*“हौसलों की साइकिल!”*
*“🚴♂️ विश्व साइकिल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🚴♀️”*
*“इस वर्ल्ड बाइसिकल डे के अवसर पर मैं आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ।”*
*“चलो साइकिल चलाएँ,*
*स्वस्थ जीवन अपनाएँ*
*और हरित भविष्य बनाएँ।”):*
“कानपुर की उस सुबह में एक अलग ही चमक थी। जून की गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी, लेकिन आज मोहन के चेहरे पर जो चमक थी, वह सूरज की रोशनी से भी अधिक तेजस्वी लग रही थी।
आज IIT JEE Advanced का परिणाम आया था।
मोहन अपने छोटे-से कमरे में कंप्यूटर स्क्रीन को बार-बार देख रहा था। उसके हाथ कांप रहे थे। उसकी आंखों में उत्सुकता और भय दोनों थे।
अचानक स्क्रीन पर परिणाम दिखाई दिया।
All India Rank – 101
कुछ क्षणों के लिए समय जैसे ठहर गया।
फिर उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
“मां… मां…!”
वह दौड़ता हुआ बाहर आया।
उर्मिला जी एक घर से काम करके लौटी ही थीं। उनके हाथों में झाड़ू थी और माथे पर पसीने की बूंदें।
मोहन उनके गले लग गया।
“मां… हो गया… मेरा IIT में चयन हो गया।”
उर्मिला कुछ समझ नहीं पाईं।
“क्या हुआ बेटा?”
“मां, AIR 101!”
उर्मिला की आंखें भर आईं।
उन्हें ऐसा लगा जैसे वर्षों पहले स्वर्ग सिधार चुके सत्यनारायण जी आज कहीं ऊपर से मुस्कुरा रहे हों।
संघर्ष की शुरुआत
सत्यनारायण जी कभी एक छोटी फैक्ट्री में काम करते थे।
उनकी आय सीमित थी लेकिन सपने बड़े थे।
वे अक्सर कहा करते थे—
“मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा।”
लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।
एक सड़क दुर्घटना में सत्यनारायण जी की मृत्यु हो गई।
उस दिन मोहन केवल आठ साल का था।
पति के जाने के बाद उर्मिला की दुनिया उजड़ गई।
रिश्तेदार कुछ दिन आए।
सांत्वना दी।
फिर धीरे-धीरे सब दूर हो गए।
जब पैसों की कमी बढ़ने लगी तो सभी ने मुंह फेर लिया।
अंततः उर्मिला को कानपुर के स्लम क्षेत्र में टैगोर रोड बस स्टॉप के पास एक छोटे से किराए के कमरे में रहना पड़ा।
कमरा छोटा था।
छत टपकती थी।
गर्मी में भट्टी बन जाता था।
लेकिन उसी कमरे में एक सपना पल रहा था।
मोहन का सपना।
रामाकांत सर से मुलाकात
उर्मिला सुबह चार बजे उठ जाती थीं।
पानी भरतीं।
फिर एक-एक घर में काम करने निकल जातीं।
झाड़ू-पोछा।
बर्तन।
कपड़े।
खाना बनाना।
जो भी काम मिले।
उसी दौरान उन्हें रामाकांत सर के घर काम मिला।
रामाकांत सर मदन मालवीय हाई स्कूल में संस्कृत के शिक्षक थे।
ईमानदार।
सरल।
दयालु।
एक दिन उर्मिला अपने बेटे मोहन को साथ लेकर आईं।
मोहन बरामदे में बैठकर गणित के प्रश्न हल कर रहा था।
रामाकांत सर की नजर उस पर पड़ी।
उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा—
“क्या पढ़ रहे हो बेटा?”
