*श्रमिक के शव के साथ अधिकारीयों को बंधक बना कर ग्रामीणों कर रहे थे प्रदर्शन*
कुल्टी।बीते सोमवार से रामनगर कोलियरी के जीएम कार्यालय के सामने एक शव खामोशी से सेल प्रबंधन की उदासीनता की कहानी सुना रही थी। यह वह कहानी थी जो लापरवाह प्रबंधन की उदाशीनता को दर्शा रही थी। स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के कोयला खदान रामनगर में कार्यरत केदार पान (48) का पिछले रविवार को अस्पताल में बीते तीन महीने तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करने के बाद निधन हो गया। बीते 16 फरवरी को खदान में एक दुर्घटना केदार पान को गम्भीर चोट लगी थी। जिसके बाद से तीन महीने की प्रतीक्षा, अस्पताल का बिस्तर और परिवार की प्रार्थनाएं भी उन्हें वापस नहीं ला सकीं। लेकिन उनका निधन सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं था, यह एक श्रमिक के जीवन की मूल्यहीनता और प्रशासन की कठोर चुप्पी का क्रूर प्रमाण था। बीते सोमवार की सुबह केदार पान का परिवार उनके शव के साथ जीएम कार्यालय के सामने आश्रित को नियोजन की मांग लिये पहुँचे। हाथों में कोई तख्तियां नहीं थीं, बल्कि आंसू और दर्द की चीखें ही उनके हथियार थे। वे केवल एक ही चीज चाहते थे: केदार की बेटी सुश्वेता के लिए नौकरी। यह मांग महज एक अनुरोध नहीं थी, यह एक परिवार के जीवित रहने की आखिरी उम्मीद थी। अपने पिता की हंसी के बीच पली-बढ़ी सुश्वेता के कंधों पर अब मां, भाई-बहन और पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। लेकिन प्रशासन के दरवाजे बंद थे, उनकी बातें खामोश थीं। परिवार का आरोप है कि दुर्घटना के बाद कोयला खदान अधिकारियों ने कोई सहायता नहीं की। सुरक्षा की कमी ने केदार से उसकी जिंदगी छीन ली है। फिर भी, इस दुःख के बीच, एक अभूतपूर्व एकता पैदा हुई। स्थानीय कार्यकर्ता, उनके परिवार और यहां तक कि भाजपा और तृणमूल नेता भी केदार पान के पार्थिव शरीर के सामने एकत्र हुए। ट्रेड यूनियन के सदस्य कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। रामनगर कोलियरी का धूल भरा परिसर दुःख और क्रोध से सुलग रहा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस खदान में दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं है। मजदूरों का जीवन बेकार है. दुर्घटना के बाद जब मुआवजे या सहायता की बात की जाती है तो अधिकारी अवाक रह जाते हैं। लेकिन इस बार नहीं. केदार का शरीर हर कार्यकर्ता में साहस की प्रेरणा देता प्रतीत हो रहा था। विरोध प्रदर्शन दो दिनों तक चला। सुश्वेता की मां, भाई, रिश्तेदार और कार्यकर्ता अडिग थे। उनके आंसुओं और चीखों ने अंततः प्रशासन की निर्दयी दीवारें तोड़ दीं। अधिकारियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। सुश्वेता को मंगलवार दोपहर करीब 3 बजे सेल प्रबंधन ने जोइनिंग लैटर दे दिया। यह एक जीत थी. एक परिवार का भविष्य सुरक्षित है। सुश्वेता के चेहरे पर मुस्कान आई, लेकिन यह एक फीकी मुस्कान थी। क्योंकि इस जीत के पीछे उनके पिता की विदाई थी। दो दिन बाद केदार पान की अंतिम यात्रा की तैयारियां शुरू हो गईं। उस अश्रुपूर्ण विदाई ने न केवल परिवार को, बल्कि पूरे रामनगर कोलियरी को शोक में डुबो दिया। केदार पान की मृत्यु कोई पारिवारिक त्रासदी नहीं है, यह हम सबके लिए एक चेतावनी है। रामनगर कोलियरी की यह कहानी सिर्फ दुख और गुस्से की नहीं है, यह न्याय के लिए एक अटल लड़ाई की कहानी है। बीते सोमवार अधिकारियों ने बताया कि जांच चल रही है और परिवार के साथ चर्चा की जा रही है। लेकिन क्या यह आश्वासन पर्याप्त था? मजदूरों के जीवन का मूल्य कब समझा जाएगा? प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कब होगा? हालांकि 29 घण्टे बाद सुश्वेता को मिली नौकरी की जीत, उसके पिता के निधन का असहनीय दर्द से जुड़ा हुआ है। केदार पान के जाने से भले ही शोक की लहर है, लेकिन उनके संघर्ष ने मजदूरों के मन में नई रोशनी जगा दी है। यह कहानी अंत नहीं है, यह एक नई शुरुआत है – न्याय, सुरक्षा और मानवता की।
श्रमिक मनोज तिवारी ने कहा कि परिजनों और स्थानीय के निडर होकर लंबी लड़ाई आज श्रमिक के छोटी बेटी को नियोजन दिलाई है।


















