*“रंग, रण और रिश्ते !..”*
“गंगा के तट पर बसी काशी उस दिन कुछ अलग ही लग रही थी। सुबह की पहली किरण जब अस्सी घाट की सीढ़ियों पर पड़ी, तो ऐसा लगा मानो समय स्वयं ठहरकर इस प्राचीन नगरी को निहार रहा हो। हवा में हल्की-सी ठंडक थी, पर वातावरण में बेचैनी भी घुली हुई थी।
देश में होलिका दहन की तैयारियाँ चल रही थीं। दूसरी ओर विश्व के समाचार चैनलों पर ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की खबरें थीं। और इसी बीच टी-20 विश्व कप का उत्साह भी युवाओं के हृदय में लहरें उठा रहा था।
युद्ध, उत्सव और खेल—तीनों एक साथ जीवन के रंग बनकर सामने खड़े थे।
इन्हीं रंगों के बीच पाँच युवा—गोपाल, सुधा, आनंद, सुमित और राधा—अपनी-अपनी भावनाओं और सपनों के साथ जीवन की राह पर चल रहे थे।
*“Banaras Hindu University (BHU) – विचारों का संगम”*
बीएचयू का विशाल सिंहद्वार उस दिन भी छात्रों का स्वागत कर रहा था। परिसर में होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी की जा रही थीं।
गोपाल इतिहास विभाग का छात्र था। उसकी आँखों में राष्ट्रप्रेम की चमक थी। वह अक्सर कहता,
“काशी ने कितने आक्रमण देखे हैं, पर इसकी आत्मा कभी नहीं टूटी।”
सुधा समाजशास्त्र की छात्रा थी। उसकी सोच गहरी और संवेदनशील थी। वह समाचारों को ध्यान से पढ़ती और कहती,
“युद्ध कभी समाधान नहीं होता, वह केवल घाव देता है।”
आनंद राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी था। उसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गहरी रुचि थी। इन दिनों वह ईरान-इज़राइल-अमेरिका के समीकरणों पर शोध कर रहा था।
सुमित क्रिकेट का दीवाना था। उसकी दुनिया फिलहाल टी-20 विश्व कप के इर्द-गिर्द घूम रही थी।
“इस बार कप हमारा है!” वह जोश में कहता।
राधा साहित्य विभाग में थी। उसकी डायरी में प्रेम, पीड़ा और आशा के गीत बसते थे।
कैंपस के केंद्रीय पुस्तकालय के बाहर पाँचों मित्र बैठे थे। मोबाइल पर समाचार चल रहे थे।
आनंद ने कहा,
“स्थिति गंभीर है। यदि यह टकराव बढ़ा, तो पूरी दुनिया प्रभावित होगी।”
गोपाल की भौंहें तन गईं।
“भारत को मजबूत रहना होगा। इतिहास गवाह है, जब भी विश्व में अशांति हुई, भारत ने शांति का मार्ग दिखाया।”
सुधा ने धीमे स्वर में कहा,
“पर क्या हम अपने भीतर शांति रख पा रहे हैं? सोशल मीडिया पर नफरत बढ़ रही है।”
राधा ने अपनी डायरी बंद करते हुए कहा,
“युद्ध बाहर से पहले भीतर शुरू होता है।”
सुमित अचानक बोला,
“अरे, इतना गंभीर मत बनो! कल भारत का मैच है। पूरा हॉस्टल साथ बैठेगा।”
सब हँस पड़े। पर हँसी के पीछे एक अनकहा डर भी था—दुनिया बदल रही थी।
होलिका दहन की रात आई। बीएचयू के मैदान में लकड़ियों का बड़ा ढेर सजाया गया था। चारों ओर छात्र-छात्राएँ इकट्ठा थे।
पंडित जी ने मंत्रोच्चार शुरू किया। अग्नि प्रज्वलित हुई। लपटें आकाश को छूने लगीं।
गोपाल ने कहा,
“यह अग्नि केवल होलिका की नहीं, अहंकार और अन्याय की भी है।”
सुधा ने आग की लपटों को देखते हुए कहा,
“काश, विश्व के नेता भी इस अग्नि में अपने अहंकार जला दें।”
आनंद ने जोड़ा,
“राजनीति में शक्ति आवश्यक है, पर विवेक उससे भी अधिक।”
राधा ने धीरे से कहा,
“और प्रेम सबसे अधिक।”
