*“गुनाहों का देवता!..”*
कोलकाता…
हावड़ा ब्रिज के नीचे बहती हुगली नदी, पीली टैक्सियों की लंबी कतारें, बारिश में भीगती ट्रामें, पुरानी हवेलियाँ, चाय की भाप और इंसानी रिश्तों की उलझनें…
यह शहर केवल इमारतों का शहर नहीं था।
यह शहर उन लोगों का भी था जो अपने भीतर हजारों राज़ छिपाकर जीते थे।
सन 1975…
उत्तर कोलकाता की तंग गलियों में एक पुराना मकान था—
“शांति निवास…”
उस मकान में रहते थे हरिनारायण मुखर्जी, उनकी पत्नी सावित्री देवी, और उनकी इकलौती बेटी काजल।
हरिनारायण बाबू रेलवे में क्लर्क थे।
ईमानदार इतने कि पूरी जिंदगी किराए के घर में काट दी, लेकिन रिश्वत का एक पैसा घर नहीं लाए।
उनकी बेटी काजल…
सफेद सलवार, बड़ी आँखें, शांत स्वभाव और भीतर छिपे हजारों सपने।
लेकिन जिंदगी हमेशा सपनों की कीमत वसूलती है।
“एक अनजान किराएदार”
उसी मोहल्ले में एक दिन एक नया युवक रहने आया।
नाम था — अभय सेन।
दुबला-पतला शरीर…
चेहरे पर गंभीरता…
आँखों में अजीब उदासी…
वह पास की एक प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी करता था।
मकान मालिक ने उसे हरिनारायण बाबू के घर के ऊपर वाला कमरा किराए पर दे दिया।
पहले दिन जब अभय ने सामान रखा, तब सीढ़ियों से उतरते समय उसकी नजर काजल पर पड़ी।
काजल चाय की ट्रे लिए खड़ी थी।
“माँ ने भेजी है…”
उसने धीमे से कहा।
अभय ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“धन्यवाद…”
उस एक पल में दोनों के बीच एक अजीब-सी खामोशी जन्म ले चुकी थी।
दिन गुजरने लगे।
अभय सुबह प्रेस जाता…
रात को देर से लौटता…
लेकिन हर शाम नीचे आकर हरिनारायण बाबू के साथ बैठकर चाय पीता।
वह पढ़ा-लिखा था।
अखबारों की राजनीति समझता था।
कविताएँ लिखता था।
धीरे-धीरे घर का हिस्सा बन गया।
सावित्री देवी उसे बेटे की तरह मानने लगीं।
और काजल…
वह अब उसकी आवाज़ सुनते ही मुस्कुरा देती थी।
“गरीबी, बीमारी और टूटते सपने”
एक दिन अचानक हरिनारायण बाबू ऑफिस में बेहोश होकर गिर पड़े।
डॉक्टर ने कहा—
“दिल कमजोर है… आराम जरूरी है।”
“लेकिन आराम गरीब आदमी की किस्मत में कहाँ होता है?”
घर की हालत बिगड़ने लगी।
दवाइयाँ…
उधार…
किराया…
राशन…
सब कुछ भारी होने लगा।
अभय यह सब चुपचाप देख रहा था।
एक रात उसने अपनी जमा पूँजी सावित्री देवी के हाथ में रख दी।
“माँ जी… इसे रख लीजिए…”
सावित्री देवी रो पड़ीं।
“बेटा… तुम क्यों अपना सब कुछ दे रहे हो?”
अभय हल्का-सा मुस्कुराया।
“अपनों के लिए कोई हिसाब नहीं होता…”
सीढ़ियों के पीछे खड़ी काजल सब सुन रही थी।
उस रात पहली बार उसने महसूस किया कि वह अभय से प्रेम करने लगी है।
लेकिन प्रेम जितना पवित्र होता है…
समाज उतना ही क्रूर।
मोहल्ले में बातें शुरू हो गईं।
“ऊपर वाला लड़का रोज नीचे क्यों बैठता है?”
“लड़की जवान है…”
“लोग क्या कहेंगे?”
हरिनारायण बाबू परेशान रहने लगे।
उन्होंने एक दिन काजल से पूछा—
“तुम्हारा और अभय का कोई रिश्ता है क्या?”
