रूपई नदी पर फिर उठी सेतु निर्माण की मांग: मानसून में टापू बन जाते हैं दर्जनभर गांव, प्रशासन मौन
पुरुलिया: जिले के झालदा थाना अंतर्गत मथारी खमार इलाके के उहातु गांव के ग्रामीणों ने एक बार फिर रूपई नदी पर पक्के पुल के निर्माण की मांग को लेकर आवाज बुलंद की है। लंबे समय से इस बुनियादी सुविधा से वंचित स्थानीय लोगों की मुसीबतें मानसून आते ही दोगुनी हो जाती हैं।
संपर्क टूटने से ठप हो जाती है जिंदगी
स्थानीय ग्रामीणों की शिकायत है कि बारिश के मौसम में जब भी रूपई नदी का जलस्तर बढ़ता है, इलाके की परिवहन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है। नदी पर पुल न होने के कारण रानीडी, चरटुंगरी, जोरुआडी, बोंडी, मथारी केउतिया, पाल्मा, पुहरा, उहातु, जाझातु और काशिडी समेत लगभग एक दर्जन गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से कट जाता है। इसके चलते हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह ठप हो जाती है।
बच्चों की पढ़ाई और मरीजों की जान पर संकट
इस अव्यवस्था का सबसे बुरा असर स्कूली बच्चों पर पड़ता है। जलस्तर बढ़ने पर नदी पार करना असंभव हो जाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। इसके अलावा, स्वास्थ्य आपातकाल (मेडिकल इमरजेंसी) के दौरान गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाने में ग्रामीणों के पसीने छूट जाते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सीधा रास्ता न होने के कारण उन्हें मरीजों को जान जोखिम में डालकर या फिर मीलों लंबा चक्कर काटकर अस्पताल पहुंचाना पड़ता है।
किसानों को भी उठानी पड़ती है भारी परेशानी
खेती-किसानी से जुड़े लोगों के लिए भी यह नदी मानसून में जी का जंजाल बन जाती है। किसानों को अपने मवेशियों को नदी पार कराने और नदी के दूसरी तरफ स्थित अपने खेतों तक जाने के लिए हर दिन अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। भारी बारिश के दिनों में झालदा और बाघमुंडी इलाके के कई गांवों का आपसी संपर्क पूरी तरह टूट जाता है।
‘प्रशासन से सिर्फ आश्वासन, अब नई उम्मीद’
ग्रामीणों का कहना है कि वे इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए कई बार प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काट चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर रहा। थक-हारकर अब वे सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया के जरिए अपनी आवाज सरकार तक पहुंचा रहे हैं।
स्थानीय निवासी मधुसूदन महतो ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा, “हमने कई बार प्रशासन से लिखित और मौखिक अपील की है, लेकिन आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। हालांकि, इस बार राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव हुआ है, जिससे हमें उम्मीद जगी है कि नई व्यवस्था में हमारी इस पुरानी और जायज मांग पर कोई सार्थक फैसला लिया जाएगा।”