अग्नि की लपटें जैसे पाँचों के चेहरों पर अलग-अलग अर्थ लिख रही थीं।
उसी समय सुमित के मोबाइल पर नोटिफिकेशन आया—“कल भारत का मैच तय समय पर होगा।”
वह चिल्लाया,
“देखा! दुनिया चाहे कुछ भी हो, खेल चलता रहेगा।”
गोपाल मुस्कराया,
“शायद यही जीवन है—संघर्ष के बीच भी उत्सव।”
क्रिकेट का जुनून
अगले दिन हॉस्टल का कॉमन रूम खचाखच भरा था। भारत का टी-20 मैच था। टीवी स्क्रीन के सामने सबकी साँसें थमी थीं।
पहला विकेट गिरा—सन्नाटा।
फिर चौके-छक्कों की बरसात—उत्साह।
सुमित हर गेंद पर उछल रहा था।
“यही है हमारी ताकत! देखना, कप लेकर आएँगे।”
गोपाल बोला,
“क्रिकेट हमें एक करता है। यहाँ धर्म, भाषा, जाति सब पीछे छूट जाते हैं।”
सुधा ने कहा,
“काश, राजनीति भी ऐसा कर पाती।”
आनंद ने गंभीर होकर कहा,
“खेल कूटनीति का माध्यम भी होता है। कई बार मैच युद्ध से बेहतर संवाद बन जाता है।”
राधा ने नोट किया—
“जब बल्ला गेंद से मिलता है, तब सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।”
मैच रोमांचक मोड़ पर पहुँचा। अंतिम ओवर। पूरे कमरे में तनाव।
और फिर… अंतिम गेंद पर चौका!
कमरा जयकारों से गूँज उठा—“भारत माता की जय!”
सुमित की आँखों में आँसू थे।
“यह जीत सिर्फ खेल की नहीं, उम्मीद की है।”
उत्साह के बीच अचानक टीवी स्क्रीन पर ब्रेकिंग न्यूज़ चली—
“मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा, हवाई हमले की खबर।”
कमरे में फिर सन्नाटा।
आनंद ने टीवी की आवाज़ बढ़ाई।
“यदि यह बढ़ा, तो तेल की कीमतें, अर्थव्यवस्था, सब प्रभावित होंगे।”
गोपाल बोला,
“भारत को संतुलन रखना होगा। हम शांति के पक्षधर हैं।”
सुधा की आँखें नम हो गईं।
“हर बम के साथ किसी माँ का सपना टूटता है।”
राधा ने धीरे से कहा,
“क्या इंसान कभी सीख पाएगा?”
सुमित, जो अभी तक जोश में था, अब शांत था।
“हम यहाँ जश्न मना रहे हैं, और कहीं लोग डर में जी रहे हैं।”
गोपाल ने उसके कंधे पर हाथ रखा,
“इसीलिए हमें अपने भीतर प्रेम बचाए रखना होगा।”
निश्चल प्रेम
अगले दिन पाँचों मित्र गंगा घाट पर मिले। शाम की आरती का समय था। दीप जल रहे थे। गंगा की लहरें शांत थीं, जैसे संसार की उथल-पुथल से परे।
राधा ने कहा,
“देखो, गंगा सबको समेट लेती है—अच्छा-बुरा, युद्ध-शांति, जीत-हार।”
सुधा बोली,
“शायद प्रेम भी ऐसा ही होना चाहिए।”
गोपाल ने गंगा जल अपने माथे से लगाया।
“भारत की आत्मा प्रेम है। यदि हम उसे बचाए रखें, तो कोई युद्ध हमें भीतर से नहीं तोड़ सकता।”
आनंद ने कहा,
“विश्व राजनीति जटिल है। पर व्यक्ति का हृदय सरल हो सकता है।”
सुमित ने मुस्कराकर कहा,
“और क्रिकेट हमें सिखाता है—हार के बाद भी अगला मैच खेलना है।”
सब हँस पड़े।
राधा ने अपनी डायरी में लिखा—
“आज युद्ध की खबरें हैं,
पर होली की आग भी है।
आज विश्व कप का शोर है,
पर गंगा की शांति भी है।
*जीवन विरोधाभासों का संगम है—*
पर प्रेम ही उसका तट है।”
अगली सुबह काशी रंगों में डूब गई। बीएचयू का परिसर गुलाल से भर गया।
गोपाल ने सुमित को रंग लगाया।
“यह रंग हमारी एकता का है।”
सुधा ने राधा को गुलाबी रंग लगाया।
“यह प्रेम का है।”
आनंद ने सब पर हल्का-सा नीला रंग डाला।
“यह शांति का है।”
सुमित ने हँसते हुए कहा,
“और यह हरा रंग उम्मीद का!”
राधा ने सबको देख कर कहा,
“हम पाँच रंग नहीं, पाँच दिशाएँ हैं—पर केंद्र एक है।”
उसी समय मोबाइल पर फिर खबर आई—तनाव कम करने के लिए वार्ता शुरू।
सुधा ने राहत की साँस ली।
“शायद दुनिया अभी पूरी तरह पागल नहीं हुई।”
गोपाल ने कहा,
“हर अँधेरी रात के बाद सुबह आती है।”
संध्या को पाँचों मित्र फिर घाट पर बैठे थे। दूर कहीं ढोल की आवाज़ थी, बच्चे रंग खेल रहे थे।
आनंद ने कहा,
“हम युवा हैं। हमें केवल समाचारों पर प्रतिक्रिया नहीं देनी, बल्कि भविष्य बनाना है।”
गोपाल बोला,
“राष्ट्रप्रेम केवल नारे नहीं, कर्म है।”
सुधा ने कहा,
“मानवता सीमाओं से बड़ी है।”
सुमित मुस्कराया,
“और जीत केवल ट्रॉफी नहीं, दिलों की भी होनी चाहिए।”
राधा ने गंगा की ओर देखते हुए कहा,
“यदि हमारे भीतर निश्चल प्रेम जीवित है, तो कोई युद्ध स्थायी नहीं।”
गंगा की लहरें जैसे उनकी बातों की साक्षी थीं।
काशी ने अनेक युग देखे हैं—आक्रमण, स्वतंत्रता संग्राम, आपातकाल, महामारी। पर हर बार जीवन ने स्वयं को पुनः रचा है।
पाँचों मित्रों ने एक-दूसरे का हाथ थामा।
गोपाल ने कहा,
“वादा करो, चाहे दुनिया में कितना भी शोर हो, हम अपने भीतर शांति और प्रेम को बचाए रखेंगे।”
सबने एक साथ कहा,
“वादा।”
उस वर्ष टी-20 विश्व कप का परिणाम जो भी रहा, वह उनके लिए प्रतीक मात्र था।
होलिका की अग्नि ने उन्हें सिखाया—अहंकार जलता है, प्रेम नहीं।
विश्व की राजनीति ने सिखाया—शक्ति के साथ विवेक जरूरी है।
क्रिकेट ने सिखाया—आखिरी गेंद तक उम्मीद जीवित रहती है।
और काशी ने सिखाया—जीवन अनश्वर है।
जब रात गहराई, तो घाटों पर दीपक टिमटिमा रहे थे।
राधा ने अंतिम पंक्ति लिखी—
“युद्ध आएँगे, उत्सव आएँगे, खेल होंगे, समाचार बदलेंगे—
पर यदि हृदय में निश्चल प्रेम है,
तो हर काशी अमर है,
हर मन गंगा है,
और हर जीवन एक नई होली।”
गंगा की लहरों पर चाँद की परछाईं थिरक रही थी—
मानो स्वयं जीवन मुस्करा रहा हो।”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










