*”वह आखिरी रात !..”*
(बारिश के उस पार)
“केरल की धरती पर बारिश केवल मौसम नहीं होती, वह एक भावना होती है।
जब अरब सागर से उठती हुई नमी पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से टकराती है, तब आसमान जैसे अपने सारे दर्द को बूंदों में बदल देता है। नारियल के ऊँचे वृक्ष झूमने लगते हैं, बैकवॉटर की झीलें साँस लेने लगती हैं, और इंसान के भीतर छुपी यादें भी भीग जाती हैं।
कोट्टायम जिले के छोटे-से कस्बे कुमारकोम में भी उस दिन ऐसी ही बारिश हो रही थी।
झील के किनारे बना हुआ सफेद रंग का एक पुराना बंगला वर्षों से लोगों के आकर्षण का केंद्र था। लोग उसे “नीलकंठ भवन” कहते थे। उस बंगले में रहता था विवेक मेनन—केरल का प्रसिद्ध मसाला व्यापारी।
उसके पास सब कुछ था।
पैसा, प्रतिष्ठा, बड़ी गाड़ियाँ, बिजनेस साम्राज्य।
लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब-सी थकान रहती थी।
रात को जब पूरा कुमारकोम सो जाता, तब विवेक अपने बंगले की बालकनी में अकेले बैठा झील को देखता रहता। हवा में बारिश की गंध होती और दूर कहीं नावों की धीमी आवाज़ आती।
ऐसी ही हर रात उसे अपने भीतर एक आवाज़ सुनाई देती—
“धक… धक… धक…”
दिल की आवाज़।
और उसी आवाज़ के साथ उसकी आँखों के सामने एक चेहरा उभर आता—
अनामिका।
वह लड़की जो बारिश से प्यार करती थी
पच्चीस साल पहले विवेक एक साधारण युवक था। उसके पिता का छोटा मसाला व्यापार था। महत्वाकांक्षा उसके भीतर आग की तरह जलती थी। वह बड़ा आदमी बनना चाहता था।
उसी दौरान उसकी मुलाकात हुई अनामिका से।
अनामिका सरकारी स्कूल में संगीत की शिक्षिका थी।
चेहरे पर मासूमियत, आँखों में सपने और दिल में अथाह प्रेम।
उसे बारिश बहुत पसंद थी।
वह अक्सर कहती—
“विवेक, बारिश में भगवान इंसानों का दर्द धो देता है।”
विवेक हँस देता।
“तुम हर चीज़ को कविता बना देती हो।”
अनामिका मुस्कुराकर जवाब देती—
“और तुम हर चीज़ को व्यापार।”
दोनों की शादी हो गई।
शुरुआत के दिन बहुत खूबसूरत थे। शाम को दोनों झील किनारे बैठते, नावों को गुजरते देखते और भविष्य के सपने बुनते।
फिर उनके जीवन में एक बेटी आई—
आराध्या।
अनामिका की दुनिया पूरी हो गई।
लेकिन विवेक की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती जा रही थीं।
उसने बिजनेस बढ़ाने के लिए दुबई, सिंगापुर और मुंबई के व्यापारियों से संबंध बनाए। पैसा आने लगा।
धीरे-धीरे उसका घर से रिश्ता कमजोर होता गया।
आराध्या रात-रात भर पिता का इंतजार करती, लेकिन विवेक बिजनेस मीटिंग्स में व्यस्त रहता।
एक दिन अनामिका ने कहा—
“तुम्हें पता है आराध्या आज स्कूल में गाना गा रही थी?”
विवेक लैपटॉप देखते हुए बोला—
“हूँ…”
“तुम सुन भी रहे हो?”
“अनामिका, प्लीज़… अभी बहुत जरूरी काम है।”
उस रात पहली बार अनामिका रोई थी।
कुछ वर्षों में विवेक मेनन केरल का बड़ा व्यापारी बन चुका था।
टीवी चैनलों पर उसके इंटरव्यू आने लगे। अखबारों में उसकी तस्वीरें छपने लगीं।
लेकिन उसी दौरान उसका परिवार उससे दूर होता गया।
अनामिका अब कम बोलती थी।
आराध्या अपने पिता से डरने लगी थी।
एक रात अनामिका ने कहा—
“विवेक, हमें तुम्हारे पैसों की नहीं… तुम्हारे समय की जरूरत है।”
विवेक गुस्से में चिल्लाया—
“मैं यह सब तुम्हारे लिए ही कर रहा हूँ!”
