“डीवीसी की दोहरी नीति: राइट बैंक आबाद, लेफ्ट बैंक बर्बाद।”
मैथन की एक ‘आँख’ बुझने को है: क्या लेफ्ट बैंक सचमुच श्मशान बन जाएगा?
कुल्टी।मैथन बांध के निर्माण के समय जो सपना देखा गया था, वह किसी सुंदर दुल्हन के जैसा था। उस सपने के दो नयन थे—एक तरफ का ‘लेफ्ट बैंक’ (पश्चिम बंगाल) और दूसरी तरफ का ‘राइट बैंक’ (झारखंड)। तब दोनों तरफ एक ही लय थी, एक ही धुन थी और एक ही विकास का संकल्प था। लेकिन वक्त के बेरहम थपेड़ों ने आज इस दुल्हन के एक नयन को इतना धुंधला कर दिया है कि वहां की रोशनी ही बुझती हुई दिखाई दे रही है।
रोशनी और अंधेरे का भेद
आज अगर आप राइट बैंक की ओर देखें, तो वहां चकाचौंध है। डीवीसी मैथन का भव्य मुख्यालय, नामचीन प्राइवेट स्कूल, केंद्रीय विद्यालय, बड़े अस्पताल और बैंकों की कतारें। वहां सड़कें चमकती हैं, सीसीटीवी कैमरे हर कदम पर सुरक्षा का एहसास कराते हैं और स्ट्रीट लाइटें रात को भी दिन जैसा बनाए रखती हैं।
वहीँ, दूसरी ओर का दृश्य दिल को दहला देने वाला है। लेफ्ट बैंक का मंजर किसी भुतहे इलाके जैसा होता जा रहा है। यहाँ की डिस्पेंसरी बरसों से बंद पड़ी है, स्ट्रीट लाइटें कब की दम तोड़ चुकी हैं, और जो स्कूल कभी बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे, आज वे बस कुव्यवस्था की दुहाई दे रहे हैं। यहाँ डीवीसी के सैकड़ों आवास हैं, लेकिन प्रबंधन ने सबको राइट बैंक में बुला लिया। पीछे छूट गया तो बस सन्नाटा और अवैध कब्जों का अंधेरा।
सौतेला व्यवहार और जर्जर होते घर
स्थानीय लोगों की आंखों में आंसू हैं। वे कहते हैं, “क्या लेफ्ट बैंक में रहने वाले इंसान नहीं हैं?” डीवीसी प्रबंधन का रवैया सौतेले पिता जैसा नजर आता है। प्रशासन के लिए अब यहाँ का विकास मायने नहीं रखता। वे अवैध कब्जों को हटाने के बहाने उन क्वार्टरों को भी ध्वस्त कर रहे हैं, जो कभी कर्मचारियों का घर हुआ करते थे।
लोग पूछते हैं—क्यों इन आवासों को कर्मचारियों के लिए फिर से आवंटित नहीं किया जा सकता? यदि कर्मचारी यहाँ रहेंगे, तो यहाँ की दुकानें, स्कूल और जनजीवन फिर से सांस लेने लगेगा। लेकिन नहीं, प्रबंधन तो यहाँ की रौनक मिटाकर इसे एक अघोषित ‘श्मशान’ बनाने पर आमादा है।
79वां स्थापना दिवस और दर्दनाक विडंबना
सबसे बड़ा मज़ाक तो यह है कि इन दिनों डीवीसी बड़े गर्व से अपना 79वां स्थापना दिवस मना रही है। राइट बैंक में जश्न की धूम है, दावतें हो रही हैं, और रोशनी जगमगा रही है। वहीं, लेफ्ट बैंक की गलियों में जलाने के लिए डीवीसी के पास एक दीया तक नहीं है।
अजीब विडंबना है—एक तरफ उत्सव का शोर है और दूसरी तरफ अस्तित्व खोने का मौन।
15 जुलाई: क्या यह आखिरी तारीख होगी?
डीवीसी प्रबंधन ने लेफ्ट बैंक के सभी आवासों को ध्वस्त करने के लिए 15 जुलाई की डेडलाइन तय की है। यह तारीख सिर्फ ईंट-पत्थर गिराने की नहीं, बल्कि उन यादों और उस भविष्य को ढहाने की तारीख है, जिसे कभी मैथन के विकास के लिए बुना गया था।
क्या सचमुच लेफ्ट बैंक के निवासियों का सपना एक खंडहर बनकर रह जाएगा? क्या कोई ऐसा जननेता, कोई ऐसा संवेदनशील अधिकारी नहीं है, जो इस विनाशलीला को रोक सके?
अगर 15 जुलाई को बुलडोजर चल गए, तो मैथन का यह ‘लेफ्ट बैंक’ सिर्फ एक श्मशान ही कहलाएगा। अभी भी वक्त है, शायद उस ‘सुंदर मैथन’ के खोए हुए नयन को फिर से रोशन किया जा सके।










