*एक अनंत यात्रा: दुर्गापूजा के बीच घर लौटने की एक महागाथा*
✍️ लेखक: सुशील कुमार सुमन
कोलकाता में शरद ऋतु उतर चुकी थी।
आसमान में सफेद बादल रूई के फाहों की तरह तैर रहे थे। काश के फूल हवा के साथ झूम रहे थे। हुगली नदी के जल पर सुनहरी धूप बिखरी हुई थी और महानगर की गलियाँ रंग-बिरंगी रोशनियों से सजने लगी थीं।
दुर्गापूजा आने वाली थी।
कुम्हारटोली में मूर्तिकार माँ दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे थे। कहीं पंडालों में बिजली की झालरें लग रही थीं, तो कहीं ढाक की पहली थाप लोगों के हृदय में उत्सव का संगीत जगा रही थी।
इसी शहर में रहता था अर्णव सेन—एक साहसी समुद्री अभियंता, जो वर्षों पहले एक बड़े समुद्री अभियान पर निकला था।
वह केवल अपने पेशे के कारण प्रसिद्ध नहीं था। उसकी असाधारण बुद्धिमत्ता, संकट में धैर्य और कठिन परिस्थितियों से निकलने की कला ने उसे साथियों के बीच एक किंवदंती बना दिया था।
लेकिन अर्णव के जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई समुद्र से नहीं, बल्कि अपने घर लौटने की थी।
उसकी पत्नी माधवी उत्तर कोलकाता के एक पुराने पुश्तैनी मकान में उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। उनका दस वर्षीय बेटा ईशान अपने पिता को केवल तस्वीरों और पुरानी कहानियों के माध्यम से जानता था।
अर्णव ने जाते समय वचन दिया था—
“माधवी, अगली दुर्गापूजा तक मैं अवश्य लौटूँगा। माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने हम फिर एक साथ खड़े होंगे।”
लेकिन नियति ने उसके लिए एक ऐसी यात्रा लिख रखी थी, जिसमें हर मोड़ पर उसकी बुद्धि, प्रेम और विश्वास की परीक्षा होने वाली थी।
अर्णव का जहाज अंडमान सागर से लौटते समय एक भयंकर चक्रवात में फँस गया।
रात काली थी। लहरें पहाड़ों की तरह उठ रही थीं। जहाज का रेडियो बंद हो चुका था और इंजन के एक हिस्से में आग लग गई थी।
“सभी लोग लाइफबोट की ओर चलो!” अर्णव ने चिल्लाकर कहा।
कई घंटों की जद्दोजहद के बाद वह अपने कुछ साथियों के साथ एक छोटे मालवाहक जहाज तक पहुँचने में सफल हुआ। लेकिन उस जहाज का कप्तान उन्हें मुख्य बंदरगाह तक पहुँचाने के बजाय एक अनजान तट पर छोड़कर चला गया।
अर्णव के पास न पर्याप्त पैसे थे, न पहचान के दस्तावेज और न ही किसी से संपर्क करने का साधन।
उसने पहली बार महसूस किया कि मनुष्य समुद्र में नहीं, अपनी असहायता में भी डूब सकता है।
उधर कोलकाता में माधवी के लिए हर दिन एक नया इंतजार था।
दुर्गापूजा की खरीदारी करते हुए वह कभी बेटे के लिए नए कपड़े चुनती, कभी अर्णव की पसंद का कुर्ता हाथ में लेकर चुप हो जाती।
“माँ, बाबा महालया तक आ जाएँगे न?” ईशान पूछता।
माधवी मुस्कुराने का प्रयास करती।
“माँ दुर्गा सब ठीक करेंगी, बेटा।”
लेकिन रात में जब पूरा घर सो जाता, माधवी खिड़की के पास बैठकर हुगली की दिशा में देखती रहती।
उसे नहीं मालूम था कि उसका पति जीवित है या नहीं।
कई दिनों तक भटकने के बाद अर्णव एक ऐसे तटीय गाँव पहुँचा, जहाँ के लोग बाहरी दुनिया से बहुत कम परिचित थे।
गाँव की मुखिया देवयानी ने उसे भोजन और आश्रय दिया। उसके घावों का उपचार करवाया और उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह रखने लगी।
देवयानी के मन में अर्णव के प्रति सम्मान धीरे-धीरे गहरे स्नेह में बदलने लगा।
“तुम वापस क्यों जाना चाहते हो?” उसने एक शाम पूछा। “यहाँ तुम्हें सुरक्षा मिल सकती है। तुम्हें किसी संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ेगा।”
अर्णव ने दूर समुद्र की ओर देखा।
“क्योंकि सुरक्षा और अपना घर एक ही चीज नहीं हैं। यहाँ मेरा शरीर रह सकता है, लेकिन मेरा मन नहीं।”
देवयानी ने पूछा, “क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी पत्नी इतने वर्षों बाद भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही होगी?”
