महालया के दिन ही दुर्गा पूजा और विसर्जन! आसनसोल के कालीकृष्ण आश्रम की अनोखी परंपरा
जया-विजया की प्रतिमाओं के साथ होती है मां दुर्गा की पूजा, दूर-दराज से दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु
आसनसोल। पश्चिम बंगाल के आसनसोल स्थित हीरापुर के धेनुआ गांव में दामोदर नदी के किनारे बना कालीकृष्ण आश्रम अपनी अनोखी दुर्गा पूजा परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है। जहां आमतौर पर महालया के बाद देवीपक्ष की शुरुआत होती है और निर्धारित तिथियों पर सप्तमी, अष्टमी, नवमी तथा दशमी की पूजा संपन्न होती है, वहीं इस आश्रम में महालया के दिन ही मां दुर्गा की पूजा से लेकर विसर्जन तक की सभी प्रमुख रस्में पूरी कर ली जाती हैं।

महालया के दिन ही संपन्न होती हैं दुर्गोत्सव की रस्में
कालीकृष्ण आश्रम में महालया के दिन ही दुर्गोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दौरान सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी से जुड़ी प्रमुख पूजा प्रक्रियाएं एक ही दिन में संपन्न की जाती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है।
आश्रम की यह परंपरा सामान्य दुर्गा पूजा आयोजनों से बिल्कुल अलग है। यही वजह है कि इस विशेष पूजा को देखने और मां दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
मां दुर्गा के साथ जया-विजया की प्रतिमाएं हैं खास आकर्षण
कालीकृष्ण आश्रम की दुर्गा पूजा की एक और खास विशेषता यहां स्थापित की जाने वाली प्रतिमाएं हैं। आमतौर पर मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, लेकिन इस आश्रम में उनकी जगह मां दुर्गा की दो सखियों जया और विजया की प्रतिमाएं स्थापित करने की परंपरा है।
यह अनूठा प्रतिमा-विन्यास पूजा को एक अलग पहचान देता है। जया और विजया की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी रहती हैं। भक्त यहां पहुंचकर इस विशिष्ट परंपरा के दर्शन करते हैं और इसके धार्मिक महत्व के बारे में जानने की उत्सुकता दिखाते हैं।
आस्था और परंपरा का अनूठा संगम
दामोदर नदी का शांत किनारा, आश्रम का आध्यात्मिक वातावरण और वर्षों से चली आ रही विशिष्ट पूजा परंपरा इस आयोजन को खास बनाती है। महालया के दिन ही पूजा और विसर्जन की परंपरा तथा मां दुर्गा के साथ जया-विजया की प्रतिमाओं की स्थापना कालीकृष्ण आश्रम को एक अलग पहचान देती है।
कुल मिलाकर, आसनसोल के धेनुआ गांव स्थित कालीकृष्ण आश्रम की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था और विशिष्ट परंपरा का ऐसा संगम है, जो हर साल श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहता है।










