लेखक: *“सुशील कुमार सुमन”*
अध्यक्ष, IOA,
SAIL ISP, बर्नपुर
“हुल जोहार”—यह केवल एक उद्घोष नहीं है, यह स्वाभिमान, बलिदान और आत्मगौरव का प्रतीक है। यह 30 जून को मनाया जाने वाला ‘हूल दिवस’ केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि उस समग्र जनक्रांति की याद है जिसने संथाल परगना की शांत, सरल, और परिश्रमी वनवासी आत्माओं को असाधारण वीरता और संगठित प्रतिरोध में रूपांतरित कर दिया। 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को हम सब जानते हैं, परंतु उससे दो वर्ष पूर्व 1855 में ही संथालों ने जो ज्वाला भड़काई थी, वह स्वतंत्रता संघर्ष की पहली चेतना थी।
झारखंड के संथाल परगना की भूमि न केवल उपजाऊ है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध है। यहां के आदिवासी समाज की परंपराएं, प्रकृति प्रेम, संगीत, नृत्य और सामाजिक एकता उन्हें विशिष्ट बनाती है। वे भूमि से जुड़े हुए लोग हैं—धरती उनके लिए केवल संसाधन नहीं, माता तुल्य है। परंतु इसी श्रद्धा और सरलता का शोषण सदियों से बाहरी शक्तियां करती रही हैं।
जमींदारी प्रथा, साहूकारी व्यवस्था और औपनिवेशिक नीति के त्रिकोण ने संथालों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को तोड़ने का प्रयास किया। अंग्रेजों के आगमन के साथ यह शोषण और भी संगठित हो गया। जमींदारों और अंग्रेज अधिकारियों की मिलीभगत से वनवासियों पर दोहरी मार पड़ने लगी।
संथालों के जीवन में वनोपज महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। वे अपनी उपज को बाजार में ले जाते और बदले में घरेलू उपयोग की आवश्यक वस्तुएं प्राप्त करते। परंतु जमींदारों और साहूकारों ने एक षड्यंत्रकारी तंत्र बना लिया था—कीमती लाख, शहद, तेंदूपत्ता, रेशम, लकड़ी जैसी उपज के बदले उन्हें नमक जैसी सस्ती वस्तु दी जाती। साहूकार तो और भी क्रूर थे। किसी घरेलू आवश्यकता के लिए यदि कोई संथाल कर्ज ले लेता, तो उस पर ब्याज इतना चढ़ा दिया जाता कि जीवन भर उसे चुकाना असंभव हो जाता।
इस अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की ज्वाला पहली बार 1789 में बाबा तिलका मांझी ने जलाई। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष कर यह दिखा दिया कि आदिवासी समाज केवल सहनशील नहीं, साहसी भी है। परंतु उनका अंत बहुत क्रूरता से हुआ—घोड़े की पूंछ से बांधकर उन्हें सड़कों पर घसीटा गया और फिर फांसी दे दी गई। पर उनकी चिंगारी बुझी नहीं।
30 जून 1855 को, भोगनाडीह गांव के दो वीर पुत्र—सिद्धू और कान्हू मुर्मू ने अपने दो और भाइयों चांद और भैरव के साथ मिलकर इतिहास रच दिया। 10,000 से अधिक संथालों की सभा में उन्होंने ‘संथाल हूल’—अर्थात विद्रोह—की घोषणा की और स्वतंत्र ‘संथाल राज्य’ की स्थापना की उद्घोषणा कर दी। अंग्रेज कमिश्नर को 15 दिन का समय देकर भागलपुर सूचना भी भेजी गई। यह राजनीतिक परिपक्वता और आत्मबल की पराकाष्ठा थी।
संथालों ने अपने पारंपरिक ढंग से युद्ध की घोषणा की। शालवृक्ष की टहनी को घर-घर घुमाकर संदेश दिया गया—यह टहनी ‘हूल’ का प्रतीक बनी। संथाल समाज की विशेषता यही थी कि वह बिना किसी लिखित संचार व्यवस्था के, सामूहिक चेतना से संचालित होता था।
