“गया, बिहार का वह शहर, जहाँ इतिहास की धड़कन हर कोने में महसूस होती है। तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा और फाल्गु नदी के किनारे बसा यह शहर न सिर्फ पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल है, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह वही जगह है जहाँ भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। और यहाँ के विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर में वह स्थान है, जहाँ माना जाता है कि भगवान विष्णु ने राक्षस गयासुर का वध कर उसे धरती के नीचे दबा दिया था। यही वो जगह है जहाँ आज भी लोग अपने पितरों को जल और पिंड अर्पित करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके।
मुकुंद, जो अब 60 साल के हो चुके हैं, आज अपने बेटे सुशील और पत्नी विजयलक्ष्मी के साथ इसी विष्णुपद मंदिर में खड़े हैं। उनकी आंखों में आँसू हैं, पर साथ ही संतोष भी है। वो अपने पितरों के लिए पिंडदान कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके पूर्वजों ने अपने पितरों के लिए किया था।
यह पितृपक्ष का समय है, और मुकुंद की आँखों में पुरानी यादें ताज़ा हो गई हैं। उनकी ज़िंदगी का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जब मुकुंद सिर्फ पांच साल के थे, तब 1969 के कुंभ मेले में वह अपने माता-पिता से बिछड़ गए थे। उनकी मां, भैरवी, और पिता, सत्यनारायण, जो उन्हें बड़ी मुश्किलों के बाद भगवान से आशीर्वाद के रूप में पाए थे, कुंभ मेले की भीड़ में अपने इकलौते बेटे को खो बैठे थे।
मुकुंद स्टेशन पर भटकते-भटकते एक ट्रेन में बैठ गए और इलाहाबाद से गया पहुँच गए। वहीं पर उनकी मुलाकात आनंदमई नाम के एक बौद्ध भिक्षु से हुई, जिन्होंने मुकुंद की मासूमियत में उसकी बेबस हालत को पहचान लिया। मुकुंद को अपने साथ लेकर वह गया आ गए, जहाँ उन्होंने उसे तीन साल तक अपने आश्रम में रखा।
उधर, मुकुंद के माता-पिता और उनके मामा-मामी (कुंदन और मीरा) के लिए जीवन जैसे ठहर सा गया था। काशी में रहने वाले मुकुंद के दादा-दादी (हरेराम जी और शकुंतला जी) और सुल्तानपुर के नाना-नानी सब बेहद दुखी थे। पूरे परिवार ने हर मंदिर में प्रार्थनाएँ कीं, लेकिन मुकुंद का कोई पता नहीं चल सका।
1972 की बात है, जब मुकुंद के मामा-मामी अपने पूर्वजों को पिंडदान देने गया आए थे। वे विष्णुपद मंदिर के दर्शन करने के बाद बोधगया गए, जहाँ बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्होंने एक बच्चा देखा। यह बच्चा कोई और नहीं बल्कि मुकुंद था। अपने खोए हुए भांजे को देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने मुकुंद को तुरंत पहचान लिया और उसे अपने साथ घर ले गए। ऐसा लगा मानो उनके पूर्वजों का आशीर्वाद फिर से उनके साथ हो।
उस दिन के बाद से मुकुंद का जीवन फिर से पटरी पर आ गया। 1983 में उन्होंने IIT बॉम्बे में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया। उनके मां-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी सब बेहद खुश थे। मुकुंद का सपना सच हो रहा था, और 1987 में उनका Microsoft में कैंपस सिलेक्शन हुआ। फिर मुकुंद अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने अपने जीवन की एक नई शुरुआत की।
1994 में उनकी शादी विजयलक्ष्मी से हुई, और दो साल बाद, 1996 में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने सुशील रखा। पर 1998 मुकुंद के लिए एक कठिन साल साबित हुआ। उसी साल उनके नाना-नानी का देहांत हो गया, और कुछ महीनों बाद उनके दादा-दादी भी उन्हें छोड़कर चले गए। मुकुंद के जीवन में शोक की घड़ी आ गई थी।
इसके बाद मुकुंद ने अपने करियर पर ध्यान केंद्रित किया और 2010 तक वे अमेरिका में एक प्रतिष्ठित नाम बन गए। उनका बेटा सुशील 2016 में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और आज वह भी एक सफल व्यक्ति बन चुका है। पर मुकुंद के लिए असली धक्का तब लगा जब 2019 में कोविड-19 महामारी के पहले चरण में उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई। और फिर दूसरे चरण में उनके मामा-मामी भी उन्हें छोड़कर चले गए।
आज, 2024 में, मुकुंद सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वह अपने बेटे और पत्नी के साथ गया में खड़े हैं, अपने पितरों को पिंडदान कर रहे हैं। उनके मन में अतीत की तमाम यादें उभर आई हैं। वह अपने बेटे को अपनी पूरी कहानी सुना रहे हैं, और सुशील ध्यान से सुन रहा है। मुकुंद उसे समझा रहे हैं कि हमारे जीवन का हर कण, हर संस्कार हमारे पूर्वजों की मेहनत, प्यार और आशीर्वाद से बना है।
विष्णुपद मंदिर के पवित्र स्थल पर खड़े मुकुंद के दिल में अपने पितरों के प्रति गहरा आदर और कृतज्ञता का भाव है। वह जान चुके हैं कि उनके जीवन की हर मुश्किल, हर चुनौती को उन्होंने अपने पितरों के आशीर्वाद से पार किया है। चाहे वह बौद्ध भिक्षु से मिला उनका सहारा हो या फिर उनके मामा-मामी का उन्हें ढूंढ़ लेना, हर जगह उन्हें अपने पितरों का हाथ महसूस होता है।
आज, इस पितृपक्ष के अवसर पर, मुकुंद और उनका परिवार अपने पितरों के प्रति आभार प्रकट कर रहे हैं। वह जानते हैं कि उनके पूर्वजों ने जो बलिदान और त्याग किया, उसी से उनका जीवन आज यहाँ तक पहुँचा है। सुशील भी यह समझ चुका है कि परिवार, संस्कार और पूर्वजों का महत्व हमारे जीवन में कितना बड़ा होता है।
इस प्रकार, पितृपक्ष सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति हमारी कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। जो हम आज हैं, वह उन्हीं की वजह से हैं। उनके बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है, और उनके आशीर्वाद के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।”
*पितरों को नमन, कृतज्ञता और आशीर्वाद!*
*✍️ “सुशील कुमार सुमन”*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर










