*प्रेम का मधुर विष !.*
शांतिनिकेतन, बोलपुर की दुर्गापूजा के बीच जन्मी एक अधूरी प्रेमगाथा!..
*(बिनोदिनी वापस आ गई है!..)*
✍️ सुशील कुमार सुमन
प्रेम की मिठास, विरह की पीड़ा और उस अनकहे सत्य की कहानी, जहाँ जिसे हम पाना चाहते हैं, कभी-कभी उसी को खोने के भय से स्वयं को खो बैठते हैं।
शांतिनिकेतन की सुबह में एक अलग ही जादू था।
शरद ऋतु की हल्की ठंडक, लाल मिट्टी पर बिखरी शिउली के फूलों की सफेद चादर, पलाश के पेड़ों के बीच से छनकर आती सुनहरी धूप और दूर कहीं बजते ढाक की आवाज़—ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं माँ दुर्गा के आगमन की तैयारी कर रही हो।
बोलपुर की गलियों में दुर्गापूजा का उत्साह धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुँच रहा था। कहीं कलाकार अल्पना बना रहे थे, कहीं बाँस और कपड़े से पंडाल सजाए जा रहे थे, तो कहीं काश के सफेद फूल हवा के साथ झूमते हुए आने वाले उत्सव का स्वागत कर रहे थे।
इसी शांतिनिकेतन में रहती थी बिनोदिनी —एक युवा चित्रकार, जिसकी आँखों में रंगों के अनगिनत संसार बसे थे।
बिनोदिनी के लिए चित्र बनाना केवल कला नहीं था। वह उन भावनाओं को रंगों में उतारती थी, जिन्हें शब्दों में कहना उसके लिए असंभव था।
उसके जीवन में सब कुछ व्यवस्थित था। एक छोटा-सा घर, माँ की स्मृतियों से भरा आँगन, कला की दुनिया और एक ऐसा अकेलापन, जिसे उसने अपनी आदत बना लिया था।
वह मानती थी कि प्रेम सुंदर अवश्य है, लेकिन मनुष्य को कमजोर भी बना देता है।
उसने अपने लिए एक नियम बना रखा था—किसी से इतनी मोहब्बत मत करना कि उसके जाने के बाद स्वयं को पहचानना मुश्किल हो जाए।
लेकिन प्रेम नियमों की भाषा नहीं समझता।
और कभी-कभी वह सबसे अधिक उसी दरवाजे पर दस्तक देता है, जिसे हमने भीतर से बंद कर रखा होता है।
महालया के अगले दिन, बिनोदिनी अपनी स्केचबुक लेकर कोपाई नदी के किनारे चली गई।
आकाश में बादल थे। हवा में मिट्टी की सौंधी गंध थी। नदी के शांत पानी पर बादलों की परछाइयाँ तैर रही थीं।
वह एक पुराने पेड़ के नीचे बैठकर चित्र बना रही थी कि तभी किसी की आवाज़ सुनाई दी।
“आप नदी का चित्र बना रही हैं या उसकी उदासी का?”