अर्णव ने उत्तर देने में कुछ क्षण लगाए।
“मैं नहीं जानता कि वह क्या सोचती है। लेकिन मैं जानता हूँ कि मैंने उससे लौटने का वचन दिया था।”
कुछ दिनों बाद देवयानी ने उसे जाने की अनुमति दे दी। उसने एक छोटी नाव, कुछ भोजन और समुद्री मार्गों का नक्शा दिया।
“तुम्हारी यात्रा कठिन होगी,” उसने कहा, “लेकिन शायद तुम्हें अपने घर से अधिक अपने भीतर के साहस को खोजने की आवश्यकता है।”
अर्णव ने उसका आभार व्यक्त किया और फिर समुद्र की ओर निकल पड़ा।
उसके सामने अभी लंबा रास्ता था।
नाव उसे एक व्यस्त बंदरगाह तक ले आई। वहाँ के कुछ व्यापारियों ने उसे एक पुराने गोदाम में काम देने का प्रस्ताव रखा।
गोदाम का मालिक विराज मल्होत्रा था। उसने अर्णव से कहा कि वह कुछ दिनों में उसे कोलकाता जाने वाले जहाज पर बैठा देगा।
लेकिन उस गोदाम में एक अजीब आकर्षण था।
रात को वहाँ संगीत, शराब और जुए की महफिलें सजती थीं। कई नाविक अपने परिवारों को भूलकर वहीं रहने लगे थे। विराज उन्हें आसान धन, आराम और ऐश्वर्य का सपना दिखाता था।
एक रात उसने अर्णव से कहा—
“तुम इतने दिनों से भटक रहे हो। घर पहुँचकर भी क्या मिलेगा? शिकायतें, जिम्मेदारियाँ और बीते वर्षों का हिसाब। यहीं रहो। पैसा कमाओ और अपनी जिंदगी का आनंद लो।”
कुछ क्षणों के लिए अर्णव का मन डगमगाया।
वह थक चुका था। उसकी जेब लगभग खाली थी। उसे यह भी नहीं मालूम था कि माधवी अब भी उसका इंतजार कर रही है या नहीं।
लेकिन तभी उसे ईशान का चेहरा याद आया—वह चेहरा जिसे उसने वर्षों से अपनी बाँहों में नहीं उठाया था।
अगली सुबह अर्णव ने गोदाम छोड़ दिया।
जाते-जाते उसने विराज से कहा—
“मनुष्य की सबसे बड़ी हार तब नहीं होती, जब वह अपना धन खो देता है। उसकी सबसे बड़ी हार तब होती है, जब वह अपने लौटने का कारण भूल जाता है।”
वह फिर चल पड़ा।
अर्णव अब एक पुराने तटीय मार्ग पर था। उसके साथ दो नाविक भी जुड़ गए थे—रुद्र और निखिल।
एक रात उन्हें समुद्र के बीच एक परित्यक्त प्रकाशस्तंभ दिखाई दिया।
उसके भीतर से किसी स्त्री के गाने की आवाज आ रही थी। गीत में घर, प्रेम और खोए हुए लोगों की पुकार थी।
रुद्र ने कहा, “यह आवाज किसी परिचित की लगती है। हमें वहाँ जाना चाहिए।”
अर्णव ने उसे रोक दिया।
“समुद्र में हर आवाज रास्ता नहीं दिखाती। कुछ आवाजें हमें रास्ते से भटका भी सकती हैं।”
उन्होंने प्रकाशस्तंभ से दूरी बनाए रखी और आगे बढ़ते रहे।
कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि उस इलाके में समुद्री लुटेरे यात्रियों को मधुर संगीत से आकर्षित करते, फिर उनकी नावें लूट लेते थे।
अर्णव की सतर्कता ने तीनों की जान बचा ली।
पर यात्रा की कठिनाइयाँ समाप्त नहीं हुई थीं।
अगली रात भयंकर तूफान आया। उनकी नाव चट्टानों से टकराकर टूट गई। रुद्र और निखिल दूसरी दिशा में बह गए, जबकि अर्णव एक लकड़ी के तख्ते के सहारे तैरता हुआ किनारे तक पहुँचा।
जब सुबह उसकी आँख खुली, वह अकेला था।
उसने मुट्ठी में रेत भरकर आसमान की ओर देखा।
“माँ दुर्गा, यदि मेरे लिए घर लौटना अभी बाकी है, तो मुझे एक और अवसर दीजिए।”
इधर कोलकाता में अर्णव की अनुपस्थिति ने एक अलग संकट पैदा कर दिया था।
उसका पुश्तैनी मकान उत्तर कोलकाता की एक पुरानी गली में था। वर्षों पहले अर्णव के पिता ने वह मकान परिवार के लिए बनवाया था।
अर्णव के लापता होने के बाद उसका दूर का रिश्तेदार समरजीत दत्ता माधवी पर मकान बेचने का दबाव डालने लगा।
