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*”दो जून की रोटी!..”* *(“जहाँ मन भय से मुक्त हो”)*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

*“दो जून की रोटी!..”*
*(“जहाँ मन भय से मुक्त हो”)*

“सेवा में,
पेशे ख़िदमत है,
दो जून की रोटी।।
किस्मत वालों को नसीब होती है !!!..”

गंगा किनारे का वह गाँव!..
“वाराणसी से लगभग तीस किलोमीटर दूर गंगा के किनारे बसा एक छोटा-सा गाँव था—रामपुरा।
गाँव छोटा था, लेकिन उसकी समस्याएँ बड़ी थीं। अधिकांश लोग खेती-बाड़ी या दिहाड़ी मजदूरी करके जीवनयापन करते थे। बरसात अच्छी हो जाए तो खेत लहलहा उठते, अन्यथा पूरे वर्ष घरों में अभाव का अंधेरा पसरा रहता।
उसी गाँव के अंतिम छोर पर एक जर्जर झोपड़ी थी। कभी वहाँ रामदास और उनकी पत्नी सीता अपने इकलौते पुत्र मोहन के साथ रहते थे।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
पहले बाढ़ में रामदास बह गए।
फिर बीमारी ने सीता को भी अपने आगोश में ले लिया।
और केवल दस वर्ष की आयु में मोहन अनाथ हो गया।
उस दिन से उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा प्रश्न था—
*“आज दो जून की रोटी कहाँ से मिलेगी?”*

भूख का सबसे बड़ा पाठ
सर्दियों की एक सुबह।
कोहरा इतना घना था कि सामने खड़ा व्यक्ति भी दिखाई नहीं दे रहा था।
मोहन रात भर भूखा था।
पिछले दिन उसे केवल आधी रोटी मिली थी।
सुबह वह गाँव के चौधरी के घर पहुँचा।
“मालिक, कोई काम मिल जाए तो…”
चौधरी ने ऊपर से नीचे तक देखा।
“अरे मोहन! गौशाला में गोबर पड़ा है। साफ कर दे।”
मोहन तुरंत काम में लग गया।
तीन घंटे बाद काम समाप्त हुआ।
उसे मजदूरी में दो सूखी रोटियाँ और थोड़ा-सा नमक मिला।
उस दिन उसे लगा मानो कोई खजाना मिल गया हो।
वह गंगा किनारे बैठा और धीरे-धीरे रोटी खाने लगा।
तभी उसकी नजर एक वृद्ध भिखारी पर पड़ी।
वृद्ध कई दिनों से भूखा लग रहा था।

मोहन कुछ देर सोचता रहा।
फिर उसने अपनी एक रोटी वृद्ध को दे दी।
वृद्ध की आँखें भर आईं।
“बेटा, तूने खुद खाया?”
मोहन मुस्कुराया।
*“बाबा, भूख तो रोज लगती है। लेकिन इंसानियत रोज नहीं मिलती।”*
वृद्ध ने उसके सिर पर हाथ रखा।
उस आशीर्वाद की गर्माहट उसे रोटी से भी अधिक तृप्त कर गई।

स्कूल की खिड़की
हर सुबह गाँव के बच्चे सरकारी विद्यालय जाते थे।
मोहन दूर खड़ा होकर उन्हें देखता।
उसे सबसे अधिक आकर्षित करती थीं उनकी किताबें।
उसे अक्षरों से प्रेम था।
लेकिन गरीबी ने उसके हाथों में किताबों की जगह मजदूरी का फावड़ा थमा दिया था।
एक दिन विद्यालय के प्रधानाध्यापक हरिनारायण मिश्र जी ने उसे खिड़की के बाहर खड़े देखा।
“अरे बेटा, रोज यहाँ क्यों खड़े रहते हो?”
मोहन झिझका।
“मास्टर साहब… पढ़ना चाहता हूँ।”
“तो अंदर क्यों नहीं आते?”
“मेरे पास फीस नहीं है।”
मिश्र जी मुस्कुरा उठे।
उन्होंने कहा—
*“बेटा, ज्ञान पर किसी का पहरा नहीं होता।”*
अगले दिन से मोहन विद्यालय आने लगा।
वह पुराने कपड़ों में आता।
कई बार भूखा आता।
लेकिन उसकी आँखों में सीखने की भूख सबसे बड़ी थी।

एक कविता जिसने जीवन बदल दिया
एक दिन विद्यालय में मिश्र जी ने एक कविता सुनाई।
उन्होंने अंग्रेजी में पढ़ना शुरू किया—
“Where the mind is without fear and the head is held high…”
फिर उसका हिंदी अर्थ समझाया।
*“जहाँ मन भय से मुक्त हो और सिर ऊँचा हो।”*
मोहन मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहा।
जब कविता समाप्त हुई, तो उसकी आँखें चमक रही थीं।
उसने पहली बार महसूस किया कि गरीबी शरीर को बाँध सकती है, लेकिन मन को नहीं।
उस दिन उसने अपनी पुरानी कॉपी में कविता का हिंदी अर्थ लिख लिया।
वह कॉपी उसके लिए किसी धार्मिक ग्रंथ से कम नहीं थी।