बिनोदिनी ने सिर उठाया।
सामने एक युवक खड़ा था। साधारण कुर्ता, कंधे पर झोला, चेहरे पर हल्की मुस्कान और आँखों में ऐसी गहराई, जिसे पहली दृष्टि में समझना आसान नहीं था।
उसका नाम था ऋत्विक मुखर्जी।
वह कोलकाता से आया था और स्वतंत्र रूप से लेखन तथा फोटोग्राफी करता था। उसे पुराने शहरों, भूली हुई कहानियों और उन लोगों में दिलचस्पी थी, जिनके चेहरे पर मुस्कान और आँखों में कोई अधूरा प्रश्न छिपा होता है।
बिनोदिनी ने उत्तर दिया, “नदी की उदासी नहीं होती। उदासी तो देखने वाले के भीतर होती है।”
ऋत्विक मुस्कराया।
“तो फिर आप नदी नहीं, स्वयं को बना रही हैं।”
बिनोदिनी ने पहली बार किसी अजनबी को ध्यान से देखा।
उस दिन दोनों के बीच केवल कुछ मिनटों की बातचीत हुई, लेकिन जब ऋत्विक वहाँ से चला गया, तो बिनोदिनी को लगा कि उसके चित्र में कुछ बदल गया है।
नदी वही थी।
पेड़ वही था।
आकाश भी वही था।
लेकिन अब चित्र में एक ऐसी रिक्त जगह थी, जिसे भरने के लिए उसके पास कोई रंग नहीं था।
षष्ठी की शाम शांतिनिकेतन रोशनी से जगमगा उठा।
लाल मिट्टी की पगडंडियों पर लोगों की भीड़ थी। कहीं रवींद्र संगीत की धुनें थीं, कहीं ढाक की थाप, तो कहीं धुनुची नृत्य की तैयारी।
बिनोदिनी अपनी मित्र मृणालिनी के साथ एक पूजा पंडाल देखने पहुँची।
वहाँ उसकी मुलाकात फिर ऋत्विक से हुई।
“लगता है शांतिनिकेतन छोटा है,” ऋत्विक ने हँसते हुए कहा।
बिनोदिनी ने जवाब दिया, “या फिर कुछ मुलाकातें बार-बार होने के लिए ही होती हैं।”
कहते-कहते वह स्वयं चुप हो गई।
ऋत्विक ने उसकी आँखों में देखा, लेकिन उस वाक्य का कोई उत्तर नहीं दिया।
दोनों पंडाल के बाहर खड़े होकर लोगों को देखते रहे। एक छोटी बच्ची अपनी माँ का हाथ पकड़कर माँ दुर्गा की प्रतिमा की ओर इशारा कर रही थी। कुछ दूरी पर एक वृद्ध दंपति साथ-साथ चल रहे थे। उनके चेहरों पर उम्र की झुर्रियाँ थीं, लेकिन उनके हाथ एक-दूसरे में ऐसे उलझे थे जैसे समय ने भी उन्हें अलग करना छोड़ दिया हो।
ऋत्विक ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, बिनोदिनी, प्रेम आखिर है क्या?”
बिनोदिनी ने कुछ क्षण सोचा।
“शायद किसी दूसरे व्यक्ति में अपने जीवन का अर्थ खोज लेना।”
“और अगर वह व्यक्ति चला जाए?”
“तो अर्थ भी चला जाता है।”
ऋत्विक ने धीरे से कहा, “तब शायद वह प्रेम नहीं, निर्भरता थी।”
बिनोदिनी ने उसकी ओर देखा।
यह पहली बार था जब किसी ने उसके भीतर छिपे भय को इतने सरल शब्दों में चुनौती दी थी।
उस रात दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं। किताबों, चित्रों, रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं, बचपन की स्मृतियों और उन सपनों के बारे में, जिन्हें उन्होंने परिस्थितियों के कारण अधूरा छोड़ दिया था।
रात समाप्त हो गई, लेकिन बातचीत समाप्त नहीं हुई।
अगली सुबह बिनोदिनी को पहली बार किसी संदेश की प्रतीक्षा थी।
और संदेश आया।
“आज कोपाई चलोगी? नदी को तुम्हारी उदासी का अगला चित्र देखना है।”
बिनोदिनी मुस्करा उठी।
उसे नहीं पता था कि यह मुस्कान उसके जीवन की सबसे खूबसूरत शुरुआत भी बनेगी और सबसे गहरी पीड़ा का कारण भी।
सप्तमी से नवमी तक शांतिनिकेतन उनके प्रेम का साक्षी बनता रहा।
वे सुबह-सुबह सोनाझुरी के रास्तों पर घूमते। हाट में हस्तशिल्प देखते। चाय की छोटी दुकानों पर बैठकर मिट्टी के कुल्हड़ों में चाय पीते। कभी ऋत्विक उसकी तस्वीरें खींचता, तो कभी बिनोदिनी उसे अपने कैनवास पर उतारने की कोशिश करती।
ऋत्विक के साथ बिनोदिनी ने जाना कि हँसना भी एक कला है।
वह अब हर छोटी बात में खुशी खोजने लगी थी। सुबह की पहली किरण, अचानक हुई बारिश, किसी पुराने गीत की धुन—सब कुछ अधिक सुंदर लगने लगा था।
एक दिन ऋत्विक ने उससे पूछा, “अगर तुम्हें मेरे बारे में एक चित्र बनाना हो, तो क्या बनाओगी?”
बिनोदिनी ने कहा, “एक ऐसा रास्ता, जो कहीं पहुँचता नहीं, फिर भी जिस पर चलना अच्छा लगता है।”
“और तुम उस रास्ते पर चलोगी?”
बिनोदिनी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “शायद मैं पहले ही चल चुकी हूँ।”
ऋत्विक ने उसका हाथ थाम लिया।
उस क्षण बिनोदिनी को लगा कि जीवन में पहली बार किसी ने उसे केवल देखा नहीं, समझने की कोशिश भी की है।
लेकिन प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना यही है—जिस क्षण वह हमें सबसे अधिक सुरक्षित महसूस कराता है, उसी क्षण हम अपने भीतर खोने का सबसे बड़ा भय भी पालने लगते हैं।
अब ऋत्विक के देर से आने पर बिनोदिनी बेचैन हो जाती।
उसके संदेश का उत्तर न मिलने पर वह बार-बार फोन देखती।
उसकी किसी महिला मित्र का नाम सुनकर बिनोदिनी के भीतर एक अनजाना संशय जन्म लेने लगा।
वह अपने प्रेम को बचाना चाहती थी, लेकिन उसे बचाने की कोशिश में धीरे-धीरे उसी प्रेम का दम घोंटने लगी थी।
नवमी की रात थी।
पंडालों में आरती हो रही थी। आकाश में रोशनी थी और हवा में धुनुची के धुएँ की सुगंध।
बिनोदिनी और ऋत्विक एक अपेक्षाकृत शांत रास्ते पर साथ चल रहे थे।
तभी ऋत्विक का फोन बजा।
उसने फोन उठाया और कुछ देर बात करने के बाद कहा, “मुझे कल कोलकाता लौटना पड़ सकता है।”
बिनोदिनी के कदम रुक गए।
“कल? लेकिन तुमने तो कहा था कि विजया दशमी के बाद जाओगे।”
“एक जरूरी काम आ गया है।”
“कौन-सा काम?”
“बिनोदिनी, हर बात का विवरण देना जरूरी है क्या?”
यह एक सामान्य वाक्य था, लेकिन बिनोदिनी के भीतर जैसे कुछ टूट गया।
उसने कठोर स्वर में कहा, “नहीं। तुम्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है। आखिर मैं हूँ ही कौन तुम्हारी?”
ऋत्विक ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
“ऐसा मत कहो।”
“तो क्या कहूँ? कि मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँ? कि तुम जब चाहो आओ और जब चाहो चले जाओ? कि तुम्हारे जीवन में मेरी कोई जगह है या नहीं, यह पूछने का भी मुझे अधिकार नहीं?”
ऋत्विक कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने कहा, “तुम्हारी जगह है, बिनोदिनी। लेकिन मैं तुम्हारे जीवन का हर निर्णय नहीं बन सकता। और तुम भी मेरे जीवन का हर निर्णय नहीं बन सकती।”
बिनोदिनी की आँखें भर आईं।
“मैं तुमसे सिर्फ इतना चाहती हूँ कि तुम मुझे खोने से डरो।”
ऋत्विक ने बहुत धीरे से उत्तर दिया, “और मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे प्रेम करो, लेकिन मुझे खोने के भय में स्वयं को मत खो दो।”
बिनोदिनी ने अपना हाथ छुड़ा लिया।
“यह कह देना आसान है। प्रेम करने वाले को खोने का डर ही तो प्रेम की गहराई बताता है।”
ऋत्विक ने सिर हिलाया।
“कभी-कभी वह डर प्रेम की गहराई नहीं, हमारी असुरक्षा की गहराई बताता है।”
बिनोदिनी वहाँ से चली गई।
पीछे ढाक बज रहा था।
माँ दुर्गा के सामने हजारों लोग हाथ जोड़कर खड़े थे।
और दो लोग, जो एक-दूसरे से प्रेम करने लगे थे, पहली बार यह समझ नहीं पा रहे थे कि उनके बीच की दूरी का कारण परिस्थितियाँ थीं या उनका अपना भय।
दशमी की सुबह बिनोदिनी ने ऋत्विक का कोई संदेश नहीं देखा।
उसने स्वयं फोन किया।
फोन नहीं उठा।
दोपहर तक उसने तीन बार कॉल किया। फिर एक संदेश लिखा—
“अगर तुम्हें जाना ही था, तो मेरे जीवन में आए क्यों?”
कुछ देर बाद उत्तर आया—
“मैं तुम्हारे जीवन में आया था, उसे सुंदर बनाने के लिए। लेकिन अगर मेरी उपस्थिति तुम्हें हर पल भयभीत कर रही है, तो हमें अपने प्रेम को समझने के लिए कुछ समय चाहिए।”
बिनोदिनी को यह उत्तर अस्वीकार जैसा लगा।
उसने लिख दिया—
“तुम्हें प्रेम नहीं, केवल अपनी स्वतंत्रता प्यारी है।”
इस बार कोई उत्तर नहीं आया।
शाम को ऋत्विक कोलकाता लौट गया।
उसके जाने के बाद बिनोदिनी ने अपने कमरे के दरवाजे बंद कर लिए। उसने चित्र बनाना छोड़ दिया। जिन रास्तों पर वे साथ चले थे, वहाँ जाना बंद कर दिया।
वह अपने मित्रों से कहती कि ऋत्विक ने उसे धोखा दिया।
लेकिन जब रात में अकेली होती, तो उसे याद आता कि ऋत्विक ने उससे कभी कोई वादा नहीं किया था, जिसे उसने तोड़ा हो।
उसने उसे प्रेम दिया था, समय दिया था, अपने जीवन की कहानियाँ सुनाई थीं।
लेकिन बिनोदिनी उस प्रेम को एक निश्चित भविष्य की गारंटी बना देना चाहती थी।
वह चाहती थी कि ऋत्विक की हर सुबह में उसका नाम हो, हर निर्णय में उसकी अनुमति हो और हर विदाई में उसके लिए अपराधबोध।
वह प्रेम चाहती थी, लेकिन अनजाने में उस प्रेम पर अपना अधिकार भी चाहती थी।
और जब अधिकार को प्रेम का दूसरा नाम बना दिया जाता है, तब निकटता भी धीरे-धीरे कैद में बदलने लगती है।
दुर्गापूजा समाप्त हो चुकी थी।
पंडालों की रोशनियाँ उतरने लगी थीं। रास्तों पर बिखरे फूल सूखने लगे थे। हवा में उत्सव के बाद वाली उदासी थी।
एक सुबह बिनोदिनी को डाक से एक लिफाफा मिला।
उस पर ऋत्विक की लिखावट थी।
पत्र में लिखा था—
“प्रिय बिनोदिनी,
तुम्हारे साथ बिताए वे कुछ दिन मेरे जीवन के सबसे सुंदर दिनों में रहेंगे। तुम्हारे साथ मैंने सीखा कि किसी जगह को देखने और उसे महसूस करने में कितना अंतर होता है।
लेकिन मैंने यह भी देखा कि हम कभी-कभी किसी व्यक्ति को इतना महत्वपूर्ण बना देते हैं कि उसकी स्वतंत्रता हमें अपने अस्तित्व के लिए खतरा लगने लगती है।
मैं तुमसे दूर इसलिए नहीं जा रहा कि तुम्हारे लिए मेरे मन में भावनाएँ नहीं हैं। मैं दूर जा रहा हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि हमारा प्रेम हर दिन किसी परीक्षा से गुजरे।