विद्रोह इस कदर प्रबल था कि पूरे क्षेत्र में अंग्रेजी शासन ध्वस्त हो गया। 50,000 संथाल वीरों का दल कोलकाता की ओर बढ़ चला। अंग्रेजों की नींद उड़ गई। मेजर बूरी के नेतृत्व में सेना भेजी गई, परंतु 5 घंटे के रक्तरंजित युद्ध में संथालों ने पाकुड़ किले पर कब्जा कर लिया। अंग्रेज सैनिकों की बड़ी संख्या मारी गई। कंपनी शासन विचलित हो गया और पूरे इलाके में ‘मार्शल ला’ लागू कर दिया गया। अब सेना को खुली छूट मिल गई।
अंग्रेजी सेना के पास आधुनिक हथियार थे, तोपें थीं, बंदूकें थीं। पर संथालों के पास तीर-कमान, भाले, लाठी और आत्मबल था। नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी—रक्त की नदियां बह गईं। लगभग 20,000 संथाल वीरों ने बलिदान दिया। यह संख्यात्मक रूप से भले ही अंग्रेजों से कम थे, पर मनोबल और संगठन शक्ति में वे कहीं अधिक ऊंचे थे।
ब्रिटिश इतिहासकार हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा—“संथालों को आत्मसमर्पण का अर्थ नहीं पता था। जब तक उनका नगाड़ा बजता था, वे लड़ते थे। जब तक उनमें एक भी शेष रहता, वह लड़ता। ब्रिटिश सेना का कोई भी अधिकारी इस बलिदान से अछूता नहीं रहा। सभी श्रद्धा से नतमस्तक हो गए।”
यह महज लड़ाई नहीं, जनआंदोलन था, आत्मसम्मान की लड़ाई थी। कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री’ में इसे जनक्रांति कहा।
इस संघर्ष में चारों भाई—सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव वीरगति को प्राप्त हुए। परंतु उनकी स्मृति आज भी जीवंत है। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया है, और झारखंड सरकार ने अनेक स्मारक बनवाए हैं। भोगनाडीह आज एक तीर्थस्थल बन चुका है।
हर वर्ष 30 जून को ‘हूल दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस केवल संथाल समाज का नहीं, भारत की हर उस आत्मा का पर्व है जो अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती है। यह उस चेतना का स्मरण है जो कहती है—शोषण चाहे जितना भी संगठित हो, जब तक जनता की एकता और आत्मबल जीवित है, अन्याय का तख्त हिल सकता है।
आज जब समाज में आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक विघटन और राजनीतिक स्वार्थ की दीवारें खड़ी हो रही हैं, तब ‘हूल’ हमें एकता, आत्मबल और संगठन की शिक्षा देता है। यह हमें याद दिलाता है कि अधिकार मांगने से नहीं, अर्जित करने से मिलते हैं।
‘हूल जोहार’ का उद्घोष केवल इतिहास की प्रतिध्वनि नहीं, यह वर्तमान का पथप्रदर्शक है। यह बलिदान की कथा है, संगठन की शक्ति है, आत्मगौरव की चिंगारी है। सिद्धू-कान्हू जैसे वीर सपूतों का संघर्ष हमें सिखाता है कि जब उद्देश्य पवित्र हो, तो संसाधन की कमी भी बाधा नहीं बनती।
“आइए, इस ‘हूल दिवस’ पर हम सभी संकल्प लें कि हम सामाजिक न्याय, समानता और आत्मगौरव की उस विरासत को आगे बढ़ाएं जो हमारे पूर्वजों ने अपने लहू से लिखी है।”
*“हुल जोहार! सिद्धू-कान्हू अमर रहें!”*




















