*”एक चुप सी बारिश !..”*
*साल 1992।..*
“हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों पर उस सुबह धुंध कुछ ज्यादा ही गहरी थी। देवदार के पेड़ों के बीच से आती ठंडी हवा मानो किसी पुराने दर्द की कहानी सुना रही थी। दूर पहाड़ियों के पीछे सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था, लेकिन पालमपुर के पास बसे छोटे-से कस्बे “घनेरा” के एक पुराने बंगले में आज भी अंधेरा पसरा था।
उस बंगले का मालिक था—राघव ठाकुर।
राघव कभी बहुत हँसमुख इंसान था। कॉलेज के दिनों में कविता लिखता था, गाता था, दोस्तों के साथ घंटों हँसता था। लेकिन उसकी पत्नी माया की मृत्यु ने उसे भीतर से पत्थर बना दिया था।
और उसी पत्थर के घर में रहती थी उसकी बेटी—नैना।
एक ऐसी लड़की, जिसकी आँखों में पूरी दुनिया के सवाल थे, लेकिन होंठों पर कभी जवाब नहीं आते थे।
नैना बचपन से ही बहुत शांत थी।
उसने अपने पिता को कभी खुलकर हँसते नहीं देखा था।
माया की मृत्यु नैना के जन्म के समय हुई थी। राघव के मन में कहीं न कहीं यह धारणा बैठ गई थी कि उसकी पत्नी की मौत की वजह वही बच्ची है।
हालाँकि उसने कभी यह बात सीधे नहीं कही, लेकिन उसका व्यवहार सब बता देता था।
“बिटिया को नीचे मत आने देना,” वह नौकरानी कमला से कहता।
“साहब, बच्ची आपसे बात करना चाहती है…”
“मेरे पास समय नहीं है।”
बस यही शब्द थे जो नैना ने अपने पिता से सबसे ज्यादा सुने थे।
धीरे-धीरे उसने बोलना कम कर दिया।
वह घंटों खिड़की के पास बैठकर पहाड़ों को देखती रहती।
बारिश की बूंदें उसे अच्छी लगती थीं।
*शायद इसलिए क्योंकि बारिश भी बिना बोले सब कह देती है।*
घनेरा कस्बे में उसी समय एक नया युवक आया—अर्जुन मेहरा।
अर्जुन शिमला से आया था। वह एक सरकारी स्कूल में हिंदी शिक्षक बनकर आया था। लंबा कद, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, आँखों में सपने और होंठों पर हमेशा मुस्कान।
उसे कविता लिखने का शौक था।
पहाड़ों से उसे प्रेम था।
वह अक्सर डायरी लेकर जंगलों में घूमने निकल जाता।
एक दिन स्कूल के वार्षिक समारोह के लिए वह राघव ठाकुर के घर निमंत्रण देने पहुँचा।
दरवाजा नैना ने खोला।
सफेद सूती सलवार, खुले बाल, और बेहद शांत चेहरा।
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रह गया।
“जी… ठाकुर साहब हैं?”
नैना ने बिना कुछ बोले अंदर इशारा कर दिया।
अर्जुन ने महसूस किया कि उस लड़की की आँखों में एक अजीब उदासी थी। जैसे किसी ने उसके भीतर की आवाज़ कैद कर दी हो।
कुछ दिनों बाद अर्जुन फिर ठाकुर साहब के घर आया। इस बार राघव बाहर गया हुआ था।
नैना बरामदे में बैठी किताब पढ़ रही थी।
अर्जुन मुस्कुराया।
*“आप हमेशा इतनी चुप रहती हैं?”*
नैना ने पहली बार किसी अनजान आदमी की तरफ सीधे देखा।
“कुछ लोग बोलकर भी नहीं समझे जाते… इसलिए चुप रहना आसान होता है।”
अर्जुन हैरान रह गया।
*“तो आप बोलती भी हैं!”*
नैना हल्का-सा मुस्कुरा दी।
उसकी मुस्कान बेहद सुंदर थी। लेकिन लगता था जैसे बरसों बाद उसके चेहरे पर आई हो।
धीरे-धीरे अर्जुन घर आने लगा।
राघव को उससे कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि वह पढ़ा-लिखा और सभ्य लड़का था।
एक दिन अर्जुन ने नैना को एक डायरी दी।
“इसमें जो मन करे लिखिए।”
“मैं लिख नहीं पाऊँगी।”
*“जो कहा नहीं जाता, वही सबसे अच्छा लिखा जाता है।”*
उस रात नैना ने पहली बार कुछ लिखा।
*“क्या हर लड़की अपने पिता की आँखों में प्यार देखती है?*
अगर हाँ… तो शायद मैं अपवाद हूँ।”
उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े।
एक शाम अर्जुन और राघव साथ बैठे थे।
पुरानी शराब की बोतल खुली हुई थी।
राघव ने पहली बार अपने दर्द का जिक्र किया।
“माया मेरी जिंदगी थी… और उसी दिन चली गई जिस दिन नैना आई।”
अर्जुन चुप रहा।
“मैं कोशिश करता हूँ… लेकिन उसे देखते ही मुझे माया की मौत याद आ जाती है।”
अर्जुन ने धीरे से कहा—
“गलती आपकी बेटी की नहीं है, ठाकुर साहब।
कभी-कभी इंसान दुख से इतना भर जाता है कि प्यार देख ही नहीं पाता।”
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।
बरसात का मौसम शुरू हो चुका था।
एक दिन अर्जुन और नैना पहाड़ियों की तरफ घूमने निकले।
चारों तरफ धुंध फैली हुई थी। देवदार के पेड़ों से बारिश की बूंदें टपक रही थीं।
अर्जुन ने पूछा—
“तुम्हें सबसे ज्यादा डर किससे लगता है?”
