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*पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी : भारतीय शास्त्रीय संगीत के महामनीषी*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे (१० अगस्त १८६० – १९ सितंबर १९३६) का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उन्होंने न केवल भारतीय संगीत की गहन विद्वत्ता प्राप्त की, बल्कि उसे एक संगठित और वैज्ञानिक रूप प्रदान करने का ऐतिहासिक कार्य भी किया।

भातखंडे जी का जन्म महाराष्ट्र के ठाणे में हुआ। प्रारंभ में वे विधि (क़ानून) की शिक्षा लेकर वकालत के क्षेत्र में कार्यरत थे, परंतु संगीत के प्रति उनका आकर्षण इतना गहरा था कि उन्होंने अपना जीवन संगीत साधना और शोध के लिए समर्पित कर दिया।

भारतीय संगीत का वैज्ञानिक वर्गीकरण

भातखंडे जी ने देखा कि विभिन्न घरानों और परंपराओं में राग-रागिनियों के नाम और स्वरूप अलग-अलग हैं, जिससे विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। उन्होंने देशभर की यात्रा करके, विद्वानों और उस्तादों से संवाद करके, रागों का सुव्यवस्थित वर्गीकरण तैयार किया।
उनका “ठाठ पद्धति” (Ten Thaats) आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा का आधार है।

शिक्षा और साहित्यिक योगदान

भातखंडे जी ने संगीत को राजमहलों और विशेष वर्गों तक सीमित रहने से बाहर निकालकर आम जनता और शिक्षण संस्थानों तक पहुँचाने का प्रयास किया। उन्होंने “हिंदुस्तानी संगीत पद्धति”, “किंकर्तव्य विमूढ़” तथा चार भागों में “हिंदुस्तानी संगीत के चार भाग” जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ लिखीं।
उन्होंने लखनऊ में मराठा संगीत विद्यालय और बाद में मॉरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूज़िक (वर्तमान भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संगीत साधक और दूरदर्शी सुधारक

भातखंडे जी का मानना था कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि यह आत्मा को उच्चतर स्तर पर ले जाने वाला आध्यात्मिक मार्ग है। उन्होंने संगीत को लिपिबद्ध करने की एक स्पष्ट पद्धति विकसित की, जिससे रागों का संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों तक उनका सही स्वरूप पहुँचना संभव हुआ।

निधन और विरासत

१९ सितंबर १९३६ को उनका देहांत हुआ, लेकिन उनका कार्य और विचार आज भी जीवित हैं। पंडित भातखंडे जी ने जो ठोस नींव रखी, उस पर आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा और शोध आधारित है।

उनकी जयंती के अवसर पर हम सभी को उनके योगदान को याद करते हुए यह संकल्प लेना चाहिए कि भारतीय संगीत की परंपरा और पवित्रता को बनाए रखते हुए उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।

सौजन्य:
*नरेश कुमार अग्रवाल*