*प्रेमचंद!..*
*हिंदी साहित्य की एक महान विरासत*
(एक जीवनीपरक साहित्यिक महाउपन्यास)
✍️ लेखक : सुशील कुमार सुमन
भाग–19 : नौकरी से त्यागपत्र — जब प्रेमचंद ने सुरक्षित जीवन छोड़कर साहित्य को चुना
*“कभी-कभी जीवन में सबसे कठिन निर्णय वह होता है,*
*जिसमें मनुष्य सुविधा नहीं, अपने अंतःकरण का साथ चुनता है।”*
सन् 1921।
भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा था, जब स्वतंत्रता केवल नेताओं के भाषणों का विषय नहीं रह गई थी। वह धीरे-धीरे सामान्य भारतीय के घर तक पहुँच रही थी।
गाँवों की चौपालों में उसकी चर्चा होने लगी थी।
शहरों के विद्यार्थियों में बेचैनी थी।
व्यापारी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बातें कर रहे थे।
कहीं चरखा चल रहा था, कहीं सत्याग्रह की तैयारी हो रही थी।
और इन सबके बीच एक व्यक्ति की आवाज देश के कोने-कोने में सुनाई दे रही थी—
महात्मा गांधी।
उनका संदेश था—
असहयोग।
अंग्रेजी शासन की संस्थाओं से दूरी।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
सत्य और अहिंसा के मार्ग पर संघर्ष।
यह आंदोलन केवल राजनीति नहीं था।
यह मनुष्य के भीतर चलने वाला संघर्ष भी था—
“मैं किसके लिए काम कर रहा हूँ?”
इसी प्रश्न ने एक सरकारी कर्मचारी के मन को भी झकझोर दिया था।
वह व्यक्ति था—
धनपत राय।
दुनिया जिसे आगे चलकर प्रेमचंद के नाम से जानेगी।
प्रेमचंद लंबे समय से शिक्षा विभाग की सरकारी सेवा में थे।
नौकरी ने उन्हें स्थिरता दी थी।
घर चलाने के लिए आय थी।
परिवार की जिम्मेदारियाँ थीं।
बच्चों की आवश्यकताएँ थीं।
भविष्य की चिंता थी।
उस समय सरकारी नौकरी छोड़ देना आज की तरह केवल नौकरी बदलने का निर्णय नहीं था।
यह आर्थिक सुरक्षा को स्वयं अपने हाथों से छोड़ देना था।
एक ओर था—
नियमित वेतन।
दूसरी ओर था—
स्वतंत्रता आंदोलन का आह्वान।
और तीसरी ओर थी—
*”एक लेखक की अंतरात्मा।”*
प्रेमचंद केवल सरकारी कर्मचारी नहीं थे।
वे उस भारत को लिख रहे थे जिसे वे चारों ओर देख रहे थे।
उन्होंने किसानों की गरीबी देखी थी।
गरीबों की विवशता देखी थी।
स्त्रियों की पीड़ा देखी थी।
जातिगत भेदभाव देखा था।
मध्यवर्ग की झूठी प्रतिष्ठा देखी थी।
और उन्होंने यह भी देखा था कि शासन केवल कानूनों से नहीं चलता—
वह लोगों के मन पर भी प्रभाव डालता है।
इसलिए उनके सामने प्रश्न धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया—
यदि मेरी कलम स्वतंत्र भारत का स्वप्न लिखती है, तो क्या मेरा जीवन उस स्वप्न से अलग रह सकता है?
यह प्रश्न इतिहास की पुस्तकों में शायद कुछ शब्दों में लिखा जाए।
लेकिन एक मनुष्य के लिए वह प्रश्न बहुत बड़ा था।
8 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी गोरखपुर पहुँचे।
उनके भाषण और असहयोग आंदोलन के आह्वान का प्रेमचंद पर गहरा प्रभाव पड़ा—ऐसा उनके जीवन से जुड़े संस्मरणों और जीवनी-साहित्य में वर्णित है।
कल्पना कीजिए उस वातावरण की।
हजारों लोग गांधी को सुनने के लिए एकत्रित हैं।
किसी के हाथ में तिरंगा है।
कहीं से “महात्मा गांधी की जय” की आवाज आ रही है।
किसी के मन में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रोध है।
किसी के मन में स्वतंत्रता की आकांक्षा।
*और भीड़ के बीच एक लेखक खड़ा है।*
वह केवल भाषण नहीं सुन रहा।
वह अपने भीतर कुछ सुन रहा है।
एक पुकार।
वह पुकार शायद यह थी—
“यदि देश स्वतंत्रता के लिए अपने घरों से निकल रहा है,
तो क्या मैं अपने सुरक्षित कमरे में बैठकर केवल उसके बारे में लिखता रहूँ?”