अनामिका शांत स्वर में बोली—
“नहीं विवेक… तुम यह सब अपने अहंकार के लिए कर रहे हो।”
विवेक तमतमा गया।
“अगर तुम्हें इतनी परेशानी है, तो चली जाओ।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
अनामिका की आँखों में आँसू थे।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“एक दिन तुम्हारे पास सब कुछ होगा… लेकिन तुम्हारे साथ कोई नहीं होगा।”
“वह आखिरी रात!..”
उस रात तेज बारिश हो रही थी।
अनामिका अपनी बेटी आराध्या को लेकर कार से अपनी माँ के घर जा रही थी।
सड़क फिसलन भरी थी।
अचानक सामने से आती हुई एक ट्रक की तेज रोशनी…
एक चीख…
और सब कुछ खत्म।
जब विवेक अस्पताल पहुँचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अनामिका की साँसें टूट रही थीं।
उसने विवेक का हाथ पकड़कर बस इतना कहा—
“आराध्या को… अकेला मत छोड़ना…”
और उसकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
आराध्या बच गई थी, लेकिन उस हादसे ने उसके दिल को तोड़ दिया।
उसने पिता से नफरत करनी शुरू कर दी।
विवेक पहली बार पूरी तरह टूट गया।
लेकिन पछतावा हमेशा देर से आता है।
वर्ष बीतते गए।
आराध्या पढ़ाई के लिए बेंगलुरु चली गई।
उसने पिता से दूरी बना ली।
विवेक अब और भी अमीर हो चुका था। लेकिन उसका विशाल बंगला कब्रिस्तान जैसा लगने लगा था।
दीवारों पर लगी तस्वीरें उसे काटने दौड़ती थीं।
एक रात उसने शराब के नशे में अनामिका की तस्वीर से कहा
“मुझे माफ कर दो…”
लेकिन तस्वीरें जवाब नहीं देतीं।
धीरे-धीरे विवेक डिप्रेशन में जाने लगा।
डॉक्टरों ने कहा—
“आपको आराम और लोगों के साथ समय बिताने की जरूरत है।”
लेकिन उसके पास कोई नहीं था।
एक सुबह विवेक अकेले कुमारकोम की झील में नाव लेकर निकल पड़ा।
नाव चला रहा था एक बूढ़ा व्यक्ति—चाको।
उसकी सफेद दाढ़ी थी और आँखों में अजीब चमक।
कुछ देर बाद चाको बोला—
*“साहब, इंसान जितना बाहर भागता है… उतना ही भीतर खाली हो जाता है।”*
विवेक चौंका।
“तुम दार्शनिक हो क्या?”
चाको हँसा।
*“नहीं… बस जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया है।”*
नाव पानी चीरते हुए आगे बढ़ रही थी।
बारिश की हल्की बूंदें गिर रही थीं।
चाको ने पूछा—
“आप कभी रोते नहीं?”
विवेक ने पहली बार महसूस किया कि वह वर्षों से रोया नहीं था।
कुछ दिनों बाद विवेक एक पुराने चर्च के पास गया। वहाँ बाढ़ पीड़ित बच्चों के लिए छोटा-सा आश्रय गृह चल रहा था।
उसी जगह उसकी मुलाकात हुई एक छोटी बच्ची से—
एल्सा।
एल्सा हमेशा मुस्कुराती रहती थी।
उसने विवेक से पूछा—
“अंकल, आपके घर में इतने सारे कमरे हैं… फिर भी आप अकेले क्यों रहते हो?”
विवेक के पास जवाब नहीं था।
धीरे-धीरे वह रोज वहाँ जाने लगा।
बच्चों के साथ बैठता, कहानियाँ सुनाता।
एल्सा उसे “स्माइल अंकल” कहने लगी।
वर्षों बाद विवेक के चेहरे पर मुस्कान लौट रही थी।
एक दिन अचानक आराध्या घर लौट आई।
अब वह बड़ी हो चुकी थी।
आँखों में वही गहराई थी जो उसकी माँ की आँखों में थी।
उसने पिता से कहा—
“मैं यहाँ कुछ दिनों के लिए आई हूँ।”
दोनों के बीच अजीब दूरी थी।
रात के खाने पर विवेक ने कहा—
“कैसी हो?”
“ठीक हूँ।”
“काम कैसा चल रहा है?”
“अच्छा।”
बस इतना ही।
लेकिन उस रात विवेक ने पहली बार अपनी बेटी के कमरे के बाहर खड़े होकर रोया।
उसे महसूस हुआ कि उसने जीवन में सबसे बड़ा नुकसान रिश्तों का किया है।
2018 की भयंकर केरल बाढ़ ने पूरे राज्य को हिला दिया।
कुमारकोम भी पानी में डूब गया।
लोग छतों पर फँसे हुए थे। बच्चे रो रहे थे। चारों तरफ चीख-पुकार।
विवेक ने पहली बार अपने सारे गोदाम लोगों के लिए खोल दिए।
खाना, दवाइयाँ, नावें—सब राहत कार्य में लगा दिए गए।
आराध्या भी मेडिकल टीम के साथ लोगों की मदद करने लगी।
एक रात सूचना मिली कि चर्च का आश्रय गृह पानी में घिर गया है।
एल्सा और कई बच्चे अंदर फँसे हुए थे।
बिना सोचे विवेक नाव लेकर निकल पड़ा।
तेज बारिश और तूफानी लहरें।
आराध्या चिल्लाई—
“पापा, मत जाइए!”
लेकिन विवेक जा चुका था।
पानी तेजी से बढ़ रहा था।
विवेक किसी तरह चर्च तक पहुँचा।
बच्चे डरे हुए थे।
एल्सा रोते हुए उससे लिपट गई—
“अंकल, हमें बचा लो…”
विवेक ने एक-एक बच्चे को नाव में बैठाया।
लेकिन तभी तेज धारा से नाव पलट गई।
चारों तरफ अंधेरा और पानी।
विवेक ने एल्सा को ऊपर उठाए रखा।
उसे लग रहा था कि उसकी साँसें टूट रही हैं।
उसी क्षण उसे अनामिका की आवाज़ सुनाई दी—
“आराध्या को अकेला मत छोड़ना…”
वह पूरी ताकत से तैरने लगा।
कुछ देर बाद राहत टीम वहाँ पहुँची।
सबको बचा लिया गया।
लेकिन विवेक बेहोश हो चुका था।
जब विवेक की आँख खुली, वह अस्पताल में था।
आराध्या उसके पास बैठी थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“आप पागल हैं क्या?”
विवेक कमजोर स्वर में बोला—
*“शायद… लेकिन पहली बार मुझे लगा कि मैं इंसान हूँ।”*
आराध्या रो पड़ी।
वर्षों का गुस्सा उस बारिश में बह गया।
उसने पिता का हाथ पकड़ लिया।
“माँ आपको माफ कर देती…”
विवेक की आँखें भर आईं।
कुछ महीनों बाद विवेक ने अपना आधा व्यापार बेच दिया।
उस पैसे से उसने कुमारकोम में एक बड़ा स्कूल और आश्रय गृह बनवाया—
“अनामिका जीवनालय”
वहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाने लगी।
आराध्या ने वहीं संगीत सिखाना शुरू किया।
एक शाम बच्चों का कार्यक्रम था।
आराध्या मंच पर वही गीत गा रही थी जो उसकी माँ गाया करती थी।
विवेक पीछे बैठा रो रहा था।
उसे लग रहा था कि अनामिका आज भी यहीं कहीं मौजूद है।
सालों बाद एक शाम विवेक फिर झील किनारे बैठा था।
बारिश धीरे-धीरे हो रही थी।
चाको उसके पास आया और बोला—
“अब आपकी आँखों में शांति है।”
विवेक मुस्कुराया।
“मैंने जिंदगी बहुत देर से समझी।”
चाको बोला—
*“देर से जलने वाला दीपक भी अंधेरा मिटा देता है।”*
विवेक ने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे बारिश की हर बूंद में अनामिका मुस्कुरा रही हो।
उसके दिल में वर्षों बाद सुकून था।
अब उसे अपने भीतर वही आवाज़ सुनाई दे रही थी—
“धक… धक… धक…”
लेकिन अब वह आवाज़ दर्द की नहीं थी।
वह जीवन की आवाज़ थी।
प्रेम की आवाज़।
माफी की आवाज़।
और शायद…
भगवान की भी।
कभी-कभी इंसान पूरी जिंदगी सफलता के पीछे भागता है, लेकिन अंत में उसे समझ आता है कि सबसे बड़ी सफलता रिश्तों को बचा लेना है।
पैसा घर बना सकता है,
लेकिन परिवार नहीं।
समय सब कुछ बदल देता है, लेकिन प्रेम की धड़कन कभी नहीं मरती।
और शायद इसलिए—
*”बारिश के उस पार हमेशा एक नई जिंदगी हमारा इंतजार करती है।”*
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
#सुशीलकुमारसुमन
#युवा