नैना कुछ देर चुप रही।
“किसी अपने के छोड़ जाने से।”
“और सबसे ज्यादा इच्छा?”
“कि कोई बिना वजह मुझे अपना कहे।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखें भीग चुकी थीं।
उस दिन पहली बार अर्जुन ने महसूस किया कि वह नैना से प्रेम करने लगा है।
घनेरा छोटा कस्बा था।
लोगों को दूसरों की जिंदगी में झाँकने की आदत थी।
धीरे-धीरे अर्जुन और नैना की दोस्ती की बातें फैलने लगीं।
एक दिन राघव के पुराने दोस्त विजय ने कहा—
“लोग बातें बना रहे हैं ठाकुर साहब। लड़की जवान है।”
राघव का चेहरा कठोर हो गया।
उस रात उसने नैना से कहा—
“आज के बाद उस लड़के से कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”
नैना काँप गई।
“लेकिन क्यों?”
“क्योंकि मैंने कहा है!”
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
“क्या आपने कभी मुझे बेटी माना भी है?”
राघव चुप रह गया।
यह पहला मौका था जब नैना ने अपने पिता से सवाल किया था।
अर्जुन को जब यह बात पता चली तो वह सीधा राघव के पास गया।
“मैं नैना से शादी करना चाहता हूँ।”
राघव गुस्से से भर उठा।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”
“मैं उससे प्यार करता हूँ।”
“प्यार?” राघव हँसा।
“तुम नहीं जानते वह लड़की मेरे लिए क्या है।”
अर्जुन ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“वह आपकी बेटी है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राघव ने पहली बार किसी के सामने खुद को कमजोर महसूस किया।
उस रात नैना बहुत रोई।
उसने अपनी डायरी में लिखा—
“मैंने हमेशा पिता का प्यार माँगा।
बदले में सिर्फ दूरी मिली।
शायद कुछ रिश्ते जन्म से नहीं, दर्द से बनते हैं।”
सुबह जब कमला कमरे में गई, तो नैना वहाँ नहीं थी।
सिर्फ डायरी खुली हुई पड़ी थी।
पूरा घर घबरा गया।
राघव पहली बार डर गया।
“नैना!”
वह पूरे कस्बे में उसे ढूँढ़ता रहा।
बारिश तेज हो चुकी थी।
शाम के समय अर्जुन को नैना पहाड़ी के किनारे मिली।
वह चुपचाप नीचे बहती नदी को देख रही थी।
अर्जुन ने धीरे से कहा—
*“भागकर दर्द खत्म नहीं होता।”*
नैना रो पड़ी।
“मैं थक गई हूँ अर्जुन… बहुत थक गई हूँ।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम अकेली नहीं हो।”
उसी समय पीछे से राघव की आवाज़ आई—
“नैना!”
नैना ने मुड़कर देखा।
पहली बार उसके पिता की आँखों में डर था… और प्यार भी।
राघव उसके पास आया और काँपती आवाज़ में बोला—
“मुझे माफ कर दो बेटा…”
नैना स्तब्ध रह गई।
“मैंने तुम्हें हर दिन सजा दी… उस गलती की जो तुम्हारी थी ही नहीं।”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं बहुत बुरा पिता रहा।”
नैना फूट-फूटकर रो पड़ी और वर्षों बाद अपने पिता के गले लग गई।
बारिश लगातार हो रही थी।
लेकिन शायद उस बारिश ने वर्षों का दर्द बहा दिया था।
कुछ महीनों बाद घनेरा कस्बा फिर सामान्य हो गया।
लेकिन ठाकुर बंगले में बहुत कुछ बदल चुका था।
अब सुबह चाय की मेज पर राघव और नैना साथ बैठते थे।
राघव कभी-कभी खुद उसके लिए चाय बनाता।
कमला हँसकर कहती—
“लगता है साहब को आखिर बेटी मिल ही गई।”
एक दिन राघव ने नैना से कहा—
“अगर तुम चाहो… तो अर्जुन से शादी कर सकती हो।”
नैना की आँखें भर आईं।
“आप सच कह रहे हैं?”
“हाँ बेटा… क्योंकि अब मैं तुम्हारी खुशी से दूर नहीं भागना चाहता।”
सर्दियों की एक खूबसूरत सुबह थी।
पूरा घनेरा बर्फ से ढका हुआ था।
छोटे-से मंदिर में अर्जुन और नैना की शादी हुई।
बहुत बड़ा समारोह नहीं था।
लेकिन वहाँ सच्चा अपनापन था।
राघव ने पहली बार मुस्कुराते हुए अपनी बेटी का हाथ अर्जुन के हाथ में रखा।
“इसे कभी अकेला मत छोड़ना।”
अर्जुन ने कहा—
“कभी नहीं।”
नैना की आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार वे दुख के नहीं थे।
सालों बाद लोग कहते थे कि घनेरा के पुराने ठाकुर बंगले में अब पहले जैसी उदासी नहीं रही।
बरामदे में अक्सर हँसी सुनाई देती।
राघव फिर कविता लिखने लगा था।
और नैना?
उसने आखिरकार बोलना सीख लिया था।
क्योंकि कुछ लोग हमारी जिंदगी में शब्द बनकर नहीं आते…
वे हमारे भीतर बंद पड़े शब्दों को आज़ाद करने आते हैं।
अर्जुन भी ऐसा ही था।
और शायद प्रेम का असली अर्थ यही है—
किसी टूटे हुए इंसान को यह एहसास दिलाना कि वह अब भी प्यार के योग्य है।”
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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#युवा










