*“मगर राम से मत लड़िए !…”*
(बंगाल, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम और जनभावनाओं का विस्फोट!..)
“आज *गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर* का जन्मदिवस है।
उस महामानव का, जिसने बंगाल ही नहीं, पूरे भारत ही नहीं, पूरे विश्व को यह सिखाया था कि प्रकृति, समाज और न्याय — तीनों का संतुलन ही सभ्यता की असली पहचान है।”
रवीन्द्रनाथ ठाकुर हमेशा “प्राकृतिक न्याय (Natural Justice)” की बात करते थे।
वे मानते थे कि जब समाज, व्यवस्था और सत्ता न्याय से भटक जाती है, तब भीतर दबा हुआ जनाक्रोश धीरे-धीरे एक *जनांदोलन* का रूप ले लेता है।
और जब जनता की भावनाएँ विस्फोट बन जाती हैं, तब केवल सरकारें नहीं बदलतीं — पूरा राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य बदल जाता है।
आज बंगाल की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं, उन्हें बहुत लोग उसी मनोविज्ञान से जोड़कर देख रहे हैं।
शपथ ग्रहण से पहले ही पश्चिम बंगाल की गलियों, गांवों और मोहल्लों में अचानक *“जय श्री राम”* की गूंज तेज हो गई।
लोग कहने लगे कि अटल बिहारी वाजपेयी का वर्षों पुराना कथन आज सच होता दिखाई दे रहा है—
*“बीजेपी से लड़ना है तो लड़िए… मगर राम से मत लड़िए।”*
उस समय शायद इन शब्दों की गहराई बहुत लोगों ने नहीं समझी थी।
लेकिन आज बंगाल में जो भावनात्मक उभार दिखाई दे रहा है, उसने इस वाक्य को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
यह केवल राजनीति का विषय नहीं रह गया।
यह पहचान, सम्मान और आस्था की बहस बन चुका है।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में
*कहीं बुजुर्ग महिलाएँ आँसू भरी आँखों से “जय श्री राम” बोलती दिखाई दीं,*
कहीं बच्चे कविताएँ गा रहे थे,
कहीं गांवों में महिलाएँ ढोल की थाप पर नृत्य करती नजर आईं।
लोगों का कहना था कि वर्षों तक उन्होंने अपनी धार्मिक अभिव्यक्ति को दबा हुआ महसूस किया।
कई लोगों के भीतर यह भावना जन्म लेने लगी कि क्या अपनी आस्था को खुलकर व्यक्त करना भी अपराध है?
यही कारण है कि चुनावी परिणामों के बाद बंगाल में जो दृश्य सामने आए, उन्हें कुछ लोग केवल राजनीतिक जीत नहीं, *बल्कि “भावनात्मक मुक्ति” के रूप में देख रहे हैं।*
लेकिन इसी कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एक वीडियो में “जय श्री राम” के नारे लगाते लोगों के बीच से एक मुस्लिम जनाज़ा गुजरता दिखाई दिया।
और अचानक पूरा जुलूस रुक गया।
किसी ने कहा—
*“पहले इन्हें जाने दो… किसी को कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए…””
यही भारत की आत्मा है।
यही वह बंगाल है, जिसकी कल्पना रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी —
“”जहाँ आस्था हो, लेकिन अहंकार न हो;*
जहाँ संस्कृति हो, लेकिन कटुता न हो;
जहाँ पहचान हो, लेकिन द्वेष न हो।”
“*राम* का अर्थ केवल शक्ति नहीं है।
राम मर्यादा हैं।
राम संतुलन हैं।
राम न्याय हैं।”
और शायद यही कारण है कि महात्मा गांधी ने भी हमेशा *“रामराज्य”* की बात करते थे।
“उनके लिए रामराज्य किसी धर्म विशेष का शासन नहीं था, बल्कि ऐसा समाज था *जहाँ अंतिम व्यक्ति को न्याय मिले*, भय समाप्त हो और सत्ता सेवा का माध्यम बने।”
आज बंगाल की राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, वहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह बदलाव समाज को *और अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित और शांतिपूर्ण बनाएगा?*
क्योंकि *प्रकृति हमेशा संतुलन* चाहती है।
*“अति सर्वत्र वर्जयेत्।”*
किसी भी चीज़ की अति — चाहे वह सत्ता का अहंकार हो, धार्मिक उन्माद हो, राजनीतिक प्रतिशोध हो या तुष्टिकरण — अंततः विनाश का कारण बनती है।
यदि किसी समाज की भावनाओं को लगातार दबाया जाए, तो प्रतिक्रिया अवश्य होती है।
लेकिन यदि प्रतिक्रिया भी संतुलन खो दे, तो वह *स्वयं विनाश* का कारण बन जाती है।
इसलिए आज आवश्यकता केवल विजय उत्सव की नहीं है।
आवश्यकता है *आत्ममंथन* की।
बंगाल ने हमेशा भारत को दिशा दी है —
*भक्ति भी दी, क्रांति भी दी, साहित्य भी दिया और राष्ट्रवाद भी।*
आज उसी बंगाल को फिर से यह तय करना है कि “जय श्री राम” केवल राजनीतिक नारा बनेगा, या मर्यादा, न्याय और सामाजिक समरसता का संदेश भी देगा।
*“यदि राम हैं, तो करुणा भी होनी चाहिए।*
यदि शक्ति है, तो संयम भी होना चाहिए।
यदि विजय है, तो विनम्रता भी होनी चाहिए।”
और शायद गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्मदिवस पर इससे बड़ा संदेश कोई नहीं हो सकता कि—
*न्याय को दबाइए मत,*
*आस्था का अपमान मत कीजिए,*
*लेकिन समाज को नफ़रत की आग में भी मत झोंकिए।*
क्योंकि जब जनता जागती है, तो इतिहास बदलता है।
और जब समाज संतुलन खो देता है, तो सब कुछ “स्वाहा” हो जाता है।
*“आप सभी को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ।”*
*“और बंगाल की नई लोकतांत्रिक यात्रा के लिए भी शुभकामनाएँ।”*
*राम हर युग में श्रेष्ठ हैं* —
क्योंकि वे केवल विजय नहीं, मर्यादा के प्रतीक हैं।
*🚩🚩जय श्री राम!..🚩🚩*
✍️ *सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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