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*एक अधूरी धुन!..* IIM अहमदाबाद के गलियारों में एक प्रेम कहानी *(एक ऐसा प्रेम, जिसे उम्र नहीं… समय ने परखा)*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*एक अधूरी धुन!..*
IIM अहमदाबाद के गलियारों में एक प्रेम कहानी
*(एक ऐसा प्रेम, जिसे उम्र नहीं… समय ने परखा)*
✍️ सुशील कुमार सुमन

अहमदाबाद की सुबह हमेशा कुछ अलग होती है।
सितंबर की हल्की ठंडक, साबरमती की ओर से आती धीमी हवा और IIM अहमदाबाद के पुराने लाल-ईंटों वाले गलियारों में गूंजते कदमों की आवाज़—सब कुछ जैसे किसी पुरानी याद को फिर से जीवित कर देता था।
अनन्या मेहता लगभग डेढ़ साल बाद भारत लौटी थी।
लंदन में अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वह सीधे अहमदाबाद आई थी। लेकिन जिस शहर को उसने कभी सपनों का शहर समझा था, आज वही शहर उसके भीतर एक ऐसा सवाल लेकर खड़ा था जिसका जवाब वह डेढ़ साल से तलाश रही थी।

IIM अहमदाबाद के पास स्थित अपने पुराने घर की बालकनी में खड़ी अनन्या ने सामने देखा।
सामने वाले घर को फूलों और रोशनी से सजाया जा रहा था।
शहनाई बज रही थी।
लोग आ-जा रहे थे।
किसी की शादी थी।
अनन्या के हाथ में पकड़ा कॉफी का कप अचानक कांप गया।
क्योंकि वह शादी किसी और की नहीं थी।
वह थी—
आरव मल्होत्रा के छोटे भाई की शादी।
और आरव…
उसका पहला प्रेम था।
उसका सबसे खूबसूरत सपना था।
और उसकी जिंदगी का सबसे अधूरा अध्याय भी।
अनन्या ने आंखें बंद कर लीं।
और दो वर्ष पीछे चली गई…

दो वर्ष पहले।
अनन्या तब अहमदाबाद के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ती थी।
उसका परिवार मूल रूप से उदयपुर का रहने वाला था। लेकिन पिता के व्यापार में भारी नुकसान होने के बाद परिवार को अहमदाबाद आकर बसना पड़ा।
नया घर।
नया शहर।
नए लोग।
और पुरानी जिंदगी से दूरी।
अनन्या को सबसे ज्यादा याद आती थी अपनी पुरानी संगीत मंडली।

वह गिटार बजाती थी और कॉलेज के छोटे-छोटे कार्यक्रमों में गाने गाती थी।
उसका छोटा भाई कबीर हर समय कैमरा लेकर घूमता रहता था और फिल्मों का दीवाना था।
मां संध्या मेहता घर संभालने के साथ-साथ परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में लगी रहती थीं।
पिता विनोद मेहता कभी बहुत सफल व्यवसायी हुआ करते थे, लेकिन परिस्थितियों और अपनी कुछ कमजोरियों के कारण अब पहले जैसे नहीं रहे थे।
अनन्या के लिए यह बदलाव आसान नहीं था।
एक शाम वह IIM अहमदाबाद के परिसर के पास बनी एक छोटी-सी कॉफी शॉप में बैठी गिटार बजा रही थी।

तभी पीछे से आवाज आई—
“यह धुन… तुमने खुद बनाई है?”
अनन्या ने पलटकर देखा।
सामने करीब पैंतीस वर्ष का एक व्यक्ति खड़ा था।
सादा नीली शर्ट।
आंखों में अजीब-सी शांति।
हाथ में कॉफी का कप।
वह था—
आरव मल्होत्रा।

