Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

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*”यही जीवन है!..”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“यही जीवन है!..”*

सूर्य की पहली किरण धरती पर उतर रही थी। एक छोटे से गाँव के मिट्टी के घर में एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया आरव।
जब वह जन्मा, तब उसे संसार का कोई ज्ञान नहीं था। वह केवल रोना जानता था, मुस्कुराना जानता था और माँ की गोद में सुकून पाना जानता था।
उसकी माँ अक्सर उसे देखकर कहती—
*“बेटा, जीवन एक यात्रा है। इसे समझने में पूरी उम्र लग जाती है।”*
लेकिन उस समय आरव को क्या पता था कि एक दिन यही वाक्य उसकी पूरी जिंदगी का सार बन जाएगा।

आरव धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।
पहले उसने पलटना सीखा।
फिर बैठना।
फिर रेंगना।
जब भी वह गिरता, उसकी माँ उसे उठाती।
जब भी वह रोता, पिता उसे हँसाते।
उसकी दुनिया बस इतनी थी—
माँ, पिता, खिलौने, और घर का छोटा सा आँगन।
उसे लगता था कि यही पूरा संसार है।
एक दिन वह पहली बार अपने पैरों पर खड़ा हुआ।
दो कदम चला।
फिर गिर गया।
माँ ने ताली बजाई।
पिता ने उसे गोद में उठा लिया।
उस दिन आरव ने सीखा—
*“गिरना हार नहीं है। गिरकर फिर उठना ही जीवन है।”*

कुछ वर्षों बाद आरव स्कूल जाने लगा।
पहले दिन वह बहुत रोया।
उसे माँ से दूर जाना अच्छा नहीं लग रहा था।
लेकिन धीरे-धीरे उसे नए दोस्त मिले।
नई किताबें मिलीं।
नई दुनिया मिली।
अब उसका सपना था—
कक्षा में पहला आना।
शिक्षक की प्रशंसा पाना।
अच्छे अंक लाना।
*“उसे लगता था कि यदि वह परीक्षा में प्रथम आ गया तो जीवन सफल हो जाएगा।”*
“लेकिन हर परीक्षा के बाद एक नई परीक्षा आ जाती।
हर उपलब्धि के बाद एक नया लक्ष्य सामने खड़ा हो जाता।
उसे समझ नहीं आता था कि मंजिल आखिर है कहाँ।”

समय उड़ता गया।
अब आरव किशोर हो चुका था।
उसके सामने प्रतियोगिता थी।
तुलना थी।
दबाव था।
दोस्तों के नंबर उससे ज्यादा आते तो वह उदास हो जाता।
किसी और को पुरस्कार मिलता तो वह बेचैन हो जाता।
एक दिन उसके दादाजी ने पूछा—
“बेटा, क्यों परेशान हो?”
आरव बोला—
“मैं सबसे आगे निकलना चाहता हूँ।”
दादाजी मुस्कुराए।
उन्होंने कहा—
*“जीवन दौड़ नहीं है। यह यात्रा है। दौड़ में लोग दूसरों को देखते हैं। यात्रा में लोग स्वयं को खोजते हैं।”*
लेकिन युवा आरव उस समय इन बातों को समझ नहीं पाया।

दिन-रात पढ़ाई।
कोचिंग।
टेस्ट।
प्रतियोगिता।
आरव सोचता था—
“अगर मुझे अच्छा कॉलेज मिल गया तो जीवन बन जाएगा।”
उसने मेहनत की।
बहुत मेहनत की।
आख़िरकार उसे एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश मिल गया।
पूरा परिवार खुश था।
गाँव में मिठाइयाँ बँटीं।
सबने कहा—
“अब इसका भविष्य उज्ज्वल है।”
लेकिन कॉलेज पहुँचते ही आरव को महसूस हुआ—
यह तो एक नई शुरुआत है।
मंजिल अभी भी दूर है।

कॉलेज की दुनिया अलग थी।
नए मित्र।
नई चुनौतियाँ।
नई प्रतिस्पर्धा।
यहीं उसे पहली बार प्रेम का एहसास हुआ।
यहीं उसने पहली बार असफलता का दर्द भी महसूस किया।
एक प्रतियोगिता में वह हार गया।
जिस लड़की को वह पसंद करता था, उसने उसे केवल मित्र माना।
एक बार परीक्षा में भी अपेक्षित अंक नहीं आए।
उसे लगा कि दुनिया खत्म हो गई।
लेकिन कुछ समय बाद वह समझ गया—
*“जीवन किसी एक हार या एक जीत का नाम नहीं है।”*
यह तो निरंतर बहती नदी है।

कॉलेज समाप्त हुआ।
अब नौकरी की तलाश शुरू हुई।
सैकड़ों आवेदन।
दर्जनों इंटरव्यू।
अनेक अस्वीकृतियाँ।
एक दिन उसे नौकरी मिल गई।
उसने सोचा—
“अब जीवन सफल हो गया।”
पहली तनख्वाह मिली।
माता-पिता के लिए उपहार खरीदा।
घर में खुशियाँ छा गईं।
लेकिन कुछ ही महीनों बाद नई चिंताएँ आ गईं।
प्रमोशन।
वेतन वृद्धि।
प्रतिष्ठा।
प्रतिस्पर्धा।
अब लक्ष्य बदल चुका था।

आरव ने मेहनत की।
वह पदोन्नति पाता गया।
एक दिन उसने अपनी पहली कार खरीदी।
फिर घर।
फिर निवेश।
फिर बैंक बैलेंस।
समाज उसे सफल कहने लगा।
लेकिन रात को कभी-कभी वह अकेले बैठकर सोचता—
“क्या यही जीवन है?”
उसे सब कुछ मिल रहा था।
फिर भी भीतर कहीं एक खालीपन था।

