1915 की एक भोर।
भुवनेश्वर की सुबह हमेशा की तरह मंदिरों की घंटियों से जागी। हवा में अगरबत्ती, धूप और फूलों की मिली-जुली गंध तैर रही थी। गलियों में गेरुए वस्त्रों में पुजारी, सफ़ेद धोती-कुर्ते में व्यापारी और सिर झुकाए साधारण लोग—सब अपने-अपने ईश्वर और अपनी-अपनी रीति से बँधे हुए थे। बाहर से यह नगर जितना पवित्र दिखता था, भीतर उतना ही कठोर और निर्मम था। यहाँ पत्थरों के देवालय जितने पुराने थे, सामाजिक नियम उससे भी ज़्यादा जड़ थे। अस्पृश्यता कोई शब्द नहीं थी—वह जीवन की दिनचर्या थी।
इसी नगर में जुगल किशोर आए थे। वे इस शहर के लिए अजनबी नहीं थे, लेकिन अपने भी नहीं थे। आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी विज्ञान और मनुष्य की समानता में आस्था रखने वाले जुगल किशोर जहाँ जाते, वहाँ किसी न किसी व्यवस्था से टकराव अवश्य होता। उनके लिए मनुष्य पहले था, जाति बाद में; पर भुवनेश्वर में जाति ही मनुष्य की पहचान थी।
सूर्य की पहली किरणें लिंगराज मंदिर के ऊँचे शिखर से टकरा रही थीं। मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतारें थीं—कोई दूध लिए, कोई फूल, कोई नंगे पाँव तपती ज़मीन पर खड़ा। गर्भगृह में शिवलिंग पर जलाभिषेक चल रहा था। मंदिर की वही पुरानी घंटे-जैसी विशाल घंटी—जो कभी जुगल किशोर के पूर्वजों ने अर्पित की थी—आज भी पूरे नगर को जगा रही थी। उसकी गूँज यह तो कहती थी कि यह नगर आस्था का है, पर यह नहीं बताती थी कि यह आस्था सबके लिए है या केवल कुछ के लिए।
मंदिर से कुछ दूर, उसी पहाड़ी के पार, सूर्य की किरणों में चमकता हुआ कोणार्क सूर्य मंदिर दूर से दिखाई देता था। वहीं एक विचित्र स्त्री प्रतिदिन नाचती दिखाई देती—बिखरे बाल, गीला शरीर, देह पर चमकीला लाल कुमकुम, हाथ में सिंगारा। लोग उसे बिमला कहते थे। किसी के लिए वह पागल थी, किसी के लिए देवी का अंश। वास्तव में वह समाज की आँखों के सामने खड़ा एक प्रश्नचिन्ह थी।
उस सुबह जुगल किशोर किसी साधारण उद्देश्य से नहीं आए थे। उनके साथ पाँच लोग थे—
दुखीबंधु, भगीरथी, शिबा नायक, कृष्णा माझी और गोविंद दास।
ये वे लोग थे जिन्हें नगर “अछूत” कहता था। वे खेतों में काम करते, नालियाँ साफ़ करते, अमीरों के घरों में मजदूरी करते—लेकिन इस मंदिर की देहरी उनके लिए सदियों से वर्जित थी।
जुगल किशोर ने दृढ़ स्वर में कहा,
“आज ये मेरे साथ भगवान के सामने जाएँगे। अगर ईश्वर सबका है, तो यह मंदिर भी सबका है।”
उनके मित्र श्रीधरन पहले से मंदिर प्रांगण में मौजूद थे। तमिल ब्राह्मण परिवार में जन्मे श्रीधरन आस्था से ज़्यादा तर्क में विश्वास करते थे। गणित और खगोलशास्त्र उनके जीवन का आधार था। ग्रहों की चाल वे पारंपरिक पंचांग से नहीं, पश्चिमी गणनाओं से देखते थे। इसी कारण नगर के मठाधीपति ने कभी उन्हें बहिष्कृत कर दिया था। बाद में उन्होंने संस्कृत के व्यंग्य-श्लोकों से उस मठाधीपति की तीखी आलोचना की थी। वे अकसर यह कथा जुगल किशोर को बड़े रस के साथ सुनाते थे।
