*“भूख !..”*
“सन 1956 का समय था। देश आज़ाद हो चुका था, पर हर आदमी अपने भीतर किसी न किसी कैद में जी रहा था। कहीं गरीबी की कैद, कहीं जाति की, कहीं डर की, कहीं भूख की। बिहार और झारखंड की सीमा पर बसा एक छोटा-सा कस्बा था—सोनपुरा। वहाँ मिट्टी के घर थे, टूटी सड़कें थीं, बरसात में कीचड़ था और गर्मियों में फटी धरती। खेत थे, पर किसानों के पेट खाली थे।
उसी कस्बे में रहता था उन्नीस वर्ष का युवक अरविंद। दुबला-पतला, आँखों में चमक, मन में कविताएँ, और पेट में हमेशा आधी भूख। उसकी माँ सरस्वती दिनभर दूसरों के घर काम करती, पिता रघुनाथ कभी खेतिहर मज़दूरी करते, कभी बीमार पड़ जाते। घर में छोटी बहन मीरा थी, जो हर रात पूछती—“भैया, शहर में सचमुच सबको पूरा खाना मिलता है?”
*अरविंद हँस देता, “हाँ, वहाँ लोग रोटियाँ गिनते नहीं, छोड़ देते हैं।”*
पर वह जानता था कि यह आधा झूठ है, आधा सपना।
एक दिन सुबह गाँव में पुलिस की जीप आई। साथ में ब्लॉक ऑफिस के लोग थे। उन्होंने नाम पुकारे—जो बेरोज़गार थे, जिनके पास ज़मीन नहीं थी, जिनकी आवाज़ कमज़ोर थी। कहा गया—“सरकार ने काम निकाला है। पहाड़ों में सड़क बनेगी। मजदूरी मिलेगी, राशन मिलेगा, रहना मिलेगा।”
गाँव के बूढ़े बोले—“काम अच्छा है तो जीप में पुलिस क्यों?”
किसी ने उत्तर नहीं दिया।
अरविंद का नाम भी पुकारा गया। माँ रोने लगी—“इसे मत ले जाओ, यह पढ़ना चाहता है।”
कागज़ पर मुहर लगी। कहा गया—“देश-निर्माण में सबको हिस्सा लेना होगा।”
अरविंद ने माँ का हाथ छोड़ा, बहन के सिर पर हाथ फेरा और जीप में बैठ गया। उसे लगा वह नौकरी पर जा रहा है। उसे नहीं पता था कि वह भूख की ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहा है, जहाँ आदमी पहले पेट से हारता है, फिर आत्मा से।
जीप, ट्रेन, फिर ट्रक। तीन दिन बाद वे लोग हिमालय की तलहटी में बने एक श्रम-शिविर पहुँचे। चारों ओर पहाड़, चीड़ के पेड़, बर्फीली हवा और बीच में काँटेदार तारों से घिरा कैम्प। लकड़ी के बैरक, मिट्टी के फर्श, लोहे के पलंग।
दरवाज़े पर बोर्ड था—
“राष्ट्रीय श्रम पुनर्वास शिविर”
पर सब उसे “कैम्प” कहते थे।
वहाँ अलग-अलग राज्यों से लाए गए लोग थे—किसान, बेरोज़गार युवक, कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता, कुछ ऐसे लोग जिन्हें बस किसी अफसर ने पसंद नहीं किया था।
पहले दिन एक मुंशी ने नियम पढ़े—
सुबह चार बजे उठना
पाँच बजे हाज़िरी
छह बजे काम पर रवाना
शाम तक पत्थर तोड़ना, सड़क बनाना, लकड़ी ढोना
भागने की कोशिश पर दंड
शिकायत पर राशन कटेगा
रात में अरविंद ने देखा कि सब लोग खाने की थाली को ऐसे देख रहे थे जैसे मंदिर का प्रसाद हो। दो सूखी रोटियाँ, पतली दाल, नमक।
उसने पहली बार समझा— *भूख सिर्फ पेट में नहीं लगती, आँखों में भी लगती है।*
उस बैरक में कई चेहरे थे।
बलबीर सिंह – पंजाब का हँसमुख आदमी, जो हर दुख को मज़ाक में बदल देता।
नज़ीर मियाँ – बुज़ुर्ग दर्जी, जिन्हें बस इसलिए उठा लाया गया कि उन्होंने अधिकारी से बहस की थी।
कमली – पहाड़ी स्त्री, जिसका पति भाग गया था और उसे मजदूरी के लिए पकड़ लिया गया।
रामकिशोर मास्टर – पूर्व शिक्षक, जो रात में सबको कविताएँ सुनाते।
अरविंद सबसे जल्दी घुला-मिला। उसने पाया कि यहाँ आदमी अपना नाम नहीं, अपनी भूख साझा करता है।
बलबीर बोला—“भाई, यहाँ दोस्ती पेट से शुरू होती है। अगर किसी ने आधी रोटी बाँटी, वही सगा है।”
कुछ ही दिनों में काम का असली रूप सामने आया। वे पहाड़ काटते, पत्थर उठाते, बर्फ में भी नंगे हाथ काम करते। राशन वही थोड़ा-सा। शरीर टूटता गया।
एक शाम अरविंद लकड़ी काटते-काटते गिर पड़ा। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। तभी उसे लगा कोई उसके सामने खड़ा है। एक लंबा, दुबला, सफेद चेहरे वाला अजीब प्राणी। उसकी आँखें खाली कटोरों जैसी थीं।
वह बोला—
*“मैं भूख हूँ। मैं तेरे साथ रहूँगा।”*
अरविंद घबरा गया।
प्राणी मुस्कुराया—
“डर मत। मैं सबके साथ हूँ। कोई मुझे भूख कहता है, कोई नियति, कोई भगवान, कोई शाप।”
जब उसकी आँख खुली, साथी उसे उठा रहे थे।
उस दिन से वह उस अदृश्य प्राणी को “भूख का देवदूत” कहने लगा।
धीरे-धीरे कैम्प में सबकी भाषा बदल गई।
कोई मौसम की बात नहीं करता था। सब कहते—
“आज रोटी कितनी मोटी थी?”
“दाल में दाने कितने थे?”
“अगर घर जाते तो क्या खाते?”
रामकिशोर मास्टर हर रात कल्पना करवाते—
“सोचो, गरम चावल पर घी डाला है…”
लोग आँख बंद कर लेते। कई रो पड़ते।
कमली कहती—“मेरे गाँव में मडुए की रोटी होती थी, मैं पहले नखरे करती थी। अब वही मिले तो माथे से लगा लूँ।”
भूख ने सबको दार्शनिक बना दिया था।
एक रात गोदाम से आलू गायब मिले। पहरेदार ने पूरी बैरक लाइन में खड़ी कर दी। सबकी तलाशी हुई। नज़ीर मियाँ के बिस्तर के नीचे दो कच्चे आलू मिले।
वे काँपते हुए बोले—“मैंने नहीं चुराए… किसी ने रख दिए होंगे…”
पर कौन सुनता? उन्हें सबके सामने पीटा गया। अगले तीन दिन राशन बंद।
रात में अरविंद ने देखा, नज़ीर मियाँ दीवार चाट रहे थे। शायद नमक का स्वाद ढूँढ़ रहे थे।
उस रात भूख का देवदूत फिर आया। बोला—
*“जब आदमी भूखा होता है, न्याय सबसे पहले मरता है।”*
दिसंबर आया। पहाड़ सफेद हो गए। काम बंद नहीं हुआ। लोगों के हाथ सुन्न, पैर फटे, होंठ नीले।
एक दिन कमली का पैर फिसला। वह ढलान से नीचे गिरी। जब तक लोग पहुँचे, साँस जा चुकी थी।
अधिकारी ने बस रजिस्टर में लिखा—
“कार्यस्थल दुर्घटना।”
रात में बैरक में पहली बार कोई गीत नहीं गाया गया।
अरविंद देर तक जागता रहा। उसे लगा भूख का देवदूत कमली के सिरहाने बैठा है, जैसे किसी पुराने परिचित को विदा दे रहा हो।
अरविंद ने जीने का नया तरीका खोजा। वह हर रात अपनी माँ की रसोई याद करता। चूल्हे की लकड़ी, जलती लौ, सरसों के तेल की गंध, तवे पर सिकती रोटी की आवाज़।
स्मृति भी भोजन बन सकती है—यह उसने वहीं सीखा।
वह बहन मीरा के लिए मन ही मन पत्र लिखता:
“मीरा, अगर मैं लौटूँ तो मुझे पहला निवाला तू खिलाना। अगर न लौटूँ तो मेरी थाली संभालकर रखना…”
पत्र भेजने की अनुमति नहीं थी, पर लिखना मन को बचाए रखता था।
एक दिन बलबीर ने अपनी रोटी का आधा टुकड़ा अरविंद को दिया।
अरविंद बोला—“तू खुद भूखा है।”
बलबीर हँसा—“अकेला खाऊँगा तो पेट भरेगा, बाँटूँगा तो दिल।”
उसी रात अरविंद ने तय किया कि यदि वह कभी बाहर निकला तो भूखों के लिए काम करेगा।
कैम्प ने उससे सब कुछ छीना था, पर एक चीज़ दी थी—दूसरे के दर्द को समझने की शक्ति।
कुछ मजदूरों ने हड़ताल की कोशिश की। कहा—“राशन बढ़ाओ, काम कम करो।”
उत्तर में लाठियाँ मिलीं। तीन लोगों को अलग बैरक में बंद कर दिया गया।
रामकिशोर मास्टर बोले—
*“अन्याय का सबसे बड़ा हथियार डर है।”*
अरविंद ने पहली बार महसूस किया कि भूख और भय जुड़वाँ भाई हैं। एक पेट तोड़ता है, दूसरा आत्मा।
वसंत तक आधे लोग बीमार पड़ चुके थे। किसी को खाँसी, किसी को बुखार, किसी को सूजन। डॉक्टर महीने में एक बार आता और सबको एक ही गोली देता।
अरविंद भी तेज़ बुखार में तपने लगा। उसने कई दिन काम नहीं किया तो राशन और घट गया।
उसे भ्रम होने लगे। वह देखता—आसमान से रोटियाँ गिर रही हैं, नदी में दूध बह रहा है, पहाड़ गुड़ के बने हैं।
फिर वही देवदूत आता और सब गायब कर देता।
“तू मुझे क्यों सताता है?” अरविंद चिल्लाता।
देवदूत कहता—
“मैं तुझे नहीं सताता। मैं बस याद दिलाता हूँ कि दुनिया कैसी है।”
1977 में देश की राजनीति बदली। अखबार देर से आते थे, पर खबरें पहुँचती थीं—नई सरकार, पुराने फैसलों की समीक्षा, कैम्पों की जाँच।
अफसरों के चेहरे बदलने लगे। पहरेदार नरम पड़ गए। रजिस्टरों में सुधार होने लगा।
एक सुबह घोषणा हुई—
“कुछ लोगों को रिहा किया जाएगा।”
सबकी साँस अटक गई। नाम पढ़े जाने लगे।
“अरविंद कुमार…”
उसे लगा उसने गलत सुना।
फिर दोबारा नाम पुकारा गया।
छह महीने बाद वह गाँव लौटा। माँ पहले उसे पहचान न सकी। चेहरा धँसा हुआ, बाल झड़े हुए, कंधे झुके हुए।
माँ ने बस इतना कहा—“बेटा…” और रो पड़ी।
मीरा ने दौड़कर रोटी लाई। गरम, नरम, घर की रोटी।
अरविंद उसे देखते ही रोने लगा।
उसने पहला निवाला मुँह में रखा। गेहूँ, धुआँ, नमक, आँसू—सब एक साथ घुल गए।
उसने जाना कि स्वाद सिर्फ जीभ से नहीं, इतिहास से बनता है।
कैम्प छूट गया था, पर कैम्प उसके भीतर रह गया।
रात में वह नींद से उठ बैठता। उसे लगता कोई रोटी छीन रहा है। कभी वह खाना छिपा देता। कभी थाली खाली होने से पहले डर जाता।
माँ कहती—“अब तू घर पर है।”
पर मन इतनी जल्दी घर नहीं लौटता।
भूख का देवदूत अब भी कभी-कभी खिड़की पर दिखाई देता।
“तू गया नहीं?” अरविंद पूछता।
वह कहता—
“जहाँ लोग भूखे हैं, मैं वहीं हूँ।”
कुछ महीनों बाद अरविंद ने कस्बे में एक छोटा-सा पाठशाला-कम-भोजनालय शुरू किया। दिन में बच्चों को पढ़ाता, शाम को जरूरतमंदों को खिचड़ी खिलाता।
लोग पूछते—“तेरे पास पैसे कहाँ से आते हैं?”
वह मुस्कुराता— ““जिसने भूख देखी हो, उसे रास्ते मिल जाते हैं।”*
बलबीर कभी-कभी मिलने आता। नज़ीर मियाँ भी बाद में लौट आए थे। वे सिलाई करते और बच्चों के कपड़े मुफ्त में ठीक कर देते।
रामकिशोर मास्टर ने गाँव में पुस्तकालय शुरू किया।
जिन्होंने नरक देखा था, वे स्वर्ग नहीं बना सकते थे, पर इंसानियत की छोटी-छोटी खिड़कियाँ खोल सकते थे।
एक दिन मीरा, जो अब बड़ी हो चुकी थी, बोली—
“भैया, उस कैम्प में सबसे बुरा क्या था? मार? ठंड? काम?”
अरविंद देर तक सोचता रहा।
फिर बोला—
“सबसे बुरा था आदमी का धीरे-धीरे आदत डाल लेना। जब अन्याय सामान्य लगने लगे, तब सबसे बड़ा खतरा होता है।”
मीरा ने पूछा—“और सबसे अच्छा?”
वह बोला—
“जब कोई अपनी आधी रोटी बाँट दे।”
बरसों बाद, एक रात अरविंद बाहर आँगन में बैठा था। चाँदनी फैली थी। हवा में पके धान की गंध थी।
उसे फिर वही देवदूत दिखाई दिया। पर अब उसका चेहरा उतना भयावह नहीं था।
अरविंद बोला—
“तू अब क्यों आया है?”
देवदूत ने कहा—
“देखने कि तूने मुझसे क्या सीखा।”
अरविंद ने भोजनालय की ओर इशारा किया, जहाँ कुछ बच्चे हँसते हुए खा रहे थे।
देवदूत मुस्कुराया।
“अब मुझे यहाँ कम आना पड़ेगा।”
और वह धुंध में विलीन हो गया।
समय बीता। अरविंद बूढ़ा हुआ। गाँव बदल गया। सड़कें बनीं, बिजली आई, स्कूल बड़ा हुआ। पर उसके भोजनालय की परंपरा बनी रही।
हर साल एक दिन गाँव वाले मिलकर सामूहिक भोज करते। कोई अमीर-गरीब नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। सब एक पंक्ति में बैठते।
उस दिन अरविंद कहता—
*“रोटी गोल होती है, क्योंकि वह सबको बराबर बाँटने के लिए बनी है।”*
लोग हँसते, बच्चे तालियाँ बजाते।
पर जो उसकी आँखों में झाँकता, उसे वहाँ पहाड़ों का कैम्प, बर्फ, टूटे शरीर, और एक अदृश्य देवदूत की स्मृति दिखाई देती।
जब अरविंद जीवन के आख़िरी दिनों में था, उसने मीरा से कहा—
“अगर लोग मुझसे पूछें कि मैंने क्या देखा, तो कहना—मैंने भूख को आदमी से बड़ा होते देखा। और मैंने इंसानियत को भूख से भी बड़ा होते देखा।”
मीरा रो पड़ी।
उसने भाई का हाथ पकड़ा।
अरविंद ने धीरे से कहा—
*“किसी को भूखा मत सोने देना… यही मेरी कहानी है।”*
आज भी सोनपुरा के स्कूल की दीवार पर लिखा है—
“जिसने भूख देखी हो, वही रोटी का सम्मान जानता है।”
गाँव के बच्चे उस वाक्य को पढ़ते हैं, शायद पूरा अर्थ नहीं समझते। पर जब वे थाली में बचा खाना खत्म करते हैं, किसी भूखे को हिस्सा देते हैं, या किसी गरीब दोस्त के लिए टिफिन बाँटते हैं—तब अरविंद की कहानी जीवित हो उठती है।
और कहीं दूर, समय की धुंध में, भूख का देवदूत खड़ा देखता है कि इंसान अभी पूरी तरह हारा नहीं है।”
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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