नहीं पड़ेगा…”

सुमेधा मुस्कराई—

“अब वे
काल के उस पार
स्थायी हो गए हैं…”

सुमेधा और नारायण का भी मिलन हो गया..

आज के दौर में,

देवप्रस्थम् खंडहर बन गया।
राजवंश मिट गया।

पर लोककथा रह गई—

“दो आत्माएँ थीं,
जिनका प्रेम
मृत्यु से आगे भी जीवित रहा…”

लोग आज भी
उस स्थल पर दीये जलाते हैं
जहाँ देवकेतु गिरे थे।

कहा जाता है—

पूर्णिमा की रात
दो प्रकाश-पुंज
नदी के ऊपर मिलते हैं।

*और एक स्वर गूँजता है—*

“अब कोई पुनर्जन्म नहीं,
अब कोई बिछड़न नहीं…
साँसों में तेरी ख़ुशबू बसी है,
धड़कन में बस तेरा नाम है,”

प्रेम शरीर नहीं देखता,
काल नहीं देखता,
मृत्यु नहीं देखता…

वह केवल
आत्मा पहचानता है।

और जो आत्माएँ
एक-दूसरे को पा लें,
वे फिर कभी
नहीं बिछड़तीं।”

✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*