काजल चुप रही।
उसकी चुप्पी ही जवाब थी।
“एक छिपा हुआ अतीत”
उधर अभय के भीतर भी एक तूफान चल रहा था।
वह कोई साधारण युवक नहीं था।
उसका अतीत खून और अपराध से भरा था।
उसका पिता शराबी था।
माँ ने आत्महत्या कर ली थी।
गरीबी में पलते-पलते अभय गलत संगत में चला गया।
एक रात झगड़े में उससे एक आदमी की मौत हो गई।
हालाँकि वह हादसा था…
लेकिन कानून ने उसे अपराधी बना दिया।
वह तीन साल जेल में रहा।
जेल से निकलने के बाद उसने तय किया—
अब वह नई जिंदगी शुरू करेगा।
लेकिन समाज किसी को दूसरा मौका नहीं देता।
इसलिए वह अपना अतीत छिपाकर जी रहा था।
एक रात उसका पुराना साथी रघु अचानक उसके कमरे में आ पहुँचा।
“अरे वाह… अब शरीफ बन गया है?”
अभय घबरा गया।
“धीरे बोलो…”
रघु हँस पड़ा।
“मुझे पैसे चाहिए… वरना सबको बता दूँगा कि तू जेल काट चुका है…”
अभय की आँखों में डर उतर आया।
“रिश्तों की अग्निपरीक्षा”
कुछ दिनों बाद हरिनारायण बाबू ने काजल की शादी तय कर दी।
लड़का था—
संदीप रॉय, एक बैंक कर्मचारी।
अच्छा परिवार…
अच्छी नौकरी…
काजल टूट गई।
वह छत पर जाकर रोने लगी।
उसी समय अभय वहाँ आया।
“काजल…”
उसकी आवाज काँप रही थी।
“तुम खुश हो?”
काजल की आँखों से आँसू बह निकले।
“क्या कभी आपने पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ?”
अभय चुप हो गया।
वह उससे प्रेम करता था…
लेकिन सच बताने की हिम्मत नहीं थी।
वह जानता था—
अगर उसका अतीत सामने आया तो यह परिवार बर्बाद हो जाएगा।
उसने खुद को पीछे हटाना शुरू कर दिया।
काजल समझ नहीं पा रही थी कि अचानक अभय बदल क्यों गया।
अब वह नीचे कम आता।
कम बोलता।
आँखें चुराने लगा।
एक दिन काजल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“क्या आप मुझसे प्रेम नहीं करते?”
अभय की आँखें भर आईं।
लेकिन उसने खुद को कठोर बना लिया।
“नहीं…”
काजल का दिल टूट गया।
“सच का विस्फोट”
शादी से ठीक पाँच दिन पहले रघु फिर आया।
इस बार वह शराब के नशे में था।
नीचे बैठक में सब लोग बैठे थे।
रघु जोर से चिल्लाया—
“अरे हरिनारायण बाबू!.. आपका दामाद तो बड़ा शरीफ निकला… जेल काट चुका है जेल!”
पूरा घर सन्न रह गया।
काजल के हाथ से चाय का कप गिर पड़ा।
हरिनारायण बाबू काँपते हुए अभय की ओर देखने लगे।
“क्या यह सच है?”
अभय ने सिर झुका लिया।
बस…
उसी एक पल में सब कुछ खत्म हो गया।
सावित्री देवी रोने लगीं।
मोहल्ले वाले तमाशा देखने जमा हो गए।
हरिनारायण बाबू का चेहरा शर्म और दर्द से भर गया।
“तुमने हमसे झूठ बोला…”
अभय की आवाज टूट गई।
“मैं मजबूर था…”
“चले जाओ यहाँ से…”
यह शब्द बिजली की तरह गिरे।
उस रात अभय अपना सामान बाँध रहा था।
कमरे में अँधेरा था।
तभी काजल आई।
उसकी आँखें लाल थीं।
“क्या सचमुच आपने किसी को मारा था?”
अभय ने काँपती आवाज में कहा—
“गलती हुई थी… लेकिन मैं अपराधी नहीं बनना चाहता था…”
काजल रो पड़ी।
“तो आपने मुझ पर भरोसा क्यों नहीं किया?”
अभय के पास कोई जवाब नहीं था।
“गुनाह किसने किया?.. गुनाहों का देवता कौन..?”
अभय घर छोड़कर चला गया।
अब वह हुगली किनारे एक छोटी झोपड़ी में रहने लगा।
दिन में मजदूरी करता…
रात को अकेला बैठा रहता।
उधर काजल की शादी की तैयारियाँ चल रही थीं।
लेकिन वह भीतर से मर चुकी थी।
संदीप अच्छा आदमी था, लेकिन वह काजल की खामोशी समझ नहीं पा रहा था।
एक दिन उसने पूछा—
“क्या तुम किसी और से प्रेम करती हो?”