“मैथ्स सर।”
“दिखाओ।”
रामाकांत सर ने कॉपी देखी।
फिर कुछ कठिन प्रश्न पूछे।
मोहन ने बिना रुके उत्तर दे दिए।
रामाकांत सर हैरान रह गए।
उन्हें वर्षों के अध्यापन अनुभव में ऐसा प्रतिभाशाली बालक कम ही मिला था।
उस दिन उन्होंने निर्णय ले लिया।
एक नई राह
अगले ही सप्ताह मोहन का प्रवेश मदन मालवीय हाई स्कूल में करा दिया गया।
रामाकांत सर ने अपने प्रभाव से उसे छात्रवृत्ति भी दिलवा दी।
बाद में हॉस्टल की व्यवस्था भी करवा दी।
उर्मिला की आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे।
“सर, मैं आपका यह उपकार कभी नहीं भूलूंगी।”
रामाकांत सर मुस्कुराए।
“उपकार नहीं बहन, यह समाज का कर्तव्य है।”
साइकिल का सपना
मदन मालवीय स्कूल में एक परंपरा थी।
हर वर्ष भव्य साइकिल रेस होती थी।
सैकड़ों छात्र भाग लेते थे।
मोहन को साइकिल से बेहद प्रेम था।
जब भी वह साइकिल देखता, उसकी आंखें चमक उठतीं।
लेकिन उसके पास अपनी साइकिल नहीं थी।
दोस्तों की पुरानी और टूटी-फूटी साइकिल लेकर वह रेस में भाग लेता।
फिर भी चौथे-पांचवें स्थान तक पहुंच जाता।
सभी आश्चर्य करते।
“अगर इसके पास अच्छी साइकिल हो जाए तो यह जीत सकता है।”
लेकिन अच्छी साइकिल खरीदना उनके लिए असंभव था।
मेहनत और सफलता
समय गुजरता गया।
मोहन पढ़ाई में लगातार आगे बढ़ता गया।
रामाकांत सर उसका मार्गदर्शन करते रहे।
उर्मिला दिन-रात मेहनत करती रहीं।
3 जून का दिन आया।
दसवीं बोर्ड का परिणाम घोषित हुआ।
पूरा कानपुर चौंक गया।
मोहन पूरे शहर में दूसरा स्थान लाया था।
उस दिन संयोग से ‘विश्व साइकिल दिवस” भी था।
मोहन ने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे उसके पिता मुस्कुरा रहे हों।
अभिमन्यु सिंह का साथ
रामाकांत सर अब सेवानिवृत्ति के निकट थे।
उनके एक पुराने छात्र थे—
अभिमन्यु सिंह।
वे IIT की कोचिंग चलाते थे।
रामाकांत सर स्वयं उनके पास गए।
“अभिमन्यु, एक लड़का है। बहुत प्रतिभाशाली है।”
अभिमन्यु ने बिना देर किए मोहन का प्रवेश न्यूनतम शुल्क पर कर लिया।
अब मोहन के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ।
सुबह स्कूल।
शाम कोचिंग।
रात स्वाध्याय।
कभी-कभी तो वह केवल चार घंटे सोता।
लेकिन उसके सपनों की आग उसे थकने नहीं देती थी।
IIT का सपना सच हुआ
वर्षों की मेहनत आखिर रंग लाई।
JEE Advanced का परिणाम आया।
AIR 101।
पूरे कानपुर में उत्सव जैसा माहौल था।
रामाकांत सर गर्व से भर उठे।
अभिमन्यु सिंह की आंखें नम थीं।
उर्मिला ने आसमान की ओर देखकर कहा—
“सत्यनारायण जी, आपका सपना पूरा हो गया।”
IIT कानपुर
मोहन अब IIT कानपुर का छात्र था।
नई दुनिया।
नए लोग।
नई चुनौतियां।
लेकिन संघर्ष ने उसे मजबूत बना दिया था।
वह पढ़ाई में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करता रहा।
धीरे-धीरे तीसरे वर्ष में पहुंच गया।
फिर एक दिन वह खबर आई जिसका हर इंजीनियर इंतजार करता है।
उसका चयन Intel Chips में हो गया।
उसे शानदार पैकेज मिला।
उर्मिला खुशी से रो पड़ीं।
पुराना सपना जाग उठा
एक दिन मोहन ने समाचार पढ़ा।
3 जून 2025 को कानपुर में विश्व प्रसिद्ध साइकिल चैम्पियनशिप होने वाली थी।
उसका बचपन फिर जाग उठा।
उसे अपनी टूटी हुई साइकिलें याद आईं।
स्कूल की रेसें याद आईं।
उसने मां से कहा—
“मां, मैं इसमें भाग लेना चाहता हूं।”
उर्मिला कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“अगर यह तुम्हारा सपना है, तो जरूर पूरा होगा।”
मां का त्याग
उर्मिला ने अपनी छोटी-छोटी बचत जोड़नी शुरू कर दी।
कई अतिरिक्त घरों में काम किया।
रात को भी सिलाई करने लगीं।
आखिरकार उन्होंने 16,000 रुपये की साइकिल खरीद ली।
मोहन भावुक हो गया।
“मां, इसकी क्या जरूरत थी?”
उर्मिला मुस्कुराईं।
“जब तुम छोटे थे, तब तुम्हारे पास साइकिल नहीं थी। आज तुम्हारे पास अवसर है।”
2 जून की शाम।
मोहन ने अपनी साइकिल IIT कानपुर के हॉस्टल हॉल ऑफ रेसिडेंस-2 के गैराज में खड़ी कर दी।
अगले दिन रेस थी।
वह उत्साह में सो गया।
लेकिन सुबह सब कुछ बदल गया।
साइकिल गायब थी।
चोरी हो चुकी थी।
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने हर जगह खोजा।
सुरक्षा कर्मियों से पूछा।
दोस्तों से पूछा।
पूरे कैंपस में ढूंढ़ा।
लेकिन साइकिल नहीं मिली।
दर्द छिपाने की कोशिश
उसी दौरान उसकी मुलाकात अभिमन्यु सिंह से हुई।
“सब ठीक है मोहन?”
