“जन्मतिथि पर वंदन तुम्हें,
हे शब्दों के साधक,
हे मनुष्य-जीवन के दार्शनिक कवि—
भगवतीचरण वर्मा!
आज हम अर्पित करते हैं
श्रद्धा-सुमन, भावों का सिंधु,
क्योंकि तुमने साहित्य को दिया
एक दर्पण, एक दिशा।
चित्रलेखा—वह पतली-सी पुस्तक,
पर भीतर संजोए समंदर की गहराई।
रत्नाकर ऋषि का संवाद,
श्वेतांक और विशालदेव के प्रश्न,
पाप और पुण्य के रहस्य पर
एक अनोखी व्याख्या।
तुमने कहा—
“पाप और पुण्य जन्मजात नहीं होते,
वे तो परिस्थितियों की उपज हैं।
विचार में पाप कभी नहीं,
पाप तो कर्मों में बसता है।
अनुराग है इच्छा का रंग,
वैराग है तृप्ति का संग।”
कितना अद्भुत, कितना नवीन!
उस समय की पारंपरिक धारा से परे,
तुमने दिखाया मनुष्य का सच—
कि हम सब कहीं न कहीं
परिस्थितियों के दास हैं।
चित्रलेखा—वह सशक्त स्त्री,
सौंदर्य से लबरेज़,
पर उससे भी अधिक अपनी इच्छाओं में स्वतंत्र।
न कोई झूठ, न कोई मुखौटा,
सचाई ही उसकी पहचान।
समाज की दीवारों को तोड़कर
उसने चुना अपना रास्ता।
प्यार में भी शांति,
शांति में भी प्यार खोज लिया उसने।
बीजगुप्त—मौर्य साम्राज्य का सेनानायक,
वैभव और ऐश्वर्य में डूबा हुआ,
फिर भी प्रेम के सामने असहाय।
और कुमारगिरि—वह सन्यासी,
जो त्याग में डूबा था,
पर चित्रलेखा की मोहक छवि ने
उसे भी कैदी बना दिया।
राजकुमारी यशोधरा,
वृद्ध मृत्युञ्जय,
और महान चाणक्य—
इन सबके बीच बुनी यह कथा
कभी प्रेम है, कभी राजनीति,
कभी दर्शन है, कभी विद्रोह।
बाईस अध्यायों में बिखरा यह जीवन-दर्शन,
सिखाता है हमें—
न्याय मत करो,
क्योंकि मनुष्य का हर कदम
उसकी परिस्थिति से बंधा होता है।
जो आज पाप दिखता है,
वह कल पुण्य हो सकता है।
जो आज वैराग्य है,
वह कल अनुराग बन सकता है।
हे भगवतीचरण जी,
आपने प्रेम को केवल भाव नहीं,
बल्कि दार्शनिक खोज बना दिया।
आपने स्त्री को केवल देह नहीं,
बल्कि चेतना का प्रतीक बना दिया।
आपने जीवन को केवल संघर्ष नहीं,
बल्कि प्रश्नों की यात्रा बना दिया।
आज आपकी जन्मतिथि पर,
हम नमन करते हैं—
उस लेखनी को,
जिसने परंपरा को चुनौती दी,
जिसने सच को स्वीकारा,
और जिसने हमें सिखाया
कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य है—
“मनुष्य को मत आँको,
उसकी परिस्थिति को समझो।”
श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं आपको,
हे साहित्य-पुरोधा,
आपकी चित्रलेखा अमर रहेगी,
और उसके शब्दों में हमेशा
जीवन का गूढ़ सत्य झिलमिलाता रहेगा।”
🌸🌿🙏
*✍️ “सुशील कुमार सुमन”*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर








