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*और एक दिन इंसान मर गया!..*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*और एक दिन इंसान मर गया!..*

*भाग – 22 : जीवन का रहस्य*
✍️ लेखक : सुशील कुमार सुमन

*“जीवन का रहस्य यह नहीं कि मनुष्य कितना जीया;*
*रहस्य यह है कि उसके जीने से कितने जीवनों को अर्थ मिला।”*

प्रकाश का वह विशाल द्वार धीरे-धीरे खुला।
रामनारायण ने कुछ क्षण उस ओर देखा और फिर साहस जुटाकर भीतर कदम रख दिया।
अचानक उसे लगा, जैसे वह किसी ऐसे विराट संसार में प्रवेश कर गया हो जिसकी कल्पना उसने कभी अपने जीवन में नहीं की थी।
लेकिन यह संसार पृथ्वी जैसा नहीं था।
यहाँ न कोई शहर था, न गाँव।
न धन था, न बाजार।
न कोई ऊँच-नीच थी और न किसी प्रकार का भेदभाव।
चारों ओर अनगिनत प्रकाश-पथ फैले हुए थे।
हर रास्ता अलग दिशा में जा रहा था और प्रत्येक पथ के ऊपर प्रकाश से एक शब्द अंकित था—
प्रेम।
कर्तव्य।
सेवा।
सत्य।
त्याग।
क्षमा।
करुणा।
रामनारायण उन रास्तों को विस्मय से देखता रह गया।
उसने धीरे से पूछा—
“क्या हर मनुष्य के जीवन में इतने सारे रास्ते होते हैं?”

सत्यदूत मुस्कुराए।
“रास्ते अनेक होते हैं, रामनारायण… लेकिन मंज़िल अंततः एक ही होती है—अपने जीवन के अर्थ को पहचानना।”
रामनारायण ने फिर पूछा—
“तो फिर मनुष्य बार-बार रास्ता क्यों भटक जाता है?”
सत्यदूत कुछ क्षण मौन रहे।
फिर बोले—
“क्योंकि मनुष्य अपने जीवन को दूसरों के जीवन से मापने लगता है।”
“वह सोचता है—
उसके पास मुझसे अधिक धन क्यों है?”
“उसका घर मुझसे बड़ा क्यों है?”
“उसे मुझसे अधिक सम्मान क्यों मिला?”
“वह मुझसे आगे कैसे निकल गया?”
“इन्हीं प्रश्नों में उलझकर वह उस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न को भूल जाता है—”

सत्यदूत की आवाज़ गूँज उठी—
“मैं अपने जीवन के साथ क्या कर रहा हूँ?”
रामनारायण शांत हो गया।
उसके सामने पृथ्वी पर बिताए अपने वर्षों की तस्वीरें उभरने लगीं।
उसे याद आया—
कितनी बार उसने अपने जीवन की तुलना दूसरों से की थी।
कितनी बार किसी दूसरे की सफलता देखकर उसके भीतर बेचैनी पैदा हुई थी।
कितनी बार उसने अपनी उपलब्धियों को ही अपनी पहचान मान लिया था।
और कितनी बार वह यह भूल गया था कि जीवन का मूल्य उपलब्धियों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे उद्देश्य से तय होता है।
सत्यदूत ने कहा—
“जीवन कोई प्रतियोगिता नहीं है, रामनारायण।”

“किसी का जीवन लंबा होता है, किसी का छोटा।”
“किसी के पास धन अधिक होता है, किसी के पास कम।”
“किसी को प्रसिद्धि मिलती है, कोई गुमनाम रह जाता है।”
“लेकिन अंत में प्रश्न केवल इतना रहता है—”
“तुम्हें जो जीवन मिला था, उसकी रोशनी से तुमने क्या किया?”
रामनारायण के पास कोई उत्तर नहीं था।
तभी उसकी दृष्टि सामने खड़े एक विशाल वृक्ष पर पड़ी।
वह वृक्ष अद्भुत था।
उसकी जड़ें गहरे अंधकार में थीं और उसकी शाखाएँ प्रकाश के आकाश में फैली हुई थीं।
उसके तने पर केवल एक शब्द लिखा था—
“जीवन”
रामनारायण ने आश्चर्य से पूछा—
“इसकी जड़ें अंधकार में क्यों हैं?”
सत्यदूत बोले—
“क्योंकि मनुष्य अपने संघर्षों से जन्म लेता है।”
“अपने दुखों से सीखता है।”
“अपनी असफलताओं से गिरता है और फिर उठना सीखता है।”

उन्होंने वृक्ष की चमकती शाखाओं की ओर संकेत किया।
“और इसकी शाखाएँ प्रकाश में इसलिए हैं, क्योंकि वही संघर्ष आगे चलकर ज्ञान बन सकते हैं।”
“वही दुख करुणा बन सकते हैं।”
“वही असफलताएँ अनुभव बन सकती हैं।”
“और वही अनुभव मनुष्य को परिपक्व बना सकते हैं।”
रामनारायण ने वृक्ष को ध्यान से देखा।
अचानक उसे दिखाई दिया—
एक शाखा पर उसका बचपन था।
दूसरी शाखा पर उसकी युवावस्था।
तीसरी शाखा पर उसका विवाह।
चौथी शाखा पर उसके बच्चों का बचपन।
पाँचवीं शाखा पर उसके संघर्ष और जिम्मेदारियाँ।
और सबसे ऊँची शाखा पर…
उसकी मृत्यु।