समय आया।
आरव का विवाह हुआ।
उसकी पत्नी अनन्या उसके जीवन में खुशियाँ लेकर आई।
दोनों ने साथ सपने देखे।
साथ संघर्ष किया।
साथ हँसे।
साथ रोए।
कुछ वर्षों बाद उनके बच्चे हुए।
अब आरव की दुनिया बदल चुकी थी।
उसकी प्राथमिकता अब स्वयं नहीं थी।
उसका परिवार था।
बच्चों का भविष्य था।
माता-पिता की सेवा थी।

अब जीवन एक विशाल वृक्ष की तरह हो गया था।
जिसकी शाखाओं पर अनगिनत जिम्मेदारियाँ थीं।
बच्चों की पढ़ाई।
माता-पिता की देखभाल।
घर की किश्तें।
कार का खर्च।
समाज की अपेक्षाएँ।
कार्यालय का दबाव।
हर दिन संघर्ष था।
हर दिन दौड़ थी।
लेकिन इस दौड़ में वह धीरे-धीरे स्वयं को भूलता जा रहा था।

एक दिन आरव को कंपनी का सर्वोच्च पुरस्कार मिला।
सभी ने तालियाँ बजाईं।
सम्मान मिला।
प्रशंसा मिली।
फोटो अखबार में छपी।
लेकिन उसी रात उसने अपने वृद्ध पिता को अकेले बैठा देखा।
पिता की आँखों में नमी थी।
उन्होंने कहा—
*“बेटा, सफलता अच्छी है। लेकिन समय उससे भी अधिक मूल्यवान है।”*
उस दिन आरव को लगा कि उसने धन कमाया है, पर समय खो दिया है।

उम्र बढ़ने लगी।
बाल सफेद होने लगे।
शरीर पहले जैसा नहीं रहा।
एक दिन अचानक डॉक्टर ने कहा—
“आपको आराम की आवश्यकता है।”
आरव स्तब्ध रह गया।
जिस शरीर पर उसे गर्व था, वही अब साथ छोड़ने लगा था।
तब उसे पहली बार मृत्यु का विचार आया।

कुछ वर्षों बाद वह सेवानिवृत्त हो गया।
अब सुबह जल्दी उठने की कोई मजबूरी नहीं थी।
लेकिन अब समय बहुत था।
और काम बहुत कम।
वह पार्क में बैठता।
पुरानी यादें याद करता।
अपने बच्चों को सफल होते देखता।
अब वही बच्चे उसे सलाह देते थे।
जिन्हें कभी उसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था।

एक शाम वह अपने पोते के साथ बैठा था।
पोते ने पूछा—
“दादाजी, जीवन का अर्थ क्या है?”
आरव कुछ देर मौन रहा।
फिर मुस्कुराया।
उसकी आँखों में पूरी जिंदगी घूम गई—
रेंगना।
चलना।
स्कूल।
कॉलेज।
नौकरी।
घर।
कार।
धन।
विवाह।
बच्चे।
बीमारी।
बुढ़ापा।
और अंत…
फिर उसने कहा—
*“बेटा, जीवन का अर्थ मंजिल में नहीं, यात्रा में है।”*
पोता बोला—
“कैसे?”
आरव ने कहा—
“जब मैं छोटा था, मुझे लगता था स्कूल ही सब कुछ है।
स्कूल पहुँचा तो लगा कॉलेज सब कुछ है।
कॉलेज पहुँचा तो लगा नौकरी सब कुछ है।
नौकरी मिली तो लगा पैसा सब कुछ है।
पैसा मिला तो लगा परिवार सब कुछ है।
और आज समझ आया—
सब कुछ क्षणिक है।
केवल प्रेम, सेवा, करुणा और अच्छे कर्म ही शाश्वत हैं।”

कुछ समय बाद आरव इस संसार से विदा हो गया।
लोग उसकी संपत्ति को याद नहीं करते थे।
कोई उसकी कार की चर्चा नहीं करता था।
कोई उसके बैंक बैलेंस की बात नहीं करता था।
लोग केवल इतना कहते थे—
“वह अच्छा इंसान था।”
“उसने लोगों की मदद की थी।”
“उसने अपने माता-पिता का सम्मान किया था।”
“उसने समाज के लिए काम किया था।”
और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत थी।

जीवन एक वृक्ष पर चढ़ने जैसा है।
बचपन में हम रेंगते हैं।
फिर चलते हैं।
फिर पढ़ते हैं।
फिर कमाते हैं।
फिर परिवार बनाते हैं।
फिर जिम्मेदारियाँ निभाते हैं।
फिर बूढ़े हो जाते हैं।
और अंततः एक दिन इस संसार से चले जाते हैं।
लेकिन प्रश्न यह नहीं कि हमने कितना धन कमाया।
प्रश्न यह है कि—
हमने कितने लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाई?
हमने कितनों की सहायता की?
हमने कितना प्रेम बाँटा?
हमने अपने जीवन को कितना सार्थक बनाया?
क्योंकि अंत में न कार साथ जाती है, न घर, न पद, न प्रतिष्ठा।
साथ जाते हैं तो केवल कर्म, संस्कार और लोगों के दिलों में छोड़ी गई अपनी छाप।
यही जीवन है!..
*“यात्रा का आनंद लो, क्योंकि मंजिल तो एक दिन सबकी एक ही है।”*

*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
#सुशीलकुमारसुमन
#युवा