मैं तुम्हें आश्वासन दे सकता हूँ, लेकिन तुम्हारे हर भय को समाप्त नहीं कर सकता। तुम मुझे अपना समय दे सकती हो, लेकिन मुझे अपने जीवन का स्वामी नहीं बना सकती। और मैं भी तुम्हारे लिए यह नहीं कर सकता कि तुम्हारे भीतर के हर खालीपन को भर दूँ।
प्रेम का अर्थ किसी के भीतर पूरी तरह समा जाना नहीं है।
कभी-कभी प्रेम का अर्थ है—दो अलग-अलग व्यक्तियों का साथ चलना, बिना एक-दूसरे को मिटाए।
अगर कभी तुम मुझे याद करो, तो उस व्यक्ति की तरह याद करना, जिसके साथ तुमने हँसना सीखा था। उस व्यक्ति की तरह नहीं, जिसके जाने से तुम्हारा जीवन समाप्त हो गया।
तुम्हारा,
ऋत्विक।”
पत्र पढ़ते-पढ़ते बिनोदिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
वह चाहती थी कि पत्र में कोई वादा होता।
कोई तारीख होती।
कोई ऐसा वाक्य होता, जो उसे बता देता कि ऋत्विक वापस आएगा।
लेकिन पत्र में केवल प्रेम था—और प्रेम के साथ एक ऐसी स्वतंत्रता, जिसे स्वीकार करने के लिए उसका मन अभी तैयार नहीं था।
उसने पत्र को मोड़कर अपनी स्केचबुक में रख दिया।
कई दिनों बाद वह पहली बार चित्र बनाने बैठी।
उसने एक कैनवास पर दो रास्ते बनाए।
दोनों कुछ दूर तक साथ चलते थे, फिर अलग-अलग दिशाओं में मुड़ जाते थे।
उनके बीच कोई दीवार नहीं थी।
कोई जंजीर नहीं थी।
फिर भी दोनों रास्ते एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते थे।
बिनोदिनी ने उस चित्र का नाम रखा—“प्रेम का मधुर विष।”
समय बीत गया।
बिनोदिनी ने फिर से चित्र बनाना शुरू किया। उसकी कला में एक नई गहराई आ गई थी। अब वह केवल सुंदर चेहरों और रंगीन दृश्यों को नहीं बनाती थी; वह मनुष्य के भीतर की उलझनों, उसके अकेलेपन और उसकी इच्छाओं को भी चित्रित करने लगी थी।
उसकी एक प्रदर्शनी कोलकाता में आयोजित हुई।
प्रदर्शनी का सबसे चर्चित चित्र वही था—दो रास्ते, जो कुछ दूर तक साथ चलते थे और फिर अलग हो जाते थे।
एक कला समीक्षक ने उससे पूछा, “क्या यह किसी असफल प्रेम की कहानी है?”
बिनोदिनी मुस्कराई।
“नहीं। यह उस प्रेम की कहानी है, जिसे हम केवल पाने की इच्छा में समझ नहीं पाए।”
“क्या आप आज भी उस व्यक्ति से प्रेम करती हैं?”
बिनोदिनी कुछ देर चुप रही।
“शायद प्रेम हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी वह किसी को अपने पास रखने की इच्छा होता है। कभी उसकी खुशी की कामना। और कभी केवल एक स्मृति, जिसे हम बिना शिकायत अपने भीतर रहने देते हैं।”
कुछ वर्षों बाद, दुर्गापूजा के अवसर पर बिनोदिनी फिर शांतिनिकेतन लौटी।
सोनाझुरी के हाट में घूमते हुए उसकी नजर एक पुस्तक के आवरण पर पड़ी। पुस्तक का लेखक था—ऋत्विक मुखर्जी।
वह कुछ क्षण तक वहीं खड़ी रही।
फिर उसने पुस्तक खरीदी।
पहले पन्ने पर लेखक की ओर से एक छोटा-सा संदेश लिखा था—
“उन सभी लोगों के नाम, जिन्होंने मुझे सिखाया कि प्रेम किसी को पा लेने का दूसरा नाम नहीं है।”
नीचे कोई नाम नहीं था।
बिनोदिनी ने पुस्तक बंद कर दी।
उसके भीतर वर्षों पुरानी कोई पीड़ा हल्की-सी हिली, लेकिन इस बार उसने उस पीड़ा से भागने की कोशिश नहीं की।
वह कोपाई नदी की ओर चली गई।
वही नदी।
वही हवा।
वही लाल मिट्टी।
बस, अब उसके भीतर पहले जैसी बेचैनी नहीं थी।
नदी के किनारे बैठकर उसने अपनी स्केचबुक खोली और एक नया चित्र बनाना शुरू किया।
इस बार उसने नदी के दोनों किनारों को चित्रित किया। वे एक-दूसरे को छू नहीं सकते थे, फिर भी नदी उनके बीच बहती हुई दोनों को एक ही दृश्य का हिस्सा बना रही थी।
चित्र बनाते हुए उसे पहली बार समझ आया कि दूरी हमेशा अलगाव नहीं होती।
कभी-कभी दूरी ही वह स्थान होती है, जिसमें प्रेम साँस ले सकता है।
शाम ढलने लगी थी।
दूर किसी पंडाल से आरती की आवाज़ आ रही थी। हवा में शिउली के फूलों की हल्की सुगंध थी।
बिनोदिनी ने आकाश की ओर देखा।
उसे ऋत्विक की याद आई। उसके शब्द याद आए। उसकी हँसी याद आई। वह रात याद आई, जब उसने पहली बार अपना हाथ उसके हाथ में दिया था।
अब उन स्मृतियों में शिकायत नहीं थी।
केवल एक हल्की मिठास थी, जिसके भीतर थोड़ी-सी कसक भी घुली हुई थी।
बिनोदिनी समझ चुकी थी कि प्रेम हमेशा सुख नहीं देता। कभी वह हमें हमारी कमजोरियों से मिलवाता है, कभी हमारे भीतर छिपे भय से और कभी उस कठोर सत्य से कि कोई दूसरा व्यक्ति हमारे जीवन को सुंदर बना सकता है, लेकिन हमारे जीवन का पूरा अर्थ नहीं बन सकता।
प्रेम में मिठास इसलिए है कि वह हमें अपने अस्तित्व से बाहर किसी दूसरे की दुनिया से जोड़ता है।
और उसमें विष इसलिए है कि जब हम उस जुड़ाव को अपना अधिकार समझने लगते हैं, तो वही सुंदर अनुभूति पीड़ा का कारण बन सकती है।
शायद प्रेम का सबसे कठिन पाठ यही है—किसी को पूरे मन से चाहना, लेकिन उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करना; किसी की उपस्थिति से खुश होना, लेकिन उसकी अनुपस्थिति में स्वयं को समाप्त न कर देना।
माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने लोग अंतिम प्रणाम कर रहे थे।
बिनोदिनी ने भी आँखें बंद कीं।
उसने ऋत्विक को वापस माँगने की प्रार्थना नहीं की।
उसने केवल इतनी प्रार्थना की कि उसके भीतर प्रेम करने की क्षमता कभी समाप्त न हो।
क्योंकि अब वह जानती थी कि प्रेम का अर्थ किसी को हमेशा के लिए अपना बना लेना नहीं है।
प्रेम का अर्थ है—किसी के आने से अपने भीतर फूलों का खिलना और उसके चले जाने के बाद भी उस बगीचे को जीवित रखना।
और शांतिनिकेतन की उस लाल मिट्टी पर, दुर्गापूजा की उस सांझ में, बिनोदिनी ने पहली बार महसूस किया कि कुछ प्रेम अधूरे होकर भी व्यर्थ नहीं होते।
कुछ प्रेम हमारे साथ जीवन बिताने नहीं आते।
वे हमें जीवन को एक नए ढंग से देखना सिखाने आते हैं।
उनकी स्मृति कभी मीठी होती है, कभी कड़वी।
लेकिन यदि उनसे हम स्वयं को खोने के बजाय स्वयं को पहचानना सीख जाएँ, तो शायद वही प्रेम अपने भीतर छिपे मधुर विष को अमृत में बदल देता है।