समरजीत का दावा था कि अर्णव समुद्र में मर चुका है और परिवार को अब व्यावहारिक निर्णय लेना चाहिए।
“तुम कब तक उसकी प्रतीक्षा करोगी?” उसने माधवी से कहा। “जीवन किसी के लिए रुकता नहीं है।”
माधवी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“जीवन सचमुच किसी के लिए नहीं रुकता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने संबंधों को इतनी आसानी से समाप्त कर दें।”
समरजीत ने कानूनी कागजों और पुराने पारिवारिक विवादों का सहारा लेकर मकान पर अधिकार जमाने की कोशिश की।
माधवी के सामने दो रास्ते थे—डरकर घर छोड़ देना या अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना।
उसने दूसरा रास्ता चुना।
उसने पुराने दस्तावेज जुटाए, एक वकील से संपर्क किया और कानूनी कार्रवाई शुरू की।
इस संघर्ष के बीच भी वह ईशान को पढ़ाती, उसकी देखभाल करती और हर शाम घर के मंदिर में दीपक जलाती।
दुर्गापूजा निकट आ रही थी।
माधवी ने मन ही मन कहा—
“माँ, मुझे नहीं मालूम कि अर्णव कहाँ है। लेकिन जब तक सत्य सामने नहीं आता, मैं हार नहीं मानूँगी।”
उसके भीतर भी एक युद्ध चल रहा था।
समुद्र तट पर कई दिनों तक भटकने के बाद अर्णव को एक बूढ़ा मछुआरा मिला, जिसका नाम हरिपद दास था।
हरिपद ने उसे भोजन दिया और अपने छोटे से घर में रहने की जगह दी।
जब अर्णव ने कोलकाता लौटने की अपनी इच्छा बताई, तो बूढ़े की आँखों में एक अजीब चमक उभरी।
“कोलकाता?” उसने कहा। “मेरा बेटा भी कभी वहीं काम करता था। हुगली के किनारे उसकी एक छोटी नाव थी।”
हरिपद ने अर्णव को बताया कि अगले सप्ताह एक मालवाहक जहाज कोलकाता के लिए रवाना होने वाला है। लेकिन जहाज के मालिक तक पहुँचना आसान नहीं था।
अर्णव ने अपने तकनीकी ज्ञान का उपयोग किया। उसने मछुआरों की एक खराब नाव का इंजन ठीक किया और बदले में उन्हें बंदरगाह तक पहुँचने में मदद मिली।
वहाँ उसने जहाज के कप्तान को इंजन की खराबी पहचानने और उसे दुरुस्त करने में सहायता दी।
कप्तान अभिजीत रॉय उसकी कुशलता से प्रभावित हुआ।
“तुम हमारे जहाज पर सहायक अभियंता के रूप में चल सकते हो,” उसने कहा। “हम कोलकाता जा रहे हैं।”
अर्णव का हृदय तेजी से धड़कने लगा।
इतने वर्षों बाद पहली बार घर लौटने की आशा वास्तविक लग रही थी।
उसने हरिपद के पैर छुए।
“आपने मुझे केवल भोजन नहीं दिया, बाबा। आपने मुझे रास्ता दिया है।”
हरिपद मुस्कुराया।
“रास्ता हमेशा होता है, बेटा। कभी-कभी हमें बस किसी ऐसे इंसान की जरूरत होती है, जो हमें उसकी दिशा बता सके।”
यात्रा का अंतिम चरण सबसे कठिन था।
जहाज को बंगाल की खाड़ी में एक और तूफान का सामना करना पड़ा। कई बार इंजन बंद होने की स्थिति में पहुँच गया। अर्णव ने कप्तान के साथ मिलकर उसे चालू रखने का प्रयास किया।
तीन रातें बिना पर्याप्त नींद के बीतीं।
चौथी सुबह बादल छँटे।
क्षितिज पर परिचित तट दिखाई देने लगा।
अर्णव रेलिंग पकड़कर खड़ा हो गया।
वह हवा, नमक और नदी की गंध को पहचानता था। उसे लगा मानो उसकी स्मृतियाँ धीरे-धीरे अपने पुराने रंग वापस पा रही हों।
“वह हुगली है!” कप्तान ने कहा।
अर्णव की आँखें भर आईं।
कोलकाता।
उसका शहर।
उसका घर।
उसकी माधवी।
लेकिन उसे नहीं मालूम था कि घर पहुँचने पर उसका स्वागत किस रूप में होगा—प्रतीक्षा करती पत्नी, अपरिचित बेटा या बीते समय की राख?
उसने अपने भीतर उठते भय को दबाया।
“जहाज को जितनी जल्दी सुरक्षित बंदरगाह तक पहुँचा सकते हैं, पहुँचाइए।”
कप्तान मुस्कुराया।
“लगता है, तुम्हारी मंजिल अब तुम्हारे सामने है।”
कोलकाता में महाषष्ठी का दिन था।
शहर रोशनी से जगमगा रहा था। कुम्हारटोली की प्रतिमाओं के दर्शन के लिए लोग उमड़ रहे थे। ढाक की गूँज, धूप की सुगंध और नई पोशाकों में सजे बच्चों की हँसी ने पूरे महानगर को उत्सव में डुबो दिया था।
अर्णव बंदरगाह से उतरकर सीधे उत्तर कोलकाता पहुँचा।
वर्षों के संघर्ष ने उसका चेहरा बदल दिया था। दाढ़ी बढ़ गई थी, बालों में सफेदी झलकने लगी थी और चाल में थकान थी।
लेकिन उसकी आँखों में एक ही सपना था—अपने घर का दरवाजा देखना।
जब वह अपनी गली में पहुँचा, तब शाम ढल रही थी।
पड़ोस के पंडाल से आरती की आवाज आ रही थी।
उसने अपने मकान का दरवाजा खटखटाया।
भीतर से किसी बच्चे की आवाज आई—
“कौन?”
अर्णव बोल नहीं पाया।
उसने फिर दरवाजा खटखटाया।
इस बार माधवी बाहर आई।
कुछ क्षण तक वह उसे पहचान नहीं सकी।
उसके सामने एक थका हुआ, धूल से भरा आदमी खड़ा था। लेकिन उसकी आँखें वैसी ही थीं—गहरी, शांत और परिचित।
माधवी के हाथ से पूजा की थाली गिर गई।
“अर्णव?”
उसकी आवाज में अविश्वास, भय और वर्षों का दर्द एक साथ काँप उठा।
अर्णव ने बस इतना कहा—
“माधवी, मैं लौट आया।”
माधवी कुछ क्षण उसे देखती रही। फिर वह उसके सीने से लगकर रो पड़ी।
यह उन आँसुओं का विस्फोट था, जिन्हें उसने वर्षों तक अकेले पिया था।
ईशान कमरे से बाहर आया।
उसने अपनी माँ को एक अजनबी जैसे दिखने वाले आदमी से लिपटे देखा।
“माँ, ये कौन हैं?”
माधवी ने आँसू पोंछते हुए अपने बेटे का हाथ पकड़ा।
“बेटा, ये तुम्हारे बाबा हैं।”
ईशान पीछे हट गया।
“लेकिन बाबा तो तस्वीर में हैं!”
अर्णव के पास उस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं था।
वह घुटनों के बल बैठ गया।
“हाँ, बेटा। मैं तस्वीर में भी था। लेकिन मैं हर दिन तुम्हारे पास लौटने की कोशिश कर रहा था।”
ईशान ने उसे गौर से देखा।
फिर धीरे-धीरे आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
“आप फिर कहीं चले तो नहीं जाएँगे?”
अर्णव ने अपने बेटे को बाँहों में भर लिया।
“अब मेरा सबसे बड़ा अभियान तुम्हारे साथ रहना है।”
उस रात घर में कोई बड़ा उत्सव नहीं हुआ। न कोई भव्य भोज, न कोई शोर।
बस तीन लोग एक साथ बैठे रहे।
माधवी ने अर्णव के लिए गरम भोजन परोसा। ईशान उससे छोटे-छोटे प्रश्न पूछता रहा—समुद्र कैसा होता है, जहाज कितना बड़ा होता है, और क्या सचमुच लहरें पहाड़ों जैसी उठती हैं?