काजल चुप रही।
संदीप सब समझ गया।
उधर हरिनारायण बाबू की तबीयत और खराब होने लगी।
उन्हें दिल का दूसरा दौरा पड़ा।
रात के दो बजे बारिश हो रही थी।
एम्बुलेंस नहीं मिल रही थी।
तभी दरवाजे पर कोई आया।
वह अभय था।
किसी पड़ोसी ने उसे खबर दे दी थी।
उसने बिना कुछ सोचे हरिनारायण बाबू को कंधे पर उठाया और अस्पताल ले गया।
पूरी रात वह अस्पताल के बाहर बैठा रहा।
सुबह डॉक्टर बाहर आए।
“अब खतरा टल गया है…”
सावित्री देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने पहली बार अभय की ओर देखा—
और समझ गईं…
जिस लड़के को समाज अपराधी कह रहा था, उसके भीतर इंसानियत अभी भी जिंदा थी।
“समाज का फैसला”
लेकिन समाज इंसानियत नहीं देखता।
समाज केवल अतीत देखता है।
मोहल्ले में बातें फिर शुरू हो गईं।
“जेल वाला लड़का…”
“खूनी…”
“ऐसे लोग कभी नहीं बदलते…”
हरिनारायण बाबू अंदर ही अंदर टूटने लगे।
एक दिन उन्होंने अभय को बुलाया।
“बेटा… तुम बुरे नहीं हो… लेकिन समाज हमें जीने नहीं देगा…”
अभय मुस्कुरा पड़ा।
उस मुस्कान में दर्द था।
“मैं समझ गया बाबूजी…”
उस रात वह काजल से आखिरी बार मिला।
हुगली के किनारे…
बारिश हो रही थी।
ट्राम की घंटियाँ दूर से सुनाई दे रही थीं।
काजल रो रही थी।
“क्यों जा रहे हैं?”
अभय ने धीरे से कहा—
*“क्योंकि कुछ लोग प्यार करने के लिए नहीं…*
*बल्कि दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए पैदा होते हैं…”*
“और मेरी जिंदगी?”
अभय की आँखें भर आईं।
“तुम्हें जीना होगा…”
“अधूरी मोहब्बत”
अगली सुबह अभय गायब था।
किसी को नहीं पता वह कहाँ गया।
सिर्फ उसके कमरे में एक चिट्ठी मिली।
“काजल,
मैं पापी हूँ या नहीं…
यह फैसला भगवान करेगा।
लेकिन तुम पवित्र हो।
तुम्हारी जिंदगी मेरे अतीत की सजा नहीं बननी चाहिए।
मैंने पहली बार तुम्हारे घर में इंसानियत देखी थी।
माँ का प्यार…
बाबूजी का विश्वास…
तुम्हारी आँखों का अपनापन…
मैं इन्हें बदनाम नहीं होने दूँगा।
अगर अगले जन्म जैसा कुछ होता है…
तो मैं बिना दाग वाला इंसान बनकर लौटूँगा।
— अभय”
काजल चिट्ठी पढ़कर फूट-फूटकर रो पड़ी।
उस दिन पहली बार हरिनारायण बाबू भी रोए।
उन्हें एहसास हो चुका था—
गलती अभय की कम…
समाज की ज्यादा थी।
“वक्त का फैसला”
कई साल गुजर गए।
कोलकाता बदल गया।
ट्रामें पुरानी हो गईं।
नई इमारतें बन गईं।
लेकिन कुछ यादें कभी पुरानी नहीं होतीं।
काजल ने शादी नहीं की।
वह स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगी।
हर शाम वह हुगली किनारे जाकर बैठती।
उसे लगता…
शायद किसी दिन अभय लौट आएगा।
एक दिन अचानक अखबार में खबर छपी—
“एक सामाजिक कार्यकर्ता ने झुग्गियों में स्कूल खोलकर सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बदली…”
तस्वीर धुंधली थी…
लेकिन काजल ने उसे पहचान लिया।
वह अभय था।
अब उसकी आँखों में अपराधबोध नहीं…
सुकून था।
काजल मुस्कुराई।
उसकी आँखों में आँसू थे।
वह समझ चुकी थी—
हर जेल जाने वाला इंसान गुनाहगार नहीं होता…
और हर सभ्य चेहरा पवित्र नहीं होता।
कुछ लोग अपने अतीत की आग में जलकर इतने शुद्ध हो जाते हैं कि भगवान भी उन्हें माफ कर देता है।
उस शाम हुगली नदी के ऊपर सूरज डूब रहा था।
आसमान लाल था।
हवा में पुरानी ट्राम की घंटियाँ घुल रही थीं।
और कोलकाता की भीड़ में कहीं दूर…
*एक अधूरी मोहब्बत आज भी साँस ले रही थी।”*
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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