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10 साल का संघर्ष, 4 बार असफलता, फिर बना ‘Actuary’ माँ के विश्वास और हौसले ने लिखी सफलता की नई कहानी

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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10 साल का संघर्ष, 4 बार असफलता, फिर बना ‘Actuary’ माँ के विश्वास और हौसले ने लिखी सफलता की नई कहानी

सेंट जेवियर्स कॉलेज से बी.कॉम की पढ़ाई के साथ शुरू हुआ सफर, नौकरी और कठिन परीक्षाओं के बीच संतुलन बनाते हुए आखिरकार डेलॉयट USI में एक्चुअरी बनने का सपना हुआ साकार।

कुल्टी , कुछ सपने ऐसे होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिए केवल प्रतिभा ही नहीं, बल्कि वर्षों का धैर्य, अनुशासन और अटूट हौसला भी चाहिए होता है। एक्चुअरी (Actuary) बनना भी ऐसा ही सपना है, जिसे दुनिया के सबसे कठिन पेशेवर कोर्सों में गिना जाता है। इस कठिन राह पर चलकर आसनसोल नियामतपुर की रहने वाली रेणुका बंसल ने पूरे 10 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद आखिरकार अपने नाम के आगे ‘Actuary’ जोड़ने का गौरव हासिल कर लिया है। यह सिर्फ एक डिग्री या प्रोफेशनल उपलब्धि नहीं, बल्कि लगातार असफलताओं से लड़ते हुए सफलता तक पहुंचने की प्रेरणादायक कहानी है।
इस सफर की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई, जब रेणुका ने कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स कॉलेज में बी.कॉम की पढ़ाई शुरू की। इसी दौरान उन्होंने एक्चुअरी बनने का निर्णय लिया। उस समय शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यह यात्रा पूरे 10 वर्षों तक चलेगी और हर मोड़ पर नई चुनौतियां उनका इंतजार करेंगी।
कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी की जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। एक ओर ऑफिस का दबाव था तो दूसरी ओर दुनिया की सबसे कठिन पेशेवर परीक्षाओं में शामिल एक्चुअरियल एग्जाम की तैयारी। दिनभर काम करने के बाद देर रात तक पढ़ाई करना उनकी दिनचर्या बन गई। कई बार ऐसा लगा कि सब कुछ छोड़ देना चाहिए, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया।
एक्चुअरी बनने की राह में कई परीक्षाएं पास करनी होती हैं और हर परीक्षा उम्मीदवार के धैर्य की परीक्षा लेती है। इस दौरान उन्हें कई बार असफलता का सामना भी करना पड़ा। हर असफलता के बाद फिर से किताबों के बीच लौटना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी तैयारी को और मजबूत किया।
उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा तब आई, जब वह अपने अंतिम मुकाम पर थीं। लाइफ इंश्योरेंस स्पेशलाइजेशन का आखिरी फेलोशिप पेपर उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया। यह सिर्फ एक पेपर था, लेकिन इसी एक पेपर ने उन्हें लगभग दो वर्षों तक रोककर रखा। लगातार चार प्रयासों के बाद आखिरकार उन्होंने इस परीक्षा को पास किया।
वह दौर मानसिक रूप से बेहद कठिन था। बार-बार प्रयास करना, हर बार उम्मीदों के साथ परिणाम का इंतजार करना और असफलता मिलने पर खुद को संभालना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। लेकिन उन्होंने अपने आत्मविश्वास को टूटने नहीं दिया।
जब अंतिम परिणाम आया और उनके नाम के साथ आधिकारिक रूप से ‘Actuary’ शब्द जुड़ा, तब वर्षों का संघर्ष एक पल में आंखों के सामने घूम गया। खुशी के आंसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि 10 साल की मेहनत आखिरकार रंग लाई है। यह केवल परीक्षा पास करने की खुशी नहीं थी, बल्कि उन अनगिनत रातों, त्याग, संघर्ष और धैर्य की जीत थी।
इस पूरी यात्रा में उनके परिवार ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से उनकी मां अनीता बंसल, पिता घनश्याम बंसल हर मुश्किल समय में उनके साथ मजबूती से खड़े रहे। जब भी किसी परीक्षा में सफलता नहीं मिली और निराशा ने घेर लिया, तब उनकी मां और पिता ने उनका हौसला बढ़ाया। कई बार दोनों ने साथ बैठकर आंसू भी बहाए, लेकिन रेणुका के मां और पिता का अपनी बेटी पर अटूट विश्वास कभी कम नहीं हुआ।
रेणुका का कहना है कि अगर उनकी मां और पिता का साथ और उनका भरोसा नहीं होता, तो शायद वह इस मुकाम तक कभी नहीं पहुंच पातीं। उनकी सफलता के पीछे परिवार का त्याग, समर्थन और विश्वास सबसे बड़ी ताकत रहा।
आज 10 वर्षों की इस कठिन यात्रा के बाद वह डेलॉयट यूएसआई (Deloitte USI) में कार्यरत हैं, जहां वह एक अमेरिकी क्लाइंट के लिए मॉडलिंग डोमेन में काम कर रही हैं। इस भूमिका में उन्हें रिस्क मैनेजमेंट और फाइनेंस को वैश्विक नजरिए से समझने और उस पर काम करने का अवसर मिल रहा है।
उनका मानना है कि एक्चुअरी बनने के बाद जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अब वह अपने अनुभव और विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए करियर में नई ऊंचाइयों को छूना चाहती हैं। भविष्य में वह विदेशों में बेहतर अवसरों की तलाश कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की योजना भी रखती हैं।
उनकी यह कहानी उन हजारों छात्रों और युवा पेशेवरों के लिए प्रेरणा है, जो किसी कठिन लक्ष्य की तैयारी कर रहे हैं और बीच रास्ते में असफलताओं से निराश हो जाते हैं। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि मंजिल तक पहुंचने में समय लग सकता है, लेकिन अगर मेहनत, धैर्य और परिवार का साथ बना रहे तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता।
10 वर्षों का यह संघर्ष आज सफलता की मिसाल बन चुका है। यह कहानी बताती है कि जीत हमेशा उसी की होती है, जो हर असफलता के बाद फिर से उठकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का साहस रखता है।

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