*“उत्तम कुमार: यह बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के एक चमकते सितारे का अवसान है… ऐसा कोई नायक नहीं था – और न ही कोई होगा।”*
— सत्यजीत रे
*वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक संपूर्ण संस्था थे। ऐसा कहा जाता है कि वह एक वर्कोहॉलिक थे, और उन्होंने कभी यह इच्छा जताई थी कि उनका अंतिम समय स्टूडियो के फर्श पर अभिनय करते हुए आए। किस्मत ने जैसे उनकी यह इच्छा पूरी कर दी।*
1980 में ओगो बधू सुंदरि की शूटिंग के दौरान उन्हें स्ट्रोक आया। उन्हें तुरंत बेल व्यू क्लिनिक में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने 16 घंटे तक उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन 24 जुलाई 1980 की रात, 53 वर्ष की आयु में वह इस दुनिया को अलविदा कह गए।
जब उनका पार्थिव शरीर भवानीपुर से केओरातला श्मशान घाट की ओर गया, कोलकाता की सड़कों पर सन्नाटा छा गया। हजारों लोग श्रद्धांजलि देने और अपने महानायक की अंतिम झलक पाने के लिए उमड़ पड़े। यह किसी अभिनेता की विदाई नहीं थी — यह पूरे बंगाल की धड़कन के थमने जैसा था।
आज भी उनकी मुस्कान, उनकी अदायगी, उनका सादापन और उनका सिनेमा हमारे बीच जीवित है।
RIP… महानायक या गुरु, आप सदैव अमर रहेंगे।
लेखक:
*“सुशील कुमार सुमन”*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी बर्नपुर




















