“१६०४ का पावन दिन,
२ सितम्बर का उजियारा,
मानवता को मिला खजाना,
ज्ञान, भक्ति और सहारा।
श्री आदि ग्रंथ का पहला प्रकाश,
हर हृदय में फैली ज्योति,
गुरु अर्जुन देव जी ने रचाया,
प्रेम, शांति की सच्ची मोटी।
रागों में बसा संदेश ईश्वर का,
सिखाया सच्चे जीवन का सार,
न कोई बड़ा, न कोई छोटा,
सबमें बसा है एक ही सरकार।
यह केवल पुस्तक नहीं,
ईश्वर का सीधा उपदेश,
हर शब्द बना मार्गदर्शक,
हर अक्षर बना स्नेह का देश।
फिर समय आया गुरु गोबिंद सिंह का,
जिन्होंने दी अनंत वाणी को मूरत,
गुरु की गद्दी सौंपी सदा-सदा के लिए,
बना दिया ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ अमर ज्योत।
अब न कोई देहधारी गुरु,
न कोई सीमित प्रकाश,
गुरु ग्रंथ साहिब ही है
हमारा शाश्वत आकाश।
सिखाता प्रेम, समभाव,
सेवा और त्याग का गीत,
हर युग, हर मनुष्य के लिए,
लाता है सच्चा प्रीत।
आज भी जब मन डगमगाता है,
ग्रंथ का शब्द हमें सम्भालता है,
अंधकार मिटाकर जीवन में,
सच्चा गुरमत मार्ग दिखलाता है।
धन है वह दिन, धन वह क्षण,
जब ग्रंथ का प्रकाश हुआ,
धन गुरु ग्रंथ साहिब जी,
जिनसे मानव का उद्धार हुआ।”
🌸🌿🙏
*✍️ “सुशील कुमार सुमन”*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर