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रेमचंद के मन में उस क्षण कौन-सा शब्द चला होगा, इसका कोई प्रमाणित शब्दशः विवरण हमारे पास नहीं है।
लेकिन उनके जीवन की दिशा से इतना स्पष्ट है कि 1921 में गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव के बाद उन्होंने सरकारी सेवा छोड़ने का निर्णय लिया।
और यही निर्णय उनके जीवन का एक निर्णायक मोड़ बना।
लेकिन इतिहास जब किसी महान व्यक्ति के निर्णय को याद करता है, तो अक्सर उस निर्णय के पीछे छिपी छोटी-छोटी चिंताओं को भूल जाता है।
नौकरी छोड़ने से पहले प्रेमचंद के सामने केवल राष्ट्र नहीं था।
घर भी था।
परिवार था।
दैनिक खर्च था।
भविष्य था।
लेखक होना रोमांचक लग सकता है।
लेकिन लेखक बनकर परिवार चलाना—
यह एक बिल्कुल अलग प्रश्न था।
आज हम प्रेमचंद का नाम लेते हुए जानते हैं कि वे महान लेखक थे।
लेकिन सन् 1921 में भविष्य किसी को दिखाई नहीं देता था।
उन्हें यह नहीं पता था कि उनकी पुस्तकें आने वाली पीढ़ियों में पढ़ी जाएँगी।
उन्हें यह भी नहीं पता था कि उनके उपन्यास एक दिन विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में होंगे।
*उन्हें यह नहीं पता था कि गोदान, गबन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि जैसी रचनाएँ हिंदी साहित्य की धरोहर बनेंगी।*
उस समय उनके सामने केवल एक कठिन वर्तमान था।
और उस वर्तमान में उन्हें निर्णय लेना था।
नहीं।
यह निर्णय आसान नहीं था।
एक लेखक के भीतर दो आवाजें संघर्ष कर सकती थीं।
पहली आवाज कहती—
“परिवार की जिम्मेदारी पहले है।”
दूसरी आवाज कहती—
“देश की पुकार भी तो सुननी होगी।”
एक आवाज सुरक्षा चाहती थी।
दूसरी स्वतंत्रता।
एक आवाज कहती—
“नौकरी बचाए रखो।”
दूसरी पूछती—
“लेकिन आत्मा का क्या?”
यही वह बिंदु था जहाँ प्रेमचंद का साहित्य और उनका जीवन एक-दूसरे के निकट आने लगे।
वे जिन किसानों के बारे में लिखते थे, उनके पास सुरक्षा नहीं थी।
वे जिन गरीबों के दुख लिखते थे, उनके पास विकल्प नहीं थे।
वे जिन स्त्रियों की पीड़ा लिखते थे, उनके जीवन पर समाज के कठोर नियमों का नियंत्रण था।
और अब स्वयं लेखक को भी अपने जीवन में एक कठिन चुनाव करना था।
सन् 1921 में प्रेमचंद ने सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया।
यह केवल नौकरी से इस्तीफा नहीं था।
यह उनके जीवन की दिशा बदलने वाला निर्णय था।
एक सरकारी कर्मचारी—
अब स्वतंत्र लेखक बनने की राह पर था।
लेकिन यह रास्ता फूलों से भरा हुआ नहीं था।
इसके आगे आर्थिक संघर्ष था।
अनिश्चितता थी।
लेखन से होने वाली सीमित आय थी।
पत्र-पत्रिकाओं का संसार था।
प्रकाशकों के साथ संबंध थे।
और सबसे बढ़कर—
एक लेखक की स्वतंत्रता की कीमत थी।
प्रेमचंद ने वह कीमत स्वीकार की।
प्रेमचंद का यह निर्णय अचानक पैदा हुई देशभक्ति का परिणाम नहीं था।
उनके भीतर राष्ट्रीय चेतना पहले से विकसित हो रही थी।
सन् 1908 में उनके नाम से जुड़ी देशभक्ति की रचनाओं का संग्रह ‘सोज़-ए-वतन’ ब्रिटिश सरकार की नजर में आया।
उस संग्रह पर औपनिवेशिक सत्ता ने आपत्ति की और उसकी प्रतियाँ जब्त की गईं।
यह घटना उनके साहित्यिक जीवन में महत्वपूर्ण थी।
उस समय वे ‘नवाब राय’ नाम से लिखते थे।
बाद में ‘प्रेमचंद’ नाम उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की पहचान बन गया।
यह नाम आगे चलकर इतना प्रसिद्ध हुआ कि धनपत राय का वास्तविक नाम पीछे छूट गया।
लेकिन नाम बदलने से उनकी चिंता नहीं बदली।
उनकी चिंता वही रही—
भारत का सामान्य मनुष्य।
सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद के पास अब समय अधिक था।
लेकिन समय के साथ जिम्मेदारियाँ भी बढ़ीं।
अब साहित्य केवल उनका शौक नहीं था।
यह उनका जीवन बन रहा था।
वे लिखते।
सोचते।
पढ़ते।
संपादन करते।
पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े।
साहित्यिक संसार में सक्रिय होते गए।
उनकी रचनाओं का संसार भी विस्तृत होता गया।
अब कहानी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही।
वह समाज का आईना बनने लगी।
उनके पात्र साधारण लोग थे।
लेकिन उन्हीं साधारण लोगों के भीतर असाधारण प्रश्न छिपे थे।
किसान क्यों गरीब है?
स्त्री को अपनी इच्छा से जीवन जीने का अधिकार क्यों नहीं?
जाति मनुष्य से बड़ी कैसे हो सकती है?
धन के सामने नैतिकता क्यों हार जाती है?
क्या धर्म केवल कर्मकांड है?
क्या स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों से मुक्ति का नाम है?
और धीरे-धीरे प्रेमचंद की कलम इन प्रश्नों को हिंदी साहित्य के केंद्र में ले आई।
प्रेमचंद का व्यक्तित्व अब केवल कहानीकार या उपन्यासकार तक सीमित नहीं रहा।
वे साहित्यिक पत्रकारिता और संपादन से भी जुड़े।
आगे चलकर उन्होंने ‘हंस’ जैसी पत्रिका के माध्यम से साहित्य और समाज के बीच संवाद को मजबूत किया।
उन्होंने साहित्य को केवल अभिजात वर्ग का मनोरंजन नहीं माना।
उनके लिए साहित्य का संबंध उस व्यक्ति से भी था—
जो खेत में हल चला रहा है।
जो मजदूरी कर रहा है।
जो भूखा सो रहा है।
जो दहेज के कारण बेटी के विवाह से चिंतित है।
जो जाति के कारण अपमानित हो रहा है।
जो गरीबी के कारण अपने सपनों को दबा रहा है।
प्रेमचंद की दृष्टि में साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही थी—
वह उस व्यक्ति को आवाज दे सकता है जिसकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुँचती।
अब एक बड़ा प्रश्न उठता है—
सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद के साहित्य में क्या बदला?
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि उनका जीवन और साहित्य और अधिक निकट आ गए।
उनकी रचनाओं में समाज पहले भी था।
लेकिन अब साहित्य उनके जीवन का मुख्य कर्म बन रहा था।
उनका लेखन और अधिक व्यापक सामाजिक अनुभवों से जुड़ता गया।
उन्होंने गाँव को देखा।
शहर को देखा।
मध्यवर्ग को देखा।
किसानों को देखा।
मजदूरों को देखा।
स्त्रियों को देखा।
धर्म और राजनीति के संबंध को देखा।
और सबसे महत्वपूर्ण—
उन्होंने मनुष्य को देखा।
यही कारण है कि प्रेमचंद के पात्र आज भी केवल इतिहास के पात्र नहीं लगते।
वे हमारे आसपास के लोग लगते हैं।
प्रेमचंद के साहित्य में एक गहरी धारणा दिखाई देती है—
साहित्य समाज से अलग नहीं हो सकता।
लेखक यदि समाज को देखता है, तो उसे समाज के प्रश्नों से भी गुजरना होगा।
यदि वह केवल सुंदरता लिखे और पीड़ा से आँखें बंद कर ले, तो उसकी दृष्टि अधूरी रह जाएगी।
प्रेमचंद ने गरीबी को रोमांटिक नहीं बनाया।
उन्होंने उसका दर्द दिखाया।
उन्होंने किसान को केवल ‘भारत की आत्मा’ कहकर छोड़ नहीं दिया।
उन्होंने पूछा—
उस किसान की जमीन किसकी है?
उस पर कर्ज क्यों है?
उसका श्रम किसके काम आता है?
उसके घर में भोजन क्यों नहीं है?