भय के विरुद्ध संघर्ष
गाँव के कुछ लोग उसका मजाक उड़ाते।
“अरे अनाथ! पढ़-लिखकर कलेक्टर बनेगा क्या?”
“पहले पेट भर रोटी का इंतजाम कर।”
लेकिन अब मोहन बदल चुका था।
उसे कविता की पहली पंक्ति याद रहती—
“जहाँ मन भय से मुक्त हो…”
उसने तय कर लिया कि वह भय को अपने जीवन का मालिक नहीं बनने देगा।
भूख का भय।
गरीबी का भय।
समाज के तानों का भय।
वह हर भय से लड़ना सीख रहा था।

ज्ञान सचमुच मुक्त है
दिन में मजदूरी।
शाम को पढ़ाई।
रात में स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर किताबें।
यही उसकी दिनचर्या बन गई।
कई बार भूख के कारण आँखों के सामने अंधेरा छा जाता।
लेकिन वह किताब बंद नहीं करता।
उसे लगता था कि शिक्षा ही वह चाबी है जो उसकी किस्मत का बंद दरवाजा खोल सकती है।
धीरे-धीरे उसने पूरे विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करना शुरू कर दिया।
गाँव वाले आश्चर्यचकित थे।
जिस लड़के को दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती थी, वह पढ़ाई में सबसे आगे निकल रहा था।

सत्य का मूल्य
एक दिन बाजार में काम करते समय एक व्यापारी का पर्स गिर गया।
पर्स में दस हजार रुपये थे।
मोहन चाहता तो रख सकता था।
उसकी जिंदगी बदल सकती थी।
लेकिन उसने पर्स उठाकर व्यापारी को लौटा दिया।
व्यापारी ने पूछा—
“तुमने पैसे क्यों नहीं रख लिए?”
मोहन ने उत्तर दिया—
*“साहब, भूख ने मुझे गरीब बनाया है, बेईमान नहीं।”*
व्यापारी की आँखें भर आईं।
उसने मोहन की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया।

संकीर्ण दीवारों से परे
मोहन अब समझ चुका था कि समाज केवल गरीबी से नहीं, बल्कि जाति, भेदभाव और संकीर्ण सोच से भी बँटा हुआ है।
उसे कविता की पंक्तियाँ याद आईं—
“Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls.”
उसने निश्चय किया कि वह ऐसा समाज बनाएगा जहाँ इंसान की पहचान उसके कर्म से होगी, जन्म से नहीं।

अथक प्रयास
समय बीतता गया।
मोहन ने इंटरमीडिएट में जिला टॉप किया।
फिर वाराणसी के कॉलेज में प्रवेश पाया।
गाँव से शहर तक का सफर आसान नहीं था।
वह सुबह अखबार बाँटता।
दोपहर में कॉलेज जाता।
शाम को ट्यूशन पढ़ाता।
रात में स्वयं पढ़ता।
उसकी जिंदगी संघर्ष का दूसरा नाम बन चुकी थी।
लेकिन उसके भीतर एक सपना जीवित था।
एक ऐसा भारत जहाँ कोई बच्चा भूख के कारण पढ़ाई न छोड़े।

स्वतंत्रता का स्वर्ग
वर्षों बाद वही मोहन भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी बन गया।
जब वह अपने गाँव लौटा, तो पूरा रामपुरा उसका स्वागत कर रहा था।
उसने गाँव में विद्यालय बनवाया।
पुस्तकालय बनवाया।
अनाथ बच्चों के लिए छात्रावास बनवाया।
मध्याह्न भोजन योजना को मजबूत किया ताकि कोई बच्चा भूखा न रहे।
उद्घाटन समारोह में उसने बच्चों से कहा—
“मैं भी कभी तुम्हारी तरह एक भूखा अनाथ बालक था।”
पूरा मैदान शांत हो गया।
फिर उसने वही कविता सुनाई—
“Where the mind is without fear…”
और कहा—
“इस कविता ने मुझे सिखाया कि भूख से बड़ी चीज़ आशा होती है, और गरीबी से बड़ी चीज़ शिक्षा।”
उसने आकाश की ओर देखा।
गंगा की धारा शांत बह रही थी।
सूर्य अस्त हो रहा था।
और उसे ऐसा लगा जैसे उसकी माँ मुस्कुरा रही हो।
आज उसे केवल दो जून की रोटी नहीं मिली थी।
उसे सम्मान मिला था।
ज्ञान मिला था।
स्वतंत्रता मिली थी।
और सबसे बड़ी बात—
उसे वह भारत दिखाई दे रहा था जिसकी कल्पना गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी—
जहाँ मन भय से मुक्त हो, सिर ऊँचा हो, ज्ञान स्वतंत्र हो, सत्य का सम्मान हो और हर बच्चे को सपने देखने का अधिकार मिले।
यही सच्चा स्वर्ग है।
यही सच्ची आज़ादी है।
और यही एक राष्ट्र की वास्तविक जागृति है।”

*“दो जून की रोटी जीवन देती है,*
*पर शिक्षा जीवन का अर्थ देती है।”*

✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
#सुशीलकुमारसुमन
#युवा