*”OMG !..”*
द्वारिका (1900)…
“जहाँ समुद्र की लहरें मंदिर की घंटियों से संवाद करती हैं,
जहाँ गोमती नदी का शांत प्रवाह हर पीड़ा को अपने भीतर समेट लेता है।
इस पवित्र नगर की गलियों में भक्ति का उजास था,
पर उन्हीं गलियों के किनारे एक हवेली थी—
एक ऐसी हवेली, जिसके भीतर वर्षों से केवल मौन, भय और टूटे स्वप्न बसते थे।
लोग उसे कहते थे—
“शिवदत्त हवेली”
और उस हवेली के स्वामी थे—
ठाकुर भैरवनाथ राजसिंह
उनका चेहरा लाल अंगार की तरह तपता,
और उनका स्वभाव ऐसा कठोर कि गाँव वाले कहते—
“भैरवनाथ का क्रोध स्वयं काल का रूप है।”
ठाकुर को अपने कुल का गर्व था,
और उस गर्व के आगे किसी की सांस तक की स्वतंत्रता नहीं थी।
उनकी पत्नी थीं—
रानी देवकी
शांत, सहनशील, आँसुओं को भीतर पी जाने वाली स्त्री।
और उनकी चार बेटियाँ—
वसुधा
अन्वी
मालविका
राधा
चारों बेटियाँ फूल थीं,
पर उन्हें एक बंद काँच के जार में कैद कर दिया गया था।
वे घर के भीतर ही रहतीं—
रसोई, पूजा, सिलाई और पिता के आदेशों के बीच।
गोमती घाट पर जाना?
मेला देखना?
सपने बुनना?
यह सब अपराध था।
इन चार बेटियों में तीसरी बेटी—
मालविका
सबसे अलग थी।
उसकी आँखों में प्रश्न थे,
उसके भीतर नदी की तरह बहने की आकांक्षा थी।
वह अक्सर खिड़की से गोमती की ओर देखती,
जहाँ सूर्य की किरणें जल पर चमकती थीं।
वह सोचती—
“यदि नदी बह सकती है,
तो मैं क्यों नहीं?”
एक दिन उसने माँ से पूछा—
“क्या बेटी होना केवल दीवारों में जीना है?”
रानी देवकी ने धीरे से कहा—
“कुछ घरों में यही नियति है।”
मालविका की आँखों में आँसू नहीं, आग थी।
भागने की रात
एक रात…
जब हवेली के दीये बुझ चुके थे,
और ठाकुर का अहंकार नींद में था,
मालविका ने अपने जीवन का निर्णय लिया।
उसने बस एक छोटा सा पोटला उठाया
और चुपचाप निकल गई।
गोमती घाट पर हवा सिहर रही थी,
दीप काँप रहे थे।
नदी जैसे फुसफुसाई—
“जा… जीवन चुन…”
मालविका द्वारिका छोड़ गई।
कई दिनों की यात्रा के बाद वह पहुँची—
मुंबई
वहाँ उसे मिला—
समीर कपूर
एक साधारण युवक,
पर भीतर से बहुत उदार।
समीर ने उसे सम्मान दिया,
स्वतंत्रता दी,
और पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
मालविका ने कहा—
“मैं… अब स्वयं का नाम बनाऊँगी।”
समय बीता…
दोनों ने विवाह किया।
उनके घर जन्मा एक पुत्र—
आरव
मालविका ने पहली बार जीवन को खुलकर जिया।
पर जीवन हमेशा पूर्ण नहीं होता।
कुछ वर्षों बाद
एक बीमारी ने उसे जकड़ लिया।
और एक रात…
मालविका की सांसें थम गईं।
जब यह समाचार द्वारिका पहुँचा,
हवेली में भूचाल आ गया।
ठाकुर भैरवनाथ चीख उठे—
“OMG!..
मेरी बेटी भाग गई थी,
और अब मर गई!”
गाँव में फुसफुसाहट फैल गई—
“इतनी कुलीन बेटी का भागना…
ऐसा कलंक कभी नहीं हुआ!”
