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*”विश्वकर्मा पूजा की रात: उम्र के उस पार”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*”विश्वकर्मा पूजा की रात: उम्र के उस पार”*
✍️ सुशील कुमार सुमन
*”कर्म ही पूजा है!..”*

बर्नपुर की वह सुबह कुछ अलग थी।
IISCO Steel Plant की ऊँची चिमनियों से उठता धुआँ आसमान में अपनी लकीरें खींच रहा था। प्लांट की विशाल मशीनें अपनी रोज़मर्रा की धड़कनों के साथ चल रही थीं, लेकिन आज उनके बीच एक अलग ही उत्साह था।
हर तरफ सफाई हो रही थी।
वर्कशॉप में मशीनों पर फूलों की मालाएँ सज रही थीं। विद्युत पैनलों के सामने रंगोली बनाई जा रही थी। क्रेन के केबिन पर गेंदे के फूल झूल रहे थे और फर्नेस की लाल चमक के बीच विश्वकर्मा भगवान की प्रतिमा के सामने दीप जलाए जा रहे थे।
आज विश्वकर्मा पूजा थी।

बर्नपुर की औद्योगिक संस्कृति का वह दिन, जब मशीनों को केवल लोहे और इस्पात की वस्तु नहीं, बल्कि हजारों लोगों की मेहनत और जीवन के साथी के रूप में देखा जाता था।
इसी माहौल में रहता था अरुण सेन।
उम्र लगभग चालीस वर्ष।
प्लांट में वह एक अनुभवी इंजीनियर था। वर्षों की नौकरी ने उसे बहुत कुछ दिया था—सम्मान, आर्थिक स्थिरता, एक अच्छा घर और समाज में पहचान।
लेकिन एक चीज उससे धीरे-धीरे छीन ली थी—
उसकी अपनी स्वतंत्रता।

अरुण अक्सर सोचता—
“क्या इंसान सचमुच स्वतंत्र होता है?”
सुबह से शाम तक ड्यूटी।
फिर घर।
फिर परिवार की जिम्मेदारियाँ।
फिर समाज की अपेक्षाएँ।
फिर भविष्य की चिंता।
और अगले दिन वही चक्र।
उसे लगता था जैसे उसकी जिंदगी भी प्लांट की किसी विशाल मशीन की तरह है—लगातार चलती हुई, मगर अपनी दिशा स्वयं तय करने में असमर्थ।

विश्वकर्मा पूजा की पूर्व संध्या
उस शाम अरुण प्लांट से निकलकर Burnpur Township की सड़कों पर धीरे-धीरे चल रहा था।
सड़क के दोनों ओर पूजा की तैयारियाँ चल रही थीं।
बच्चे नई पोशाक में घूम रहे थे।
कहीं ढाक बज रहा था, कहीं लाउडस्पीकर पर भजन।
किसी वर्कशॉप के बाहर कर्मचारी मिलकर प्रसाद बना रहे थे।
अरुण मुस्कुराया।
उसे अपना बचपन याद आ गया।
तभी पीछे से आवाज आई—
“अरुण!”
वह मुड़ा।
सामने उसका पुराना मित्र विवेक घोष खड़ा था।
दोनों ने गले मिलकर अभिवादन किया।
विवेक ने हँसते हुए कहा—
“इतने गंभीर क्यों हो? आज तो विश्वकर्मा पूजा है।”

अरुण ने कहा,
“शायद मैं मशीनों के बीच इतना रह गया हूँ कि इंसानों को समझना भूल गया हूँ।”
विवेक हँसा।
“मशीनों को समझना आसान है। खराबी कहाँ है, पता चल जाता है। इंसान में खराबी कहाँ है, यह पता करना मुश्किल है।”
दोनों कुछ देर चुप रहे।
फिर विवेक ने पूछा—
“तुम्हारी शादी की बात आगे बढ़ी?”
अरुण ने सिर झुका लिया।
“यही तो समस्या है।”
“कौन-सी?”
“मैं किसी को दुखी नहीं करना चाहता। लेकिन अपनी जिंदगी भी किसी और के निर्णय से नहीं जीना चाहता।”
विवेक ने उसकी तरफ देखा।
“यानी तुम प्रेम भी चाहते हो और स्वतंत्रता भी?”

अरुण मुस्कुराया।
“शायद मैं दोनों चाहता हूँ।”
विवेक ने कहा—
“तब तुम्हें यह समझना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं है।”
यह वाक्य अरुण के मन में कहीं गहराई तक उतर गया।

नीलिमा
अरुण के जीवन में नीलिमा राय थी।
वह प्लांट की मेडिकल यूनिट से जुड़ी एक संवेदनशील और आत्मनिर्भर महिला थी।
दोनों के बीच कई वर्षों से गहरा संबंध था।
लेकिन उनका रिश्ता कभी विवाह तक नहीं पहुँच पाया।
कारण प्रेम की कमी नहीं थी।
कारण था—
भविष्य का डर।
नीलिमा चाहती थी कि अरुण कोई स्पष्ट निर्णय ले।
अरुण हर बार कहता—
“थोड़ा समय और दो।”
समय गुजरता गया।
एक दिन नीलिमा ने कहा—
“अरुण, तुम्हें किस चीज का इंतजार है?”
“सही समय का।”
“और सही समय कब आएगा?”
अरुण चुप रहा।
नीलिमा ने धीरे से कहा—
“शायद तुम सही समय का इंतजार नहीं कर रहे। तुम निर्णय लेने से बच रहे हो।”
अरुण को यह बात चुभ गई।
लेकिन वह जवाब नहीं दे सका।

एक और जिंदगी
अरुण के मन में एक दूसरी दुनिया भी थी।
वह लेखन करना चाहता था।
कहानियाँ लिखना चाहता था।
बर्नपुर की जिंदगी, मजदूरों की मेहनत, इस्पात की आग, मशीनों की आवाज, इंसानों के सपने—सब कुछ शब्दों में उतारना चाहता था।
लेकिन उसे डर था—
अगर उसने नौकरी छोड़ दी तो?
अगर लेखन असफल हो गया तो?
अगर परिवार ने उसे गलत समझा तो?
अगर समाज ने कहा कि इतने अच्छे पद को छोड़कर पागल हो गया?
उसका मन कहता—
“अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो।”
दिमाग कहता—
“जिम्मेदार बनो।”
और वह इन दोनों के बीच फँस गया था।

विश्वकर्मा पूजा
अगले दिन सुबह IISCO Steel Plant में विश्वकर्मा पूजा शुरू हुई।
पूरे प्लांट में उत्सव का वातावरण था।
विशाल मशीनों के सामने पूजा की थालियाँ रखी थीं।
इलेक्ट्रिकल सेक्शन में पैनलों पर फूल चढ़ाए गए।
मैकेनिकल वर्कशॉप में कर्मचारियों ने भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा के सामने प्रार्थना की।
अरुण भी पूजा में शामिल हुआ।
पंडित जी ने कहा—
“भगवान विश्वकर्मा हमें सृजन की शक्ति दें। हमारे हाथों को कुशलता दें और हमारे कर्म को अर्थ दें।”
अरुण ने आँखें बंद कर लीं।
उसके मन में एक प्रश्न उठा—
“अगर विश्वकर्मा सृष्टि के निर्माता हैं, तो मनुष्य को अपनी जिंदगी बनाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं होनी चाहिए?”
फिर दूसरा विचार आया—
“लेकिन अगर मैं अपनी जिंदगी बनाता हूँ, तो उसकी जिम्मेदारी भी मेरी ही होगी।”
उसे अचानक अपने भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस हुआ।

आग और इस्पात
पूजा के बाद अरुण अकेला प्लांट के एक शांत हिस्से की ओर चला गया।
दूर से फर्नेस की लाल चमक दिखाई दे रही थी।
पिघला हुआ लोहा आग की नदी जैसा बह रहा था।
अरुण देर तक उसे देखता रहा।
उसे लगा—
इस्पात बनने के लिए लोहे को आग से गुजरना पड़ता है।
शायद इंसान को भी अपने निर्णयों की आग से गुजरना पड़ता है।
उसी समय विवेक वहाँ आ गया।
“यहाँ क्या कर रहे हो?”
अरुण ने कहा—
“सोच रहा हूँ कि जिंदगी में सबसे कठिन चीज क्या है।”
“क्या?”
“अपनी जिंदगी का निर्णय खुद लेना।”
विवेक ने कहा—
“और उससे भी कठिन?”
अरुण ने उसकी ओर देखा।
विवेक बोला—
“अपने निर्णय की जिम्मेदारी खुद लेना।”
अरुण ने पहली बार बिना झिझक कहा—
“शायद यही स्वतंत्रता है।”

निर्णय
उस शाम अरुण नीलिमा से मिलने गया।
नीलिमा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
अरुण ने कहा—
“मैंने निर्णय लिया है।”
नीलिमा शांत रही।
“क्या?”
अरुण ने कहा—
“मैं अपनी जिंदगी डर के आधार पर नहीं जीऊँगा।”
“और?”
“मैं तुम्हें कोई झूठा वादा नहीं करूँगा। मैं तुम्हारे साथ जीवन बिताना चाहता हूँ, लेकिन यह निर्णय तुम्हें भी स्वतंत्र होकर लेना होगा।”
नीलिमा कुछ देर उसे देखती रही।
फिर बोली—
“आज पहली बार तुमने मुझसे यह नहीं कहा कि ‘थोड़ा समय और दो’।”
अरुण मुस्कुराया।
“क्योंकि मुझे समझ आ गया है कि समय कभी निर्णय नहीं लेता। इंसान को ही लेना पड़ता है।”
नीलिमा ने धीरे से पूछा—
“और तुम्हारा लेखन?”
अरुण ने कहा—
“उसे भी शुरू करूँगा। नौकरी छोड़कर नहीं। भागकर नहीं। पहले अपनी जिम्मेदारियाँ निभाऊँगा और फिर अपने सपने को समय दूँगा।”
नीलिमा मुस्कुराई।
“अब तुम पहले वाले अरुण नहीं लग रहे।”

विश्वकर्मा की सीख
रात को अरुण अपने घर की बालकनी में खड़ा था।
दूर IISCO Steel Plant की रोशनी दिखाई दे रही थी।
कहीं मशीनें चल रही थीं।
कहीं शिफ्ट बदल रही थी।
कहीं कर्मचारी घर लौट रहे थे।
आसमान में विश्वकर्मा पूजा की आतिशबाजी चमक रही थी।
अरुण ने मन ही मन कहा—
“हम मशीनें बनाते हैं, लेकिन अंततः मशीनें ही हमें बनाना शुरू कर देती हैं।”
“हम घर बनाते हैं, लेकिन कभी-कभी घर की दीवारें हमारे निर्णयों को कैद कर देती हैं।”
“हम समाज बनाते हैं, लेकिन फिर उसी समाज की अपेक्षाएँ हमें बाँधने लगती हैं।”
फिर उसे अपनी आज की समझ याद आई—
स्वतंत्रता का अर्थ बंधनों से भागना नहीं है।
स्वतंत्रता का अर्थ है—अपने चुनाव को स्वीकार करना और उसके परिणाम की जिम्मेदारी उठाना।
विश्वकर्मा पूजा केवल मशीनों की पूजा नहीं थी।
वह सृजन की पूजा थी।
और उस रात अरुण ने पहली बार समझा—
मनुष्य भी अपने जीवन का विश्वकर्मा है।

वह अपने जीवन की दिशा चुन सकता है।
लेकिन जिस क्षण वह दिशा चुनता है, उसी क्षण उसके सामने जिम्मेदारी भी खड़ी हो जाती है।

एक नई सुबह
अगली सुबह Burnpur की हवा में फिर वही औद्योगिक गंध थी।
प्लांट की चिमनियाँ फिर धुआँ उगल रही थीं।
क्रेन चल रही थीं।
मशीनों की आवाज फिर गूँज रही थी।
लेकिन अरुण बदल चुका था।
उसने अपनी मेज पर एक खाली डायरी रखी।
पहले पन्ने पर उसने लिखा—

**”मेरी जिंदगी किसी और की लिखी हुई कहानी नहीं है।*
*लेकिन इसका अगला अध्याय लिखने की जिम्मेदारी भी मेरी ही है।”**
नीचे उसने तारीख लिखी—
विश्वकर्मा पूजा, बर्नपुर।
और उसके बाद पहला शब्द लिखा—
“आरंभ…”
बाहर प्लांट की मशीनें गर्जना कर रही थीं।
अंदर एक मनुष्य अपनी जिंदगी का नया निर्माण शुरू कर चुका था।
और शायद यही विश्वकर्मा पूजा का सबसे बड़ा संदेश था—
*”सृजन केवल लोहे और इस्पात का नहीं होता।*
*सबसे महान सृजन है—अपने जीवन को अर्थ देना।”*