आरव IIM अहमदाबाद के पूर्व छात्र रह चुका था।
उसने वर्षों पहले अपना MBA पूरा किया था और अब अहमदाबाद में एक छोटा-सा इवेंट और कैटरिंग व्यवसाय चलाता था।
लेकिन उसके व्यक्तित्व की सबसे खास बात उसका व्यवसाय नहीं था।
उसे संगीत से प्रेम था।
पुराने रिकॉर्ड।
कैसेट।
विनाइल।
इंडी रॉक।
और पुराने गानों की दुर्लभ रिकॉर्डिंग इकट्ठा करना उसका जुनून था।
वह कभी कॉलेज के दिनों में संगीत की डिजिटल रिकॉर्डिंग बनाकर दोस्तों के बीच बांटा करता था।
अनन्या ने पहली बार महसूस किया कि कोई उसके संगीत को सिर्फ सुन नहीं रहा था—
समझ भी रहा था।
“तुम्हें The Breeders पसंद हैं?”
आरव ने अचानक पूछा।
अनन्या की आंखें चमक उठीं।
“आपको पता है?”
आरव मुस्कुराया।
“पता ही नहीं… बहुत पहले से सुनता हूं।”

उस दिन उनकी बातचीत करीब दो घंटे चली।
संगीत से शुरू हुई बातचीत जिंदगी तक पहुंच गई।
और जिंदगी से…
खामोशियों तक।

अगले कुछ महीनों में अनन्या और आरव अक्सर मिलने लगे।
कभी कॉफी शॉप में।
कभी IIM के पुराने गलियारों के पास।
कभी साबरमती के किनारे।
कभी किसी संगीत कार्यक्रम में।
आरव उसे किताबें देता।
अनन्या उसे अपनी लिखी कविताएं सुनाती।
दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बन रहा था जिसका नाम किसी ने नहीं दिया था।
लेकिन दोनों समझते थे।
एक दिन अनन्या ने कहा—
“आरव, आपको कभी प्यार हुआ था?”
आरव काफी देर तक चुप रहा।
फिर बोला—
“हुआ था।”
“फिर?”
“वह चली गई।”
“मर गई?”
आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

“नहीं… लेकिन मेरे लिए उससे भी ज्यादा कुछ मर गया था।”
उस दिन अनन्या ने पहली बार उसके चेहरे पर छिपा दर्द देखा।
आरव ने फिर कभी शादी न करने का फैसला कर लिया था।
उसे लगता था कि प्रेम एक बार खो देने के बाद दोबारा नहीं मिलता।
लेकिन अनन्या को यह नहीं पता था कि उसके आने से आरव की वह धारणा धीरे-धीरे टूट रही थी।

अनन्या को यह समझने में ज्यादा समय नहीं लगा कि वह आरव से प्रेम करने लगी है।
लेकिन समस्या थी—
उन दोनों के बीच लगभग पंद्रह साल का उम्र का अंतर।
एक शाम IIM के पुराने पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठकर अनन्या ने कहा—
“आरव, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं।”
“कहो।”
“मैं आपसे प्यार करती हूं।”
आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

कुछ क्षणों तक वह कुछ नहीं बोला।
फिर धीरे से कहा—
“अनन्या… तुम नहीं जानती कि तुम क्या कह रही हो।”
“मैं पूरी तरह जानती हूं।”
“तुम्हारी उम्र क्या है और मेरी उम्र क्या है, कभी सोचा है?”
“प्यार उम्र देखकर नहीं आता।”
“लेकिन जिंदगी उम्र देखकर फैसले करती है।”
अनन्या की आंखों में आंसू आ गए।
“तो क्या मुझे अपने दिल को भी आपकी उम्र देखकर समझाना होगा?”
आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

आरव ने अनन्या से दूरी बनाने की कोशिश की।
लेकिन प्रेम से भागना शायद उतना ही कठिन होता है जितना अपनी परछाईं से भागना।
आरव की मौसी सरोज बुआ, जो वर्षों पहले सामाजिक सेवा से जुड़ गई थीं, दोनों को समझती थीं।
एक दिन उन्होंने आरव से कहा—
“बेटा, उम्र का अंतर तुम्हें डराता है या समाज?”
आरव चुप रहा।
“अगर तुम उससे प्यार नहीं करते, तो उसे जाने दो।”
आरव ने उनकी ओर देखा।
“और अगर करता हूं?”
सरोज बुआ मुस्कुराईं।
“तो अपने डर को पहचानो… प्रेम को नहीं।”
उस रात आरव ने पहली बार खुद से स्वीकार किया—
वह अनन्या से प्रेम करता था।

दोनों ने अपने रिश्ते को दुनिया से छिपाने का फैसला किया।
उनकी मुलाकातें अब छोटी हो गई थीं।
कभी पुस्तकालय में।
कभी कैंपस की कॉफी शॉप में।
कभी बारिश में भीगते हुए।
अनन्या अक्सर कहती—
“काश दुनिया इतनी मुश्किल न होती।”
आरव हंसकर कहता—
“दुनिया मुश्किल नहीं है। हम दोनों शायद उसके लिए थोड़े ज्यादा अलग हैं।”
लेकिन आसपास की दुनिया अपनी कहानी लिख रही थी।
अनन्या के कॉलेज का एक युवक राघव भी उसे पसंद करता था।
उसे उम्मीद थी कि एक दिन अनन्या उसे स्वीकार कर लेगी।
लेकिन अनन्या के दिल में अब सिर्फ आरव था।

हर प्रेम कहानी में एक दिन ऐसा आता है जब छुपी हुई सच्चाई सामने आ जाती है।
अनन्या के मामा विक्रम मेहता ने एक शाम दोनों को साथ देख लिया।
बस इतना ही काफी था।
घर में तूफान आ गया।
“तुम्हें होश है तुम क्या कर रही हो?”
मां संध्या की आवाज कांप रही थी।
“मां, मैं उनसे प्यार करती हूं।”
“वह तुमसे बहुत बड़े हैं!”
“तो?”
“लोग क्या कहेंगे?”
अनन्या ने पहली बार अपनी मां की आंखों में देखकर पूछा—
“मेरी जिंदगी लोग जिएंगे या मैं?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।

परिवार का दबाव बढ़ता गया।
रिश्तेदार।
दोस्त।
समाज।
हर कोई अपने-अपने तर्क दे रहा था।
आरव भी टूटने लगा।
एक रात उसने अनन्या से कहा—
“तुम्हें विदेश जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए।”
“और हमारा क्या होगा?”
“शायद… कुछ रिश्ते जिंदगी में इसलिए आते हैं कि वे हमें बदल दें। हमेशा साथ रहने के लिए नहीं।”
“आप मुझे छोड़ रहे हैं?”
आरव की आंखें नम थीं।
“मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”
“फिर?”
“मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम अपने परिवार, अपना भविष्य और अपने सपने खो दो।”

अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैंने आपको चुना है।”
आरव ने उसका हाथ धीरे से छुड़ा दिया।
“एक दिन तुम समझोगी कि मैंने ऐसा क्यों किया।”
उस रात दोनों अलग हो गए।

अगली सुबह अनन्या ने विदेश जाने के लिए विमान पकड़ा।
एयरपोर्ट पर उसने आखिरी बार पीछे देखा।
आरव नहीं आया था।
लेकिन उसकी जेब में एक छोटी-सी पेन ड्राइव थी।
उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—
“धुन”
उसमें आरव द्वारा उसके लिए रिकॉर्ड किया गया एक संगीत था।
अनन्या ने विमान में बैठकर उसे सुना।
और पहली बार महसूस किया—
कभी-कभी किसी का साथ छूट जाता है…
लेकिन उसकी आवाज जिंदगी भर साथ रहती है।

वर्तमान।
अनन्या फिर अहमदाबाद में थी।
सामने शादी की रोशनी अब और तेज हो चुकी थी।
वह शादी थी—
कबीर के दोस्त नील और आरव की छोटी बहन काव्या की।
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह इतने वर्षों बाद आरव को देखने वाली थी।
शाम को वह शादी में पहुंची।
लोग हंस रहे थे।
संगीत बज रहा था।
और तभी…

भीड़ के दूसरी तरफ आरव दिखाई दिया।
दोनों की नजरें मिलीं।
समय जैसे रुक गया।
डेढ़ साल की दूरी…
एक पल में खत्म हो गई।

शादी के बाद दोस्तों की महफिल लगी।
किसी ने अनन्या से पूछा—
“लंदन कैसा था?”
वह मुस्कुराई।
“बहुत अच्छा।”
फिर किसी ने पूछा—
“और प्यार?”
अनन्या चुप हो गई।
उसने धीरे से कहा—
“वह यहीं रह गया था।”
आरव ने यह सुन लिया।
उसकी आंखें झुक गईं।
तभी आरव के एक पुराने मित्र समीर ने कहा—
“तुम्हें लगता है आरव आगे बढ़ गया?”

अनन्या ने कुछ नहीं कहा।
समीर हंस पड़ा।
“उसने शराब तक छोड़ दी।”
अनन्या चौंक गई।
“क्यों?”
समीर ने उसकी ओर देखकर कहा—
“क्योंकि तुमने एक बार कहा था—’मुझे शराब की गंध पसंद नहीं।'”
अनन्या की आंखों में आंसू भर आए।

रात गहरी हो चुकी थी।
IIM अहमदाबाद की पुरानी लाल दीवारों के पास दोनों अकेले खड़े थे।
आरव ने कहा—
“तुम खुश हो?”
अनन्या ने पूछा—
“आप खुश हैं?”
आरव मुस्कुराया।
“मैंने सवाल पहले पूछा था।”
“मैंने जवाब नहीं दिया।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
फिर अनन्या ने कहा—
“मैंने बहुत कोशिश की थी आपको भूलने की।”
आरव ने धीरे से पूछा—
“भूल पाईं?”
अनन्या ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
आरव की आंखों में नमी थी।
“अनन्या… मैं तुम्हारे भविष्य के रास्ते में नहीं आना चाहता।”
“मेरा भविष्य मैं तय करूंगी।”
“तुम्हारे परिवार का क्या?”
“उन्हें समझने में समय लगेगा।”
“और अगर उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया?”
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो कम से कम मैं यह तो जानूंगी कि मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला डर के कारण नहीं लिया।”
आरव कुछ नहीं बोला।
अनन्या ने उसके कंधे पर सिर रख दिया।
और वर्षों से उनके बीच बंद पड़ी वह अधूरी धुन…
फिर से बजने लगी।

अगले दिन अनन्या अपने माता-पिता के सामने खड़ी थी।
“मैं आरव से शादी करना चाहती हूं।”
मां की आंखों में आंसू थे।
“लोग क्या कहेंगे?”
अनन्या ने मुस्कुराकर कहा—
“मां, लोग आज कुछ कहेंगे… कल कुछ और कहेंगे। लेकिन मेरी जिंदगी मुझे ही जीनी है।”
पिता बहुत देर तक चुप रहे।
फिर उन्होंने पूछा—
“क्या तुम सच में खुश रहोगी?”
अनन्या ने कहा—
“हां।”
उन्होंने आरव की ओर देखा।
“और तुम?”
आरव ने सिर झुका दिया।
“मैंने उसे कभी अपनी जिंदगी से दूर नहीं करना चाहा था। मैंने सिर्फ उसके भविष्य के लिए खुद को दूर किया था।”

पिता ने गहरी सांस ली।
फिर धीरे से कहा—
“अगर तुम दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हो… तो शायद यही सबसे जरूरी बात है।”
मां ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उन्होंने अनन्या का हाथ पकड़ लिया।
वह मौन ही उनकी पहली स्वीकृति थी।

कुछ महीनों बाद IIM अहमदाबाद के उसी परिसर में एक छोटा-सा संगीत समारोह आयोजित हुआ।
मंच पर अनन्या गिटार लेकर बैठी थी।
सामने आरव बैठा था।
अनन्या ने माइक्रोफोन के पास जाकर कहा—
“यह गीत उस इंसान के लिए है, जिसने मुझे सिखाया कि प्रेम पाने से ज्यादा जरूरी है… प्रेम को समझना।”
गिटार की पहली धुन निकली।
आरव मुस्कुराया।
अनन्या भी मुस्कुरा दी।
वह वही धुन थी…
जो दो साल पहले शुरू हुई थी।
जिसे दूरी ने रोक दिया था।
जिसे समय ने परखा था।
और जिसे प्रेम ने फिर पूरा कर दिया था।
क्योंकि कुछ प्रेम कहानियां खत्म नहीं होतीं।
वे बस…
एक लंबे विराम के बाद फिर से शुरू होती हैं।
…..

*“कुछ रिश्ते किस्मत में लिखे नहीं होते…*
*वे दो दिल मिलकर लिखते हैं।”*

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