अर्णव हर प्रश्न का उत्तर देता रहा।
वर्षों बाद उस घर में फिर से परिवार की आवाजें गूँज रही थीं।
अर्णव की वापसी से केवल परिवार ही नहीं, बल्कि मकान का विवाद भी नया मोड़ लेने लगा।
समरजीत को जब पता चला कि अर्णव जीवित लौट आया है, तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने अब तक यह मान लिया था कि अर्णव कभी वापस नहीं आएगा।
लेकिन माधवी ने पहले ही दस्तावेज सुरक्षित कर लिए थे और कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी थी। अर्णव के लौटने के बाद दोनों ने मिलकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाए।
समरजीत के झूठे दावों और दबाव की जाँच हुई। परिवार ने मकान पर अपने वैध अधिकार स्थापित करने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया।
अर्णव ने माधवी से कहा—
“तुमने मेरे बिना इतना सब कुछ कैसे सँभाला?”
माधवी ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“तुम समुद्र से लड़ रहे थे। मैं अपने हिस्से के तूफानों से।”
अर्णव ने उसका हाथ थाम लिया।
“मुझे लगा था कि घर लौटकर मैं तुम्हें बचाऊँगा। लेकिन तुमने तो मेरे लौटने से पहले ही अपने साहस से इस घर को बचा लिया।”
माधवी ने कहा—
“संबंधों में कोई एक व्यक्ति हमेशा रक्षक नहीं होता, अर्णव। कभी एक रास्ता खोजता है, तो दूसरा दीपक जलाए रखता है।”
बाहर पंडाल में सिंदूर खेला की तैयारी हो रही थी। ढाक की थाप पर लोगों के कदम थिरक रहे थे।
अर्णव ने महसूस किया कि उसकी यात्रा ने उसे एक नया सत्य सिखाया था।
घर केवल वह स्थान नहीं, जहाँ कोई हमारा इंतजार करता है।
घर वह संबंध है, जिसे हम दूरी, समय और विपत्ति के बावजूद जीवित रखते हैं।
विजयादशमी की सुबह तीनों परिवार के साथ पास के दुर्गापूजा पंडाल पहुँचे।
माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने अर्णव ने हाथ जोड़ दिए।
उसने उन सभी लोगों को याद किया, जिन्होंने उसकी यात्रा में उसकी सहायता की थी—देवयानी, बूढ़े हरिपद, कप्तान अभिजीत और वे साथी जो समुद्र में उससे बिछड़ गए थे।
उसने यह भी समझा कि उसकी वापसी केवल उसकी अपनी बहादुरी का परिणाम नहीं थी। इसमें अनजान लोगों की दया, पत्नी की निष्ठा, बेटे की प्रतीक्षा और अनेक छोटे-छोटे संयोगों का योगदान था।
ईशान ने उसका हाथ पकड़कर पूछा—
“बाबा, क्या आप फिर कभी समुद्र में जाएँगे?”
अर्णव मुस्कुराया।
“समुद्र मुझे हमेशा बुलाएगा, बेटा। लेकिन अब मैं जानता हूँ कि हर यात्रा का एक उद्देश्य होना चाहिए और हर यात्री को यह याद रखना चाहिए कि उसे लौटना कहाँ है।”
माधवी ने उसकी ओर देखा।
उन दोनों के बीच बहुत-सी बातें अब भी अधूरी थीं। वर्षों की दूरी एक ही दिन में समाप्त नहीं हो सकती थी। विश्वास को फिर से गहराई देनी थी, नई स्मृतियाँ बनानी थीं और जीवन को दोबारा साथ जीना सीखना था।
लेकिन अब उनके पास समय था।
जब माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने शंख बजा, तो अर्णव ने आँखें बंद कर लीं।
उसके मन में एक ही प्रार्थना थी—
“माँ, मुझे फिर कभी इतना भटका मत देना कि मैं अपने घर का रास्ता भूल जाऊँ।”
हुगली के ऊपर सूरज चमक रहा था। महानगर की गलियों में उत्सव की ध्वनि फैल रही थी। विसर्जन की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
माँ दुर्गा अपने मायके से विदा होने वाली थीं, लेकिन अर्णव अपने घर लौट आया था।
उसकी संघर्षों से भरी लंबी यात्रा समाप्त हुई थी।
और उसके जीवन का सबसे सुंदर अध्याय अब शुरू होने वाला था।
“जीवन की सबसे लंबी यात्रा वह नहीं, जिसमें हम हजारों मील चलते हैं; बल्कि वह है, जिसमें हम अपने प्रेम, अपने वचन और अपने घर तक लौटने का साहस बनाए रखते हैं।”
प्रेम केवल प्रतीक्षा नहीं है। वह संघर्ष भी है, विश्वास भी, क्षमा भी और दोबारा साथ चलने का निर्णय भी।
क्योंकि दुनिया का हर समुद्र पार किया जा सकता है, यदि मनुष्य को यह याद रहे कि उसके लौटने की प्रतीक्षा में कोई अपना बैठा है।