रामनारायण अचानक काँप उठा।
उसने पूछा—
“मेरी मृत्यु भी इस वृक्ष की एक शाखा है?”
सत्यदूत ने शांत स्वर में कहा—
“हाँ।”
“मृत्यु जीवन से अलग नहीं है।”
“वह उसी वृक्ष का अंतिम फूल है।”
रामनारायण कुछ देर तक उस वाक्य को समझने का प्रयास करता रहा।
फिर धीरे से बोला—
“तो मृत्यु को समझने के लिए पहले जीवन को समझना होगा।”
सत्यदूत मुस्कुराए।
रामनारायण ने आगे कहा—
“और शायद जीवन को समझने के लिए मृत्यु को याद रखना होगा।”

सत्यदूत की आँखों में संतोष दिखाई दिया।
“अब तुम उस सत्य के निकट पहुँच रहे हो।”
उसी क्षण वृक्ष से एक पत्ता टूटकर नीचे गिरा।
वह सीधा रामनारायण की हथेली पर आकर ठहर गया।
उस पत्ते पर केवल एक शब्द लिखा था—
“आज”
रामनारायण ने उसे पढ़ा और आश्चर्य से पूछा—
“सिर्फ ‘आज’?”
सत्यदूत बोले—
“हाँ।”
“मनुष्य के पास वास्तव में यही एक दिन होता है।”
“बीता हुआ कल उसकी स्मृति है।”
“आने वाला कल उसकी आशा है।”

“लेकिन…”
उन्होंने रामनारायण की आँखों में देखते हुए कहा—
“आज ही उसका वास्तविक जीवन है।”
रामनारायण की आँखों में एक नई चमक आ गई।
उसे अचानक एहसास हुआ कि उसने अपने जीवन का कितना बड़ा हिस्सा बीते हुए कल के पछतावे और आने वाले कल की चिंता में गंवा दिया था।
वह वर्तमान में होते हुए भी वर्तमान में कभी जी ही नहीं पाया था।

तभी वृक्ष से एक और पत्ता टूटकर गिरा।
उस पर लिखा था—
“अभी”
सत्यदूत ने कहा—
“जिससे प्रेम करना है—अभी करो।”
“जिससे क्षमा माँगनी है—अभी माँगो।”
“जिसकी सहायता करनी है—अभी करो।”
“जिसे धन्यवाद देना है—अभी दो।”
“जिससे अपने मन की बात कहनी है—अभी कहो।”

फिर सत्यदूत का स्वर गंभीर हो गया—
“क्योंकि मृत्यु कभी यह सूचना देकर नहीं आती कि अब तुम्हारे पास केवल पाँच मिनट शेष हैं।”
रामनारायण की आँखें नम हो गईं।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“तो जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है…”
“मनुष्य के पास जीवन वास्तव में केवल…”
वह कुछ क्षण रुका।
फिर बोला—
“अभी होता है।”
सत्यदूत ने धीरे से सिर झुका दिया।
“हाँ।”

अचानक पूरा आकाश प्रकाश से भर गया।
अनगिनत दीप एक साथ प्रज्वलित हो उठे।
उनकी रोशनी आपस में मिलकर आकाश में एक वाक्य लिखने लगी—
“जीवन को कल पर मत छोड़ो।”
रामनारायण उस संदेश को अपलक देखता रहा।

अब उसे महसूस हो रहा था कि मृत्यु के बाद भी उसकी सबसे बड़ी सीख शायद उसके लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवित उन लोगों के लिए थी जो अभी भी अपने जीवन को कल के भरोसे जी रहे थे।
तभी दूर एक नया मार्ग दिखाई दिया।
उस मार्ग पर असंख्य लोग चल रहे थे।
कोई अकेला था…
कोई अपने परिवार के साथ था…
कोई भारी बोझ उठाए हुए था…
कोई बिल्कुल खाली हाथ था…
लेकिन हर व्यक्ति के पीछे उसकी अपनी कहानी चल रही थी।
किसी की कहानी में प्रेम था।
किसी में छल।
किसी में त्याग।
किसी में स्वार्थ।
किसी में करुणा।
और किसी में ऐसा सत्य, जिसे उसने पूरी दुनिया से छिपाकर रखा था।

रामनारायण ने उस दृश्य को देखा तो उसके भीतर एक नया प्रश्न जन्म लेने लगा।
मार्ग के प्रवेश-द्वार पर प्रकाश से कुछ शब्द लिखे थे—
“मनुष्य का असली चेहरा”
सत्यदूत ने रामनारायण की ओर देखा और कहा—
“अब तुम देखोगे कि मनुष्य दूसरों के सामने कौन बनकर रहता है…”
“और भीतर से वास्तव में कौन होता है।”
रामनारायण ने गहरी साँस ली।
उसने एक बार पीछे मुड़कर उस विशाल जीवन-वृक्ष को देखा।
फिर आगे बढ़ गया।
सत्यदूत उसके साथ थे।

दोनों उस नए मार्ग की ओर चल पड़े।
दूर कहीं एक घंटी बजी।
उसकी ध्वनि पूरे प्रकाशलोक में फैल गई।
मानो स्वयं समय कह रहा हो—
“जो समझना है… अभी समझ लो।”
रामनारायण के कदम तेज हो गए।
क्योंकि अब वह जान चुका था—
मृत्यु अंत नहीं, जीवन को समझने का अंतिम दर्पण है।
और उस दर्पण में दिखाई देने वाला चेहरा वही होता है…
जो मनुष्य वास्तव में है।

क्रमशः…
अगला भाग – 23 : “मनुष्य का असली चेहरा”
जहाँ रामनारायण उन चेहरों के पीछे छिपे सत्य को देखेगा—और समझेगा कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका दिखावा नहीं, बल्कि वह व्यवहार है जो वह तब करता है, जब उसे देखने वाला कोई नहीं होता।