“सन 1931, मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुच्वाडा गाँव में जन्मे आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश का जीवन जितना अद्भुत था, उतना ही अनगिनत भावनाओं से भरा हुआ भी। उनकी आध्यात्मिक यात्राओं, अनोखी शिक्षाओं और ध्यान की गहराइयों के बीच कुछ ऐसे पल भी थे जो केवल परिवार ही जानता है—खासकर उनकी आठवीं बहन निशा भारती।
जबलपुर के मनमोहन नगर में रहने वाली निशा भारती के दिल में आज भी कुछ यादें अनमोल खज़ाने की तरह सजी हुई हैं। इनमें से एक स्मृति तो उनकी अलमारी में चुपचाप रखी हुई ओशो की वह चप्पल है, जिसे उन्होंने अपने हाथों से सहेज कर रखा था। यह वही चप्पल थी, जब ओशो एक बार उनसे मिलने आए थे और निशा ने बड़े प्यार से उसे संभाल लिया था—जैसे वह कोई साधारण वस्तु नहीं, बल्कि भाई के स्नेह का जीवित प्रतीक हो।
लेकिन निशा के जीवन का सबसे भावुक और यादगार क्षण आया 8 अगस्त 1979 को। दिन था रक्षा बंधन का, और संयोग से उसी दिन उनके पिता पूना के अस्पताल में भर्ती थे। पूरा परिवार अस्पताल में था। माँ ने सहज भाव से कहा—
*“यहीं सभी भाइयों को राखी बाँध दो।”*
पर निशा के मन में एक ही छवि थी—अपने भाई ओशो की। वे उस समय अस्पताल में नहीं थे, बल्कि अपने आश्रम में ध्यानमग्न थे। निशा का मन अशांत हो उठा। उन्होंने तय किया कि चाहे जैसे भी हो, वे आज राखी ओशो को ही बाँधेंगी।
आश्रम में सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि कोई भी चीज़ अंदर ले जाना लगभग असंभव था। निशा ने चुपके से एक छोटी सी राखी रूमाल में छुपा ली और दृढ़ संकल्प के साथ आश्रम पहुँचीं। जब उनकी नज़र ओशो पर पड़ी, तो उनकी आँखें भीग गईं। ओशो ने सबसे पहले पूछा—
*“दद्दा को देखने गई थीं?”*
निशा ने सिर हिलाकर “हाँ” कहा, और फिर धीरे से बोलीं—
“भाई, मैं आपको राखी बाँधना चाहती हूँ।”
तभी पास खड़े ओशो के बॉडीगार्ड ने उन्हें रोकने की कोशिश की। यह देख निशा की आँखों से आँसू बह निकले। ओशो ने यह देखा, तो अपनी गहरी, करुणा भरी नज़रों से गार्ड की ओर देखा और बोले—
*“उन्हें आने दो।”*
अगले ही पल उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। निशा ने काँपते हाथों से राखी बाँधी, और वह क्षण मानो समय में स्थिर हो गया—एक आध्यात्मिक गुरु और एक बहन के बीच का स्नेह, जो किसी भी सांसारिक बंधन से परे था।
उसी दिन एक और प्रसंग घटा—निशा की छोटी बहन ने ओशो से जिद की कि वह आज ही उनसे दीक्षा लेना चाहती है। ओशो ने पहले कई बार मना किया, पर अंत में उसकी जिद और भावनाओं के आगे झुककर उन्होंने संन्यास धारण करने की अनुमति दे दी।
निशा कहती हैं—
“भैया का स्वभाव बड़ा शांत था। वे बहुत कम बोलते, पर उनके मौन में भी गहरी बातें छिपी होती थीं। अक्सर वे ध्यान में लीन रहते, पर जब भी परिवार के साथ होते, उनकी उपस्थिति ही हमारे लिए आशीर्वाद होती थी।”
आज, दशकों बाद भी, निशा के पास वह राखी का स्मरण और वह पुरानी चप्पल है—जो यह बताने के लिए काफी है कि रक्षा बंधन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आत्मा और प्रेम का ऐसा धागा है, जो जीवन भर टूटता नहीं।
*“जय श्री कृष्ण – और भाई-बहन के प्रेम को नमन।”*
*✍️ “सुशील कुमार सुमन”*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी बर्नपुर




