यही प्रश्न आगे चलकर ‘गोदान’ में अपनी चरम अभिव्यक्ति पाएँगे।
लेकिन उस महान उपन्यास तक पहुँचने में अभी समय था।
नौकरी छोड़ने के बाद साहित्य को जीवन का मुख्य आधार बनाना आसान नहीं था।
प्रेमचंद के जीवन में आर्थिक कठिनाइयाँ बनी रहीं।
लेकिन कठिनाई ने उनकी कलम को रोक नहीं दिया।
बल्कि शायद उसने उनकी दृष्टि को और तीखा किया।
जिस लेखक ने स्वयं आर्थिक असुरक्षा देखी हो, वह गरीब मनुष्य की चिंता को केवल कल्पना से नहीं समझता।
वह जानता है कि—
एक महीने की आय रुक जाना क्या होता है।
घर के खर्च की चिंता क्या होती है।
बच्चों की आवश्यकता और अपनी इच्छा के बीच चुनाव क्या होता है।
यही कारण है कि प्रेमचंद की गरीबी पर लिखी रचनाएँ केवल आँकड़े नहीं देतीं।
वे मानवीय अनुभव देती हैं।
1921 के बाद प्रेमचंद का जीवन धीरे-धीरे उस दिशा में आगे बढ़ा जिसे हम आज उनके साहित्यिक उत्कर्ष के रूप में देखते हैं।
रंगभूमि।
निर्मला।
गबन।
कर्मभूमि।
और अंततः—
गोदान।
इन रचनाओं के बीच केवल वर्षों का अंतर नहीं था।
इनके बीच भारतीय समाज का बदलता हुआ चेहरा था।
प्रेमचंद भी बदल रहे थे।
उनकी दृष्टि गहरी हो रही थी।
उनके प्रश्न बड़े होते जा रहे थे।
और उनके पात्र अधिक जटिल होते जा रहे थे।
यदि प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी नहीं छोड़ी होती, तो क्या वे महान लेखक नहीं बनते?
इस प्रश्न का निश्चित उत्तर इतिहास नहीं दे सकता।
संभव है वे फिर भी महान लेखक बनते।
लेकिन 1921 का त्यागपत्र उनके जीवन की दिशा में एक स्पष्ट मोड़ था।
इसने उनके जीवन में साहित्य को और अधिक केंद्रीय स्थान दिया।
उन्होंने अपने कर्म को चुना।
उन्होंने अपनी कलम को चुना।
उन्होंने अपने समय के प्रश्नों से सीधा संवाद चुना।
और सबसे महत्वपूर्ण—
उन्होंने अपने लेखन को अपने जीवन से अलग नहीं रखा।
कल्पना कीजिए—
रात का समय है।
कमरे में एक दीपक जल रहा है।
बाहर देश स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है।
अंदर एक लेखक कागज पर शब्द लिख रहा है।
वह जानता है कि उसकी कलम अंग्रेजी शासन को गिरा नहीं सकती।
लेकिन वह यह भी जानता है कि—
कलम मनुष्य के भीतर प्रश्न पैदा कर सकती है।
और प्रश्न से विचार पैदा होता है।
विचार से चेतना।
चेतना से परिवर्तन।
शायद यही प्रेमचंद की सबसे बड़ी शक्ति थी।
उन्होंने बंदूक नहीं उठाई।
उन्होंने सत्ता पर अधिकार नहीं किया।
उन्होंने कोई राजनीतिक पद नहीं संभाला।
उन्होंने केवल—
मनुष्य की कहानी लिखी।
और वही कहानी आगे चलकर समाज का दस्तावेज बन गई।
नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा और अधिक विस्तृत होने वाली थी।
अब वे केवल उपन्यास नहीं लिखेंगे।
वे पत्रिकाओं से जुड़ेंगे।
संपादन करेंगे।
साहित्यिक बहसों में भाग लेंगे।
नई पीढ़ी के लेखकों के लिए मार्ग बनाएँगे।
और उनकी कलम धीरे-धीरे उस भारत के सबसे बड़े प्रश्न तक पहुँचेगी—
भारतीय किसान का जीवन।
यहीं से हमारी कथा आगे बढ़ेगी।
एक ऐसा किसान—
जिसके पास जमीन है,
लेकिन जमीन पर अधिकार नहीं।
जिसके पास श्रम है,
लेकिन श्रम का उचित फल नहीं।
जिसके पास परिवार है,
लेकिन परिवार को सुरक्षित रखने के साधन नहीं।
जिसके पास सपने हैं,
लेकिन उन सपनों के ऊपर कर्ज, परंपरा और व्यवस्था का बोझ है।
उस किसान का नाम होगा—
*होरी।*
और उसके माध्यम से प्रेमचंद भारतीय ग्रामीण जीवन की ऐसी महागाथा लिखेंगे, जो हिंदी साहित्य में अमर हो जाएगी।
और शायद यही कारण है कि उनकी रचनाओं में केवल लेखक की कल्पना नहीं—
एक युग की धड़कन सुनाई देती है।
क्रमशः…
अगला भाग — भाग–20 : ‘हंस’ — जब प्रेमचंद ने साहित्य को समाज की आवाज बना दिया
अगले भाग में:
प्रेमचंद की साहित्यिक पत्रकारिता, हंस का जन्म, उनके संपादकीय दृष्टिकोण, साहित्य और समाज के संबंध पर उनके विचार, समकालीन लेखकों से संवाद तथा वह साहित्यिक संसार जिसमें प्रेमचंद केवल लेखक नहीं, बल्कि एक युग की साहित्यिक चेतना के प्रतिनिधि बनते जा रहे थे।