मोहन मुस्कुराया।
“जी सर।”
लेकिन उसकी मुस्कान झूठी थी।
अंदर से वह टूट चुका था।
उसे मां की मेहनत याद आ रही थी।
उनके फटे हुए हाथ।
उनका पसीना।
उनकी बचत।
सब कुछ उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।
निर्णायक सुबह
3 जून की सुबह।
रेस शुरू होने वाली थी।
मोहन IIT कानपुर के मुख्य द्वार पर खड़ा था।
सभी प्रतिभागी अपनी साइकिलों के साथ तैयार थे।
लेकिन वह अकेला था।
खाली हाथ।
निराश।
हताश।
तभी एक ऑटो आकर रुका।
उसमें से उर्मिला उतरीं।
उनके चेहरे पर गर्व था।
मोहन की आंखें झुक गईं।
वह सोचने लगा—
“मैं मां को क्या जवाब दूंगा?”
चमत्कार
अचानक पीछे से आवाज आई—
“मोहन!”
वह पलटा।
सामने अभिमन्यु सिंह खड़े थे।
उनके हाथ में एक नई चमचमाती साइकिल थी।
“जल्दी करो।”
“वर्ल्ड बाइसिकल चैम्पियनशिप कानपुर चैप्टर जीतनी है।”
मोहन स्तब्ध रह गया।
“सर… यह…?”
अभिमन्यु मुस्कुराए।
“तुम्हारी साइकिल चोरी हो गई, लेकिन तुम्हारा सपना नहीं।”
मोहन की आंखें भर आईं।
उसने झुककर सर के पैर छुए।
फिर मां का आशीर्वाद लिया।
रेस
सैकड़ों प्रतिभागी।
हजारों दर्शक।
जोरदार शोर।
सीटी बजी।
रेस शुरू हो गई।
शुरुआत में मोहन पीछे था।
फिर धीरे-धीरे उसने गति बढ़ाई।
एक-एक कर सभी प्रतियोगियों को पीछे छोड़ता गया।
उसे अपनी मां का संघर्ष याद आ रहा था।
रामाकांत सर का विश्वास याद आ रहा था।
अभिमन्यु सर का सहयोग याद आ रहा था।
उसे लग रहा था जैसे हर पैडल के साथ उसकी जिंदगी आगे बढ़ रही हो।
विजय
तीन घंटे बाद।
IIT कानपुर का मुख्य द्वार।
उर्मिला और अभिमन्यु सिंह सांस रोके खड़े थे।
दूर एक आकृति दिखाई दी।
वह तेजी से करीब आ रही थी।
भीड़ चिल्लाने लगी।
“मोहन… मोहन… मोहन!”
वह सबसे आगे था।
सबसे पहले।
विजेता।
विश्व साइकिल चैम्पियनशिप कानपुर चैप्टर का विजेता।
उर्मिला की आंखों से आंसू बह निकले।
अभिमन्यु सिंह गर्व से मुस्कुरा रहे थे।
आकाश में बादल छा गए थे।
मानो कहीं दूर सत्यनारायण जी भी अपने बेटे की सफलता पर मुस्कुरा रहे हों।
मोहन मंच पर खड़ा था।
उसके हाथ में ट्रॉफी थी।
लेकिन उसकी असली जीत ट्रॉफी नहीं थी।
उसकी असली जीत थी—
गरीबी पर विजय।
संघर्ष पर विजय।
निराशा पर विजय।
और उन सभी लोगों के विश्वास की विजय जिन्होंने उसके सपनों को अपना सपना बना लिया था।
उसने मंच से कहा—
“अगर मेरी मां उर्मिला जी, रामाकांत सर और अभिमन्यु सर मेरे साथ न होते, तो मैं यहां कभी नहीं पहुंच पाता!.
*“यह जीत मेरी नहीं, उन सभी लोगों की है जो किसी बच्चे के सपनों पर विश्वास करते हैं।”*
पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा।
और उस दिन मोहन ने महसूस किया—
साइकिल चोरी हो सकती है, लेकिन सपने कभी चोरी नहीं होते।
क्योंकि सच्चे सपनों की रक्षा मेहनत, विश्वास और प्रेम करते हैं।
और सचमुच—
*जिंदगी बहुत खूबसूरत है।*
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
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