विडंबना यह थी कि श्रीधरन का ही चचेरा भाई, श्रीनिवास, लिंगराज मंदिर का मुख्य पुजारी था—नगर का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति। इसी बात की जलन कहीं न कहीं श्रीधरन के भीतर धधकती रहती थी।
उधर, श्रीनिवास भीतर से विचलित था। उसे सूचना मिल चुकी थी कि जुगल किशोर “अछूतों” को मंदिर में प्रवेश दिलाने वाले हैं। यह केवल धर्म का प्रश्न नहीं था, सत्ता का प्रश्न था। मंदिर का नियंत्रण समाज का नियंत्रण था। यदि यह नियम टूट गया, तो सदियों पुरा ढाँचा हिल जाएगा। उसके हाथ में पूजा की थाली काँप रही थी, पर चेहरा कठोर बना हुआ था।
जुगल किशोर जैसे ही मंदिर के द्वार तक पहुँचे, पाँचों सहमे हुए लोग पत्थर की उस देहरी को देखने लगे, जिसे उन्होंने कभी भीतर से नहीं देखा था। उनके मन में देवता का भय नहीं था, समाज का भय था। जुगल किशोर ने धीरे से कहा,
“डरो मत। अगर आज हम न गए, तो यह दरवाज़ा हमेशा बंद रहेगा।”
भीड़ में खुसर-पुसर शुरू हो गई।
“धर्म का अपमान है!”
“कलियुग आ गया!”
“अरे वही पागल जुगल है!”
श्रीनिवास मंदिर से बाहर आए।
“आप यह क्या कर रहे हैं, जुगल बाबू?”
“धर्म की मर्यादा मनुष्य से ऊँची नहीं होती, श्रीनिवास,” जुगल किशोर ने शांत स्वर में कहा।
“नियम टूटा तो अनर्थ होगा।”
“अनर्थ तो सदियों से इनके जीवन में हो रहा है,” जुगल किशोर का उत्तर अडिग था।
भीड़ उबल पड़ी। पीछे से किसी ने पत्थर फेंका। वह शिबा नायक के कंधे पर लगा। खून की धार बह चली। उसी क्षण भीड़ बेकाबू हो गई। गालियाँ, लाठियाँ, धक्के—सब कुछ एक साथ टूट पड़ा। जुगल किशोर सबके बीच खड़े होकर रोकने की कोशिश करते रहे, पर उन्माद विवेक को निगल चुका था।
उसी क्षण मंदिर की घंटी ज़ोर से बज उठी। उसकी गूँज पूरे नगर में फैल गई—मानो चेतावनी बनकर।
उधर पहाड़ी पर बिमला उन्मत्त हो उठी। वह तेज़ी से नाचती हुई घाटी की ओर बढ़ी—मानो अदृश्य तूफान को रोकने जा रही हो। उसके पैरों से उठती धूल और आँखों की आग किसी अनिष्ट का संकेत दे रही थी।
हिंसा में शिबा नायक ज़मीन पर गिर पड़ा। भीड़ ने उसे इतना पीटा कि वह बेहोश हो गया। जुगल किशोर घबराकर उसके पास झुके—उन्हें लगा जैसे उनके हाथों में केवल एक घायल शरीर नहीं, बल्कि सदियों का उत्पीड़न तड़प रहा है। तभी पुलिस की सायरन गूँजी। भीड़ छँटी, पर ज़हर हवा में घुल चुका था।
रात तक पूरे नगर में खबर फैल गई—“मंदिर अपवित्र करने की कोशिश।”
कुछ अख़बारों ने इसे “धर्म पर आक्रमण” कहा, कुछ ने “मानवता की लड़ाई।”
श्रीधरन ने जुगल किशोर को अपने घर में शरण दी और खोखली हँसी के साथ कहा,
“देखा, मैंने कहा था न—ईश्वर नहीं, केवल भय और सत्ता है।”
पर वे जानते थे, यह केवल शुरुआत है।
अगली सुबह बिमला नगर के बीचों-बीच नाचती हुई पहुँची। उसने मंदिर की ओर देखकर ऊँचे स्वर में पुकारा—
“शुद्ध कौन? छूने योग्य कौन?”
