*गौर बंगा विश्वविद्यालय में प्रो. नंदिनी साहू का व्याख्यान: ‘श्रुति से डिजिटैलिटी तक भारतीय ज्ञान प्रणाली पर मंथन’*
*मालदा।* गौर बंगा विश्वविद्यालय में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की माननीया कुलपति एवं इग्नू में अंग्रेजी की प्रोफेसर *प्रो. नंदिनी साहू* ने *‘श्रुति से डिजिटैलिटी तक: भारतीय ज्ञान प्रणाली की पुनर्कल्पना – स्मृति की वाणी से एल्गोरिदम के अभिलेखागार तक’* विषय पर सारगर्भित व्याख्यान दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता गौर बंगा विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति *प्रो. आशीष भट्टाचार्य* ने की, जबकि कार्यक्रम का कुशल संयोजन IQAC के निदेशक *प्रो. जितेंद्र साहू* द्वारा किया गया।

अपने व्याख्यान में प्रो. साहू ने परंपरा से आधुनिकता तक की रैखिक यात्रा के अंत में तकनीक को रखने की पारंपरिक धारणा को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय ज्ञान हमेशा से ही संचरण की परिष्कृत तकनीकों – वाणी और स्मृति से लेकर पांडुलिपि, मुद्रण, मीडिया, डेटाबेस और एल्गोरिदम तक के माध्यम से विकसित हुआ है।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि क्या भारतीय ज्ञान प्रणाली डिजिटैलिटी में जीवित रह सकती है, बल्कि यह है कि जब ज्ञान के संचरण का माध्यम बदलता है तो ज्ञान का क्या होता है।
प्रो. साहू ने कई महत्वपूर्ण शोध प्रश्नों के माध्यम से उन ज्ञानमीमांसीय परिवर्तनों की व्याख्या की, जब श्रुति जैसे मौखिक पाठ को डिजिटल डेटा में परिवर्तित किया जाता है। उन्होंने ज्ञान, लोककथा और परंपरा के बीच की सीमाओं की पड़ताल की और इस बात पर जोर दिया कि लेखन मौखिक ज्ञान को संरक्षित करता है या रूपांतरित करता है।
उन्होंने जाति, लिंग, क्षेत्र और भाषा की भूमिका को भी रेखांकित किया, जो यह तय करती है कि कौन ज्ञान का संचार और प्राधिकरण कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि डिजिटल अभिलेखागार को जीवंत परंपराओं को संग्रहालय की स्थिर वस्तुओं में नहीं बदलना चाहिए।
इसके बजाय, उन्होंने भारतीय ज्ञान के एक विस्तृत सातत्य का प्रस्ताव रखा, जिसमें श्रुति, स्मृति, जीवंत व्यवहार, पाठ्यपरकता और डिजिटैलिटी को जानने के परस्पर जुड़े तरीकों के रूप में पढ़ा जाए, जो भारतीय ज्ञान प्रणाली, डिजिटल मानविकी और समकालीन विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम के लिए नई संभावनाएं खोलता है।