हवेली पर मृत्यु की छाया उतर आई।
ठाकुर का क्रोध अब पागलपन बन गया।
वह रातों को पुल पर खड़ा होकर गोमती को घूरता
और बड़बड़ाता—
“इज्जत… इज्जत मिट्टी हो गई…”
कुछ महीनों बाद…
एक सुबह गाँव में शोर मच गया।
गाँव के प्रवेश द्वार पर जो पुराना पुल था,
वहीं ठाकुर भैरवनाथ का शव पड़ा था।
आँखें खुली थीं,
चेहरे पर भय की परछाईं।
लोग चिल्लाए—
“यह दुर्घटना है या हत्या?”
पर कोई उत्तर नहीं मिला।
बस हवेली पर रहस्य का साया और गहरा हो गया।
वर्षों बाद: टूटी हुई हवेली
समय बीता…
वर्षों बीत गए।
अब हवेली जर्जर हो चुकी थी।
ठाकुर के जाने के बाद
कुल का वैभव मिट गया।
तीनों बहनें—
वसुधा, अन्वी और राधा
अब उम्रदराज़ थीं।
उनके पास बस एक छोटा सा खेत था
जो मुश्किल से जीवन चलाता।
उनकी आँखों में गर्व नहीं,
थकान थी।
उनका जीवन उदासी में बीतता।
केवल राधा के भीतर कभी-कभी पुराना अभिमान जाग उठता।
हवेली में एक पुराना सेवक था—
गोपालदास
वह बचपन से इस घर का हिस्सा था।
पर उसके भीतर एक भारी रहस्य था।
सच यह था—
उसने ही ठाकुर भैरवनाथ को पुल पर धक्का दिया था।
क्यों?
क्योंकि वह मालविका से प्रेम करता था।
प्रेम नहीं…
एक पवित्र भावना,
जिसमें मुक्ति की चाह थी।
वह जानता था कि ठाकुर
मालविका को कभी जीने नहीं देगा।
उसने उसे भागने में सहायता की।
और जब ठाकुर ने उसे “कलंक” कहकर श्राप दिया,
तो गोपाल का विवेक टूट गया।
हत्या के बाद
वह अपराधबोध में जीता रहा।
उसका सपना था—
“एक दिन यह हवेली फिर से जीवित होगी।”
एक दिन…
गोमती घाट पर एक नाव रुकी।
एक युवक उतरा।
आँखों में द्वारिका का प्रश्न
और चेहरे पर अनजानी उदासी।
वह था—
आरव
मालविका का पुत्र।
वह पहली बार अपनी माँ की जन्मभूमि आया था।
जब वह हवेली के द्वार पर पहुँचा,
तीनों बहनें स्तब्ध रह गईं।
वसुधा की आँखें भर आईं—
“मालविका का बेटा…”
गाँव के लोग तरह-तरह की बातें करने लगे—
“कलंक का वारिस आया है!”
पर गोपालदास कांप उठा।
उसका अपराध जाग उठा।
प्रेम से नया संतुलन
आरव हवेली में रुका।
धीरे-धीरे
उसकी सरलता ने
हवेली की उदासी को बदलना शुरू किया।
राधा के भीतर जो कठोरता थी,
वह पिघलने लगी।
अन्वी को लगा
कि जीवन में फिर से रोशनी है।
और गोपाल…
उसके भीतर वर्षों से दबा अपराध
अब फूटने लगा।
एक रात उसने आरव के सामने स्वीकार किया—
“मैंने तुम्हारे नाना को मारा था…”
आरव चौंक गया—
“OMG!.. क्यों?”
गोपाल रो पड़ा—
“क्योंकि मैं तुम्हारी माँ को आज़ाद देखना चाहता था…
और मैं खुद को माफ नहीं कर पाया।”
आरव ने गोपाल के काँपते हाथ थामे—
“प्रायश्चित का अर्थ है प्रेम से पुनर्जन्म।”
अंत: गोमती के जल में क्षमा
आरव गोमती घाट पर गया।
दीप जलाए।
और हवेली की स्त्रियाँ पहली बार बाहर आईं।
गोमती का प्रवाह जैसे कह रहा था—
“बंधन टूट गए…”
हवेली में फिर से जीवन लौट आया।
प्रेम ने एक नया संतुलन स्थापित किया।
और द्वारिका ने पहली बार देखा—
कि सबसे बड़ा धर्म
इज्जत नहीं…
स्वतंत्रता और प्रेम है।”
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