लोग हँसे, किसी ने पत्थर फेंका, पर वह रुकी नहीं। वह मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँची और नाचते-नाचते गिर पड़ी। उसके शरीर से बहता खून सीढ़ियों पर फैल गया—कुमकुम से भी गहरा लाल।
उसी समय ज़िला अस्पताल में शिबा नायक दम तोड़ रहा था। उसकी पोती जॉली नायक उसके पास बैठी थी—सूनी आँखें, सूना चेहरा।
उसने धीरे से पूछा,
“दादू, क्या भगवान हमें नहीं देखता?”
शिबा के होंठ हिले, पर उत्तर शब्दों में नहीं उतरा।
इस मृत्यु का असर नगर पर पड़ा, पर धीरे-धीरे वह भी एक खबर, फिर एक अफ़वाह बन गई। केवल जुगल किशोर के भीतर यह मृत्यु एक जलता हुआ प्रश्न बन गई—क्या उनका प्रयास सही था? क्या पाँच लोगों को मंदिर तक लाना इतना बड़ा अपराध था कि एक जीवन बुझ गया?
श्रीनिवास भी रातों को सो नहीं पा रहा था। भीतर उसे अपनी कठोरता का भय सताने लगा था, पर उसका पद, उसका वंश उसे स्वीकारोक्ति से रोकता रहा।
एक शाम श्रीधरन और श्रीनिवास आमने-सामने आए।
श्रीधरन बोले,
“तुम ईश्वर के सेवक हो, पर एक बूढ़े को मरवा दिया।”
श्रीनिवास क्रुद्ध हो उठा,
“यह सब तुम्हारे मित्र के कारण हुआ!”
“नहीं,” श्रीधरन ने शांत होकर कहा,
“यह मानवता के कारण हुआ।”
नगर दो धड़ों में बँट गया—परंपरा और परिवर्तन में।
जुगल किशोर पर मुकदमा चला। अदालत में एक ही प्रश्न गूँजता रहा—कौन शुद्ध है, कौन अछूत?
कानून ने कहा—सब समान हैं।
भीड़ ने कहा—नहीं।
फैसले के दिन बिमला अंतिम बार प्रकट हुई। अदालत के सामने उसने ओडिसी नृत्य किया—उसके हर अंग में पीड़ा, क्रोध और सदियों का बोझ था। नृत्य समाप्त होते ही वह गिर पड़ी। अंतिम शब्द थे—
“शुद्धता मन में होती है, हाथों में नहीं।”
अदालत ने जुगल किशोर को निर्दोष ठहराया।
श्रीनिवास ने उसी रात अपना पद छोड़ दिया।
मुकुट बिना सिर के मंदिर की सीढ़ियाँ उतरीं।
लिंगराज मंदिर की घंटी आज भी बजती है।
कोणार्क आज भी सूर्य का स्वागत करता है।
भुवनेश्वर आज भी श्रद्धा का नगर है—
पर हर उस ध्वनि के बीच अब भी एक प्रश्न गूँजता है—
जीवन में वास्तव में शुद्ध कौन है?
और क्या ईश्वर ने कभी मनुष्य को जातियों में बाँटा था,
या यह बाँट सदा मनुष्य ने ही की है?
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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*#